दुनिया के पर्दे पर रितु सरीन

रितु सरीन इस वर्ष धर्मशाला में चौथे फिल्म फेस्टिवल का आयोजन करवा रही हैं। इस फिल्म फेस्टिवल के बहाने सरीन दुनिया भर के फिल्म जगत से जुड़े लोगों को पहाड़ों की खूबसूरती दिखाने के लिए यहां पहुंचती हैं…

utsavधौलाधार के आंचल में बसी कांगड़ा घाटी के सिद्धपुर में लेफ्टिनेंट जनरल रविंद्र सरीन के घर जन्मी रितु सरीन ने फिल्म मेकिंग को करियर बनाकर अपनी जन्म भूमि धर्मशाला में हर साल अंतरराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल करवाकर मिट्टी का कर्ज उतारने के लिए पहाड़ों को फिल्मी दुनिया से जोड़ने की कवायद शुरू की है। रितु सरीन इस वर्ष धर्मशाला में चौथे फिल्म फेस्टिवल का आयोजन करवा रही हैं। इस फिल्म फेस्टिवल के बहाने सरीन दुनिया भर के फिल्म जगत से जुड़े लोगों को पहाड़ों की खूबसूरती दिखाने के लिए यहां पहुंचती हैं। उन्होंने फिल्म मेकिंग के अपने तीन दशकों के लंबे करियर में दर्जनों डाक्यूमेंट्री और फीचर फिल्में तैयार की हैं। इसमें उनके पति तेंजिंग सोनम भी उनका पूरा सहयोग करते हैं। दुनिया के कई देशों में फिल्म मेकिंग को लेकर भ्रमण कर चुकीं रितु का कहना है कि  वह पहाड़ी क्षेत्र हिमाचल के धर्मशाला-मकलोड़गंज को फिल्म सिटी के रूप में विकसित करना चाहती है। इसके लिए उन्होंने अपने पति, माता, सास और बच्चों को भी इस मुहिम में शामिल किया है। उनका कहना है कि धर्मशाला में अंतरराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल करवाने के लिए अनेकों बाधाआें के बावजूद कई लोगों का सहयोग भी मिला है। उन्होंने दलाईलामा, तिब्बतियन थीम और टैक्सी ड्राइवर की शादी जैसी अनेकों डाक्यूमेंट्री फिल्में तैयार की हैं। फिल्म मेकिंग को लेकर वह टोरंटों फिल्म फेस्टिवल से लेकर देश-दुनिया के अनेकों फिल्म समारोहों में शिरकत कर चुकी हैं। इंडिपेंडेंस फिल्म, तितली फिल्म सहित दर्जनों ऐसी टॉप फिल्में हैं, जो भारतीय स्वतंत्रता को दर्शाती हैं।

 छोटी सी मुलाकात

प्रदेश की प्रतिभाओं के लिए जरूरी है एक्सपोजर

फिल्म उद्योग में हिमाचल किस तरह अपनी तस्वीर बुलंद कर सकता है?

प्राकृतिक सौंदर्य के बीच बसे पहाड़ी राज्य हिमाचल में फिल्म उद्योग की आपार संभावनाएं हैं। फिल्म उद्योग को प्रोमोट करने के लिए प्रोत्साहन की  आवश्यकता है। सरकारी व गैर सरकारी तौर पर इक्विपमेंट, लाइटिंग सहित मूलभूत ढांचा यदि यहां खड़ा हो जाए, तो दुनिया भर के फिल्म मेकर यहां पहुंचेंगे।

मकलोड़गंज में फिल्म फेस्टिवल की रूपरेखा और आपका योगदान?

मकलोड़गंज में फिल्म फेस्टिवल की रूपरेखा बनाने के पीछे मेरा मकसद पहाड़ों से दुनिया भर के फिल्म लवर व फिल्म मेकरों को यहां पहुंचाना और जोड़ना है। इसके लिए मैंने अपने पति और टीम के साथ मिलकर कई वर्षों तक अध्ययन कर काम किया।

एक बेहतर प्रभावशाली फिल्म फेस्टिवल के लिए धर्मशाला में क्या-क्या सुविधाएं चाहिएं?

एक अच्छा हॉल, थियटर या ऑडिटोरियम यहां मिले, तो आसानी से यहां पर फिल्म से जुड़ी गतिविधियों को चलाया जा सकता है। इतना ही नहीं फिल्म प्रोमोशन के लिए भी सरकारी व गैर सरकारी स्तर पर सहयोग चाहिए।

हिमाचली कलाकार व कला के लिए आपका आयोजन किस तरह सहायक होगा?

हिमाचली कला व कलाकारों को इस इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल से जोड़ कर उन्हें देश और दुनिया के हालात से वाकिफ करवाने का प्रयास किया जा रहा है। इसके लिए स्थानीय लोगों को स्वयं आगे आकर भी सहयोग करना चाहिए।

रितु सरीन के बतौर महिला, बतौर हिमाचली, बतौर भारतीय होने से जीवन कैसे-कैसे प्रभावित होता है?

मेरा अपने देश की माटी के प्रति लगाव ही है कि मैं एक महिला होने के बावजूद दुनिया भर के विभिन्न स्थानों में घूमकर इन पहाड़ों के बीच फिल्म उद्योग को लाना चाहती हूं।

सपना जो फिल्म उद्योग में रहते हुए पूरा करना चाहेंगी?

फिल्म उद्योग में रहते हुए इन  पहाड़ों के बीच फिल्म आर्ट सेंटर चलाना, जिसमें ट्रेनिंग प्रोग्राम सहित विभिन्न गतिविधियां पूरा वर्ष भर चलाई जा सकें।

सपना जो धर्मशाला में रहते हुए पूरा करना चाहती हों?

देश-दुनिया के नामी फिल्म मेकर और कलाकारों को इन पहाड़ों तक पहुंचाना और यहां फिल्म उद्योग की गतिविधियों को नियमित करना ही मेरा सपना है।

भारतीय संस्कृति में किस नायिका से प्रभावित हैं?

दस्तकार संस्था की लैला त्यावजी, जिन्होंने कलाकारों के लिए एक अलग स्थान व मंच तैयार किया है। इसके अलावा उर्वशी बटालिया जो भारतीय महिलाआें के लिए काम कर रही हैं।

आपके लिए धर्म व कर्म में क्या अंतर है?

मेरे लिए मेरा काम ही मेरा धर्म और कर्म दोनों हैं। इसे मैं अलग से विभाजित  नहीं करना चाहूंगी।

हिमाचली रंगमंच किस तरह से विकसित हो?

कलाकारों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। साथ ही उन्हें दुनिया भर में कला से जुड़ी  वैल्यूज से परिचित करवाना।  नए आइडियाज और एक्सपोजर के लिए देश-दुनिया के छोटे व बड़े कलाकारों को यहां लाना और हिमाचली लोगों को बाहर ले जाकर  एक्सपोजर देना अति आवश्यक है। तभी पहाड़ों की कहानियां व यहां की संस्कृति दुनिया भर में नाम कमा सकती है।

पवन कुमार शर्मा, धर्मशाला

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