ब्लैकबेरी हो गई कांग्रेस

Nov 5th, 2015 12:15 am

( पीके खुराना लेखक, वरिष्ठ जनसंपर्क सलाहकार और विचारक हैं )

केजरीवाल की ही तरह लोकसभा चुनावों में करारी हार के बाद नीतीश कुमार और लालू यादव भी संभले हैं, जबकि कांग्रेस वहां भी अप्रासंगिक नजर आती है। देश की जमीन में काफी नीचे तक फैली हुई अपनी जड़ों के बावजूद कांग्रेस कुछ ऐसा नहीं कर रही है, जिससे वह दोबारा प्रासंगिक बन जाए। दरअसल, कांग्रेस की समस्या राहुल गांधी हैं। कांग्रेस उनसे छुटकारा नहीं पा सकती और वह अधूरे-अनपके प्रयोगों से आगे नहीं बढ़ रहे। केजरीवाल और मोदी की आधी-अधूरी नकल ने कांग्रेस को और भी नुकसान पहुंचाया है...

समय बीतता रहता है। समय के साथ कुछ चीजें बदलती हैं और बदलते समय की नई तकनीक कुछ चीजों को ज्यादा तेजी से बदल देती है। कभी तांगों और बैल गाडि़यों, घोड़ा गाडि़यों और ऊंट गाडि़यों की तूती बोलती थी, धीरे-धीरे गांवों और कस्बों तक में मशीनों ने प्रवेश किया और आटो-रिक्शा, पिकअप वैन, जीप, ट्रक, कार आदि ने इनका स्थान ले लिया। छपाई में हैंड कंपोजिंग की जगह पहले फोटो टाइपसेटिंग ने ली, फिर उसे भी डेस्क टाइप पब्लिशिंग ने जमाने से रुखसत कर दिया। कभी ट्रांजिस्टर, कैमरा, टेप रिकार्डर, वाकमैन आदि हर जगह नजर आते थे, अब स्मार्ट फोन ने इन सबको विदा कर दिया। स्मार्ट फोन की बात करें तो भारत वर्ष में सबसे पहले मोटरोला ने कदम जमाए और उसके बाद नोकिया ने लगभग सारे बाजार पर कब्जा कर लिया। नोकिया के बाद ब्लैकबैरी की बारी आई और यह एक स्टेटस सिंबल बन गया। कदरन महंगा होने के कारण पहले यह सिर्फ कारोबारी एग्जीक्यूटिव्स में लोकप्रिय हुआ और फिर यह युवाओं का पसंदीदा शगल बन गया। ब्लैकबैरी के बाद ऐप्पल की बारी आई और ब्लैकबैरी को एक तगड़ा प्रतियोगी मिला, लेकिन एंड्रायड ने सारे बाजार को उलट-पलट कर दिया और अब स्मार्टफोन बाजार में ऐप्पल और एंड्रायड, दो ही बड़े नाम रह गए हैं।

हालांकि माइक्रोसॉफ्ट ने नोकिया को खरीद कर उसे कुछ जमीन दे दी है, लेकिन वह ऐप्पल और एंड्रायड के मुकाबले में कहीं नहीं है। एंड्रायड की लोकप्रियता ने ऐप्पल को भी झटका दिया था, लेकिन ऐप्पल ने अपनी खोई जमीन वापस लेने में देरी नहीं की। इस दौरान ब्लैकबैरी की प्रासंगिकता घटती चली गई और उनकी हर रणनीति उलटी साबित हुई तथा ब्लैकबेरी को बाजार से गायब होने में देरी नहीं लगी। आज ब्लैकबैरी का भाव टके का भी नहीं रहा, क्योंकि कोई नया खरीददार ब्लैकबैरी खरीदने की नहीं सोचता। पहले लोकसभा चुनावों में, फिर दिल्ली विधानसभा चुनावों में और बिहार विधानसभा चुनावों में कांग्रेस का वही हाल हुआ है, जो स्मार्टफोन क्षेत्र में ब्लैकबैरी का हो रहा है। एक जमाना था जब हर कांग्रेसी वीआईपी होता था, लेकिन अब तो कोई वीओपी (वैरी आर्डिनरी पर्सन, अत्यंत साधारण व्यक्ति) भी कांग्रेस में शामिल नहीं होना चाहता। जो लोग पहले से कांग्रेस में हैं और जिन्हें कहीं और जाना सुविधाजनक नहीं लगता या जो कट्टरता के इतने खिलाफ हैं कि वे भाजपा में जाने के बजाय राजनीति से बाहर होना पसंद करेंगे। सिर्फ पहले से जुड़े हुए लोग कांग्रेस में बचे हैं, कोई नया व्यक्ति कांग्रेस का सदस्य नहीं बन रहा है। कम्युनिस्टों और भाजपा को छोड़ दें तो देश का हर राजनीतिक दल एक परिवार की बपौती है। दल छोटा हो या बड़ा, सत्ता में हो या विपक्ष में, वह एक व्यक्ति अथवा एक परिवार की संपत्ति बन कर रह गया है। कांग्रेस, एनसीपी, इनेलो, डीएमके, एआईएडीएमके, सपा, बसपा, अकाली दल, राष्ट्रीय लोक दल आदि सभी पार्टियां और यहां तक कि  ‘आप’ भी एक व्यक्ति अथवा परिवार की संपत्ति हैं। राजनीति के सबसे ताजातरीन खिलाड़ी अरविंद केजरीवाल भी तब तक अपने दल का सिंहासन संभाले रहेंगे, जब तक कि उनके बच्चों में से कोई उनका स्थान लेने के लिए तैयार नहीं हो जाता।

सन् 2004 में कांग्रेस ने भाजपा नीत एनडीए को चुनावों में मात देकर केंद्र की सत्ता में वापसी की। लोगों की आशा के विपरीत डा. मनमोहन सिंह देश के प्रधानमंत्री बने। उनकी ईमानदार छवि ने कांग्रेस का बहुत भला किया, लेकिन कांग्रेस का दुर्भाग्य यह रहा कि उसके क्षेत्रीय भागीदार दल बहुत सशक्त थे और उनके बिना कांग्रेस सत्ता में नहीं रह सकती थी। इसलिए कांग्रेस उनके हाथों ब्लैकमेल होने लगी। धीरे-धीरे पार्टी में राहुल गांधी का महत्त्व बढ़ा और उससे पार्टी के अंदर के कई समीकरण बदले। सन् 2009 में कांग्रेस ने भाजपा नीत एनडीए को फिर हराकर सत्ता पर अपनी पकड़ बनाए रखी, लेकिन उसके बाद कांग्रेस में और सहयोगी दलों में डा. मनमोहन सिंह की छवि का ऐसा क्षरण शुरू हुआ कि अंततः उसने कांग्रेस को ही अप्रासंगिक बना दिया। डा. मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री होते हुए भी ‘प्यादा’ बनकर रह गए। उनके पास कोई वास्तविक शक्ति नहीं थी और वे देश को गवर्न करने के बजाय अंतरराष्ट्रीय रिश्तों पर ज्यादा ध्यान देने लग गए। इस बीच राहुल गांधी ने बहुत से प्रयोग किए, लेकिन उनके सारे प्रयोग अनुभवहीनता का प्रमाण देते चले गए। खुद निहित स्वार्थी कांग्रेसियों ने उन प्रयोगों को असफल बनाने में बड़ी भूमिका निभाई। दूसरी तरफ सहयोगी दलों की ब्लैकमेलिंग, कांग्रेसियों और सहयोगी दलों के मंत्रियों के घोटालों, सोनिया गांधी की बीमारी के कारण उनकी निष्क्रियता, पार्टी में राहुल गांधी के उदय, डा. मनमोहन सिंह की भीष्म चुप्पी और राहुल गांधी की अनुभवहीनता के साथ उनके अज्ञान और अहंकार आदि ने मिलकर कांग्रेस की लुटिया डुबो दी।

कांग्रेस की पहली बड़ी कमजोरी तब सामने आई, जब दिसंबर, 2013 में अरविंद केजरीवाल ने तब तक ‘सबसे पसंदीदा मुख्यमंत्री’ मानी जाने वाली शीला दीक्षित को उन्हीं के चुनाव क्षेत्र में हराकर दिल्ली फतह की और मुख्यमंत्री बने। उनकी इस अप्रत्याशित जीत से कांग्रेस और भाजपा दोनों सन्न रह गए। अरविंद केजरीवाल ने राजनीति के समीकरणों को बदला और नई राजनीति की शुरुआत की। मुख्यमंत्री के रूप में भी अरविंद केजरीवाल की ‘एक्टिविज्म’ ने पहले तो उनकी लोकप्रियता को शिखर पर पहुंचाया, लेकिन जब उन्होंने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दिया तो आम जनता ने इसे उनका पलायन माना और उनकी लोकप्रियता रसातल में आ गई।

इसी बीच अपने लुभावने अंदाज के साथ नरेंद्र मोदी राष्ट्रीय पटल पर उभरे। उनकी ‘परफार्मर’ वाली छवि, तकनीक के अभिनव प्रयोग और लटकों-झटकों के साथ-साथ आम भाजपा कार्यकर्ता के उत्साह ने उन्हें हीरो बना दिया। भाजपा और संघ के आम कार्यकर्ताओं ने कंधे से कंधा मिला कर काम किया और कांग्रेस को 44 सीटों पर सिमट जाने पर विवश कर दिया। लोकसभा चुनावों में आम आदमी पार्टी के खराब प्रदर्शन ने ‘आप’ की लोकप्रियता पर प्रश्नचिन्ह लगाए, लेकिन बुद्धिजीवी वर्ग और मीडिया ने तो आम आदमी पार्टी और लोकसभा चुनावों में करारी हार के बावजूद दिल्ली की जनता से जुड़ने में सफल रहे और दोबारा भारी बहुमत से मुख्यमंत्री बन गए हैं। यह अलग बात है कि अपने दूसरे कार्यकाल में वह अपनी उन खासियतों को भी भूल गए हैं, जिनके कारण उनकी छवि में चार चांद लगे थे। फिलहाल वह भी अन्य राजनीतिक दलों के ढांचे में ढले नजर आते हैं। उनका दूसरा कार्यकाल अकर्मण्यता भरा लग रहा है और उनकी कोई उल्लेखनीय उपलब्धि सामने आना बाकी है।

केजरीवाल की ही तरह लोकसभा चुनावों में करारी हार के बाद नीतीश कुमार और लालू यादव भी संभले हैं, जबकि कांग्रेस वहां भी अप्रासंगिक नजर आती है। देश की जमीन में काफी नीचे तक फैली हुई अपनी जड़ों के बावजूद कांग्रेस कुछ ऐसा नहीं कर रही है, जिससे वह दोबारा प्रासंगिक बन जाए। दरअसल, कांग्रेस की समस्या राहुल गांधी हैं। कांग्रेस उनसे छुटकारा नहीं पा सकती और वह अधूरे-अनपके प्रयोगों से आगे नहीं बढ़ रहे। केजरीवाल और मोदी की आधी-अधूरी नकल ने कांग्रेस को और भी नुकसान पहुंचाया है। पुराने कांग्रेसी दबे-ढके-छिपे रह कर राहुल का विरोध तो कर रहे हैं, पर कोई विकल्प या समाधान देने में वे भी असमर्थ नजर आते हैं। फिलहाल कांग्रेस के पास न कोई नीति है और न रणनीति। परिणाम यह है कि कभी डायनासोर जैसी भारी-भरकम रही कांग्रेस राजनीतिक क्षेत्र की ब्लैकबैरी बन गई है, जिसे अब कोई अपनाना नहीं चाहता। डायनासोर का भारी-भरकम आकार ही उसका अभिशाप बन गया और वह लुप्त हो गए। अभी यह कहना मुश्किल है कि कांग्रेस अपनी इस शापित स्थिति से मुक्त हो पाएगी या फिर वह भी डायनासोर की तरह लुप्त होकर इतिहास का हिस्सा बन जाएगी।

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