जातीय बंधन

( राजेश कुमार, शिमला )

15 नवंबर, 2015 को प्रकाशित रमेश पहाडि़या, नाहन की रिपोर्ट ‘न जात-न पात, सिर्फ इनसानियत की बात’ भारतीय समाज सुधार तथा परस्पर भाईचारे की दिशा में निस्संदेह कारगर साबित होगी। कहना न होगा कि आदिकाल में सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था के सुचारू संचालन के उद्देश्य से किया गया कर्म विभाजन शायद उस समय उस युग की मांग रही होगी। मगर कालांतर में इस व्यवस्था ने जाति प्रथा का रूप धारण कर समाज में ऊंच-नीच, भेदभाव, छुआछूत का ऐसा जहर घोल दिया कि लाख विरेचन पर भी उसका असर खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है। कितनी बड़ी विडंबना है कि कोई संबंधित कार्य करे या न करे मगर उसकी पहचान पीढ़ी-दर-पीढ़ी जाति विशेष से की जाती है। जातिवाद सिर्फ ग्रामीण समाज में ही नहीं है, अपितु शहरों में भी किसी न किसी रूप में व्याप्त है। दफ्तर हों या फिर हाट-बाजार, शिक्षित से शिक्षित व्यक्ति भी सामने वाले व्यक्ति को उसकी उपजाति से पुकारना पसंद करता है। देश में आरक्षण की मांग को लेकर हो रहे हो-हल्ले ने जातिवाद की विनाशक अग्नि में घी का काम कर रहे हैं। अभी भी कार्यालयों में प्रयोग होने वाले विभिन्न प्रपत्रों/आवेदनों में जाति/वर्ग के कॉलम का विशेष उल्लेख होता है, जो अभी भी हमारे जातीय पूर्वाग्रहों का परिचायक है। रमेश पहाडि़या ने अपनी रिपोर्ट में दर्शाया गया है कि हिमाचल के विभिन्न जिलों में कुल मिलाकर 20210 परिवार जातीय बंधनों से मुक्त हैं, जो समतामूलक समाज की स्थापना की दिशा में एक अच्छा संकेत है और हम सभी को इससे सीख भी लेनी चाहिए। साथ ही ऐसे प्रपत्रों/आवेदनों से जातीय संदर्भ हटा देना चाहिए, ताकि सही मायने में जाति विहीन समाज व राष्ट्र के पक्षधर बिना किसी हिचकिचाहट उन प्रपत्रों को भर सकें।

 

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