देवभूमि का जीवन बने जैविक खेती

By: Jul 6th, 2016 12:15 am

(डीआर सकलानी लेखक, सरकाघाट, मंडी से हैं)

डीआर सकलानीजैविक खेती के लिए न तो किसान को कर्ज की आवश्यकता है, न ही नशेड़ी लत की तरह की सबसिडी की। पहाड़ी राज्यों में सिक्किम जैविक राज्य बन सकता है, तो देवभूमि हिमाचल क्यों नहीं? हिमाचल में हर किसान को जैविक खेती अपनाने के भरसक प्रयास करने होंगे, सोच बदलनी होगी…

हिमाचल प्रदेश में लोगों के लिए कृषि, बागबानी तथा इससे संबंधित क्षेत्र जीवनयापन के मुख्य घटक हैं। प्रदेश की आर्थिकी काफी हद तक इन्हीं क्षेत्रों पर निर्भर करती है। प्रदेश के 70 फीसदी से ज्यादा लोग इन व्यवसायों से जुड़े हैं तथा प्रदेश सरकार अपनी नीतियों व कार्यक्रमों को इनके अनुकूल बनाकर कृषि आय तथा ग्रामीण आर्थिकी में समृद्धि लाने के लिए प्रयासरत है। हमारी प्राचीन कृषि विधियां जैविक थीं, लेकिन जनसंख्या में तूफानी रफ्तार से इजाफा होने के कारण खेती की पैदावार को भी उसी अनुपात में बढ़ाने के लिए रासायनिक खादों-खरपतवारों के इस्तेमाल वाली खेती का सिलसिला शुरू हो गया। फसलों को हानि पहुंचाने वाले सूक्ष्म जीवों से फसलों की रक्षा करने के लिए तथा फसलों की उत्पादन क्षमता में बढ़ोतरी करने के लिए विभिन्न रसायनों का इस्तेमाल किया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर खेतों में रसायनों के बढ़ते विषैले प्रभाव से भूमि बंजर बनती जा रही है। रसायनों के इस नुकसानदायक प्रकोप में लोग भी तरह-तरह की बीमारियों की गिरफ्त में आ रहे हैं।

रसायनों का विषैला प्रभाव केवल खेत व खेती तक सीमित नहीं है, बल्कि बरसात के मौसम में इसका असर विभिन्न पेयजल स्रोतों में भी देखने को मिल रहा है। इससे इनसान कैंसर, ब्लड पे्रशर, हार्ट अटैक, शुगर, मानसिक रोग, गठिया, दमा, दिल की गंभीर बीमारियों की चपेट में आ रहे हैं। इन रसायनों से उगाया अन्न व सब्जियां किसी कद्र जहर से कम नहीं होता है। जैविक खेती में हालांकि शुरू में उत्पादन में कमी रहती है, लेकिन अन्न सौ फीसदी शुद्ध होता है। रासायनिक खादें जमीन की उर्वरा शक्ति को खत्म करने के लिए जिम्मेदार रही हैं। हालांकि भूमि में रसायनों का इस्तेमाल करने से शुरुआती सालों से खेती से दो-तीन गुना ज्यादा पैदावार तो मिलती है, पर उसके बाद भूमि बंजर होना शुरू हो जाती है। फल-सब्जियों पर भी रासायनिक खादों व कीटनाशकों की मार झेल रहे समाज का हर तबका बीमार और लाचार है। दूसरी तरफ पैदावार तो बढ़ गई, लेकिन कृषि उत्पादों का स्वाद ही गायब हो गया है। सुबह होते ही सब्जियों के आकार में व्यापक परिवर्तन देखने को मिलता है। इनके इस्तेमाल से लोग तरह-तरह की बीमारियों की चपेट में आ रहे हैं। दूसरे जहां रासायनिक खादें व कीटनाशक जहरीली दवाइयां इतनी महंगी होती हैं कि छोटा कृषक वर्ग इनको खरीदने के लिए सक्षम नहीं होता है। इन रसायनों के उपयोग से चारे में भी खतरