इंटरनेट को भी मिले सबसिडी

By: Jun 21st, 2016 12:01 am

( डा. भरत झुनझुनवाला लेखक, आर्थिक विश्लेषक एवं टिप्पणीकार हैं )

आने वाले समय में समाज में इंटरनेट की भूमिका गहरी होती जाएगी। जो कद आज साक्षरता का है, वह कल इंटरनेट का होगा। जिस प्रकार सरकार द्वारा शिक्षा के प्रसार को सबसिडी दी जाती है, उसी प्रकार इंटरनेट के प्रसार को सबसिडी देनी चाहिए। गांव में तथा शहरों के प्रमुख चौराहों पर वाई-फाई सेवा को मुफ्त कराना चाहिए, जिससे देश के अधिकाधिक नागरिक इंटरनेट का उपयोग करें और वांछित जानकारी हासिल करें…

वर्तमान में संपूर्ण विश्व में इंटरनेट के संचालन को लेकर विवाद चल रहा है। इंटरनेट उपलब्ध कराने वाली कंपनियों का कहना है कि उन्हें विशेष वेबसाइट तक मुफ्त पहुंचने की सुविधा को ग्राहक को देने की छूट होनी चाहिए। जैसे कुछ समय पूर्व फेसबुक ने रिलायंस कम्युनिकेशंज के साझे से ग्राहकों को फेसबुक तक मुफ्त पहुंचने की सुविधा देने की पहल की थी। प्रस्ताव था कि रिलायंस के उपभोक्ता द्वारा फेसबुक तथा कुछ और चिन्हित साइटों तक पहुंचना मुफ्त हो जाएगा, लेकिन इनके अतिरिक्त दूसरी साइट पर जाने को मूल्य अदा करना पड़ेगा। जैसे आप अपने मोबाइल से बिना टॉपअप कराए फेसबुक खोल सकते है, परंतु गूगल नहीं खोल सकते है। फेसबुक चाहता था कि मुफ्त सुविधा उपलब्ध कराकर अधिकाधिक उपभोक्ताओं को फेसबुक से जोड़ ले। तब वह कंपनी बड़ी संख्या में उपभोक्ताओं को विज्ञापन परोस सकेगी और लाभ कमा सकेगी।

फेसबुक का प्रस्ताव बहुत आकर्षक दिखता था। तमाम लोगों को इंटरनेट खोलने का मूल्य नहीं देना होता। फेसबुक तक पहुंचना आसान हो जाता, लेकिन इस प्रस्ताव में एक गहरा एवं खतरनाक सिद्धांत छिपा हुआ था। इस प्रस्ताव में निहित था कि रिलायंस द्वारा निर्धारित किया जा सकेगा कि उपभोक्ता किन साइटों पर मुफ्त जा सकता है और किन साइटों पर नहीं। यह उसी तरह हुआ कि अखबार बांटने वाला हॉकर तय करे कि आप कौन सा अखबार पढ़ेंगे। हॉकर चाहे तो आपको भाजपाई अखबार परोस कर उस पार्टी की ओर मोड़ सकता है अथवा कांग्रेसी अखबार परोस कर उस पार्टी की ओर मोड़ सकता है। राजनीतिक पार्टियों अथवा वाणिज्यिक कंपनियों द्वारा हॉकर को 10 पैसे देकर जनता की सोच को बदला जा सकता है। उदाहरण के लिए रिलायंस द्वारा व्यवस्था की जा सकती है कि वामपंथी वेबसाइट पर फ्री जाया जा सकेगा। फलस्वरूप इस प्रयोग से जनता की सोच उस दिशा में मुड़ती।

इस सिद्धांत का पुरजोर विरोध हुआ। लोगों ने कहा कि मुफ्त इंटरनेट की आड़ में जनता की वैचारिक स्वतंत्रता का हनन किया जा रहा है। जिस प्रकार किसी समय मुफ्त अफीम और चाय बांट कर लोगों को लत लगाई गई थी, उसी प्रकार मुफ्त फेसबुक की लत लगाई जा रही है। फलस्वरूप ट्राई ने रिलायंस को इस मुफ्त सेवा को उपलब्ध कराने की स्वीकृति नहीं दी और यह प्रस्ताव ठंडे बस्ते में चला गया। इसी प्रकार का विवाद अमरीका में पैदा हुआ है। वहां इंटरनेट कंपनियों द्वारा विशेष वेबसाइट पर जाने को स्पीड बढ़ा दी गई और दूसरी वेबसाइट पर जाने को स्पीड घटा दी गई। परिणामस्वरूप उपभोक्ता की अनजाने में प्रवृत्ति बनी कि उन विशेष वेबसाइटों पर अधिक जाए, जिस पर इंटरनेट कंपनी उन्हें ले जाना चाहती हो। कंपनियों की इस पालिसी को न्यायालय में चुनौती दी गई। वहां का सर्किट कोर्ट हमारे हाई कोर्ट के समकक्ष होता है। हाल में ही सर्किट कोर्ट ने निर्णय दिया है कि कंपनियां इस प्रकार से स्पीड का बदलाव नहीं कर सकेंगी यानी उपभोक्ता ही तय करेगा कि उसे कहां जाना हैं। नेट न्यूट्रेलिटी के पक्ष में यह महत्त्वपूर्ण निर्णय है। इसका स्वागत किया जाना चाहिए।

प्रश्न रह जाता है कि आम आदमी तक इंटरनेट को कैसे पहुंचाया जाए। फेसबुक के प्रस्ताव को ठुकराने से इंटरनेट का विस्तार बाधित होगा। इस उद्देश्य को दूसरी तरह से हासिल किया जा सकता है। अपने देश में टेलीफोन तथा इंटरनेट का नियंत्रण टेलीकाम रेगूलेटरी अथारिटी यानी ट्राई द्वारा किया जाता है। टेलीफोन के क्षेत्र में बीएसएनएल द्वारा तमाम ग्रामीण क्षेत्रों में सेवा उपलब्ध कराई जाती है। इसमें खर्च अधिक, लेकिन आय कम होती है। ग्रामीण क्षेत्रों में टेलीफोन सेवा उपलब्ध कराना बीएसएनएल के लिए लाभप्रद बना रहे, इसके लिए ट्राई द्वारा दूसरी टेलीफोन कंपनियों पर ‘ऐक्सेस डेफिसिट चार्ज’ आरोपित किया जाता है। जैसे टाटा ने केवल शहरों में लैंडलाइन की सेवा उपलब्ध कराई। तब टाटा पर अतिरिक्त चार्ज लगाकर रकम वसूली और इस रकम को बीएसएनएल को दे दिया, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में टेलीफोन सेवा उपलब्ध कराना बीएसएनएल के लिए लाभप्रद हो जाता था।

इसी प्रकार की व्यवस्था इंटरनेट के लिए बनाई जा सकती है। व्यवस्था की जा सकती है कि जो उपभोक्ता अधिक मात्रा में डाटा डाउनलोड करते हैं अथवा अधिक स्पीड की मांग करते हैं, उन पर अतिरिक्त चार्ज लगाया जाए और इस रकम से सामान्य उपभोक्ता के लिए इंटरनेट सस्ता बना दिया जाए। जैसे 10 एमबी डेटा को डाउनलोड करना हर उपभोक्ता के लिए मुफ्त किया जा सकता है। तब इंटरनेट का विस्तार भी होगा और उपभोक्ता की स्वतंत्रता की भी रक्षा होगी। ध्यान दें कि स्पीड में बदलाव के लिए अतिरिक्त दाम वसूल करने से व्यक्ति की स्वतंत्रता बाधित नहीं होती है, चूंकि कम अथवा हाई स्पीड पर वह मनचाही साइट पर जाने को स्वतंत्र रहता है।

इससे आगे जाने की जरूरत है। आने वाले समय में समाज में इंटरनेट की भूमिका गहरी होती जाएगी। जो कद आज साक्षरता का है, वह कल इंटरनेट का होगा। जिस प्रकार सरकार द्वारा शिक्षा के प्रसार को सबसिडी दी जाती है, उसी प्रकार इंटरनेट के प्रसार को सबसिडी देनी चाहिए। गांव में तथा शहरों के प्रमुख चौराहों पर वाई-फाई सेवा को मुफ्त कराना चाहिए, जिससे देश के अधिकाधिक नागरिक इंटरनेट का उपयोग करें और वांछित जानकारी हासिल करें। आज नगरपालिका द्वारा नुक्कड़ के सैंडपोस्ट पर मुफ्त पानी उपलब्ध कराया जाता है और घर के अंदर पाइप से पानी लेने वाले से मूल्य वसूला जाता है। इसी प्रकार इंटरनेट कंपनियों द्वारा न्यून स्पीड की इंटरनेट सेवा सभी को मुफ्त उपलब्ध कराई जानी चाहिए।

इंटरनेट कंपनियों का दावा है कि उनके द्वारा वेबसाइट को प्राथमिकता देने से जनता की स्वतंत्रता बाधित नहीं होगी। इंटरनेट कंपनियों के बीच प्रतिस्पर्धा होती है। जो कंपनी वेबसाइटों के चयन मे ज्यादा दखल करेगी, उसे उपभोक्ता स्वयं छोड़ देंगे। यह तर्क स्वीकार करने योग्य नहीं है। देखा जाता है कि शराब कंपनियों की आपसी प्रतिस्पर्धा से शराब के दुष्प्रभावों की जनता को जानकारी कम ही मिली है। अथवा नेताओं के बीच प्रतिस्पर्धा के बावजूद बूथ कैप्चर करने वाले नेता अकसर आगे रहते हैं। कारण कि प्रतिस्पर्धा तब ही कामयाब होती है, जब जनता को पूरी जानकारी हो और उस जानकारी से आत्मसात करने की क्षमता हो। यदि जनता को समझ आए कि बूथ कैप्चर करने वाला नेता बाद में भ्रष्ट होगा और उसके घर के सामने की सड़क नहीं बनवाएगा, तो संभवतया वह ऐसे नेता को वोट नहीं देगा। परंतु ऐसी समझ कम ही होती है। अतः सरकार की जिम्मेदारी बनती है कि जनता के हितों की रक्षा करे। इस सिद्धांत को अपनाते हुए सरकार की जिम्मेदारी बनती है कि इंटरनेट कंपनियों द्वारा वेबसाइट के चयन में दखल न होने दे और आम आदमी तक मुफ्त इंटरनेट पहुंचाने की व्यवस्था करे।

ई-मेल : bharatjj@gmail.com

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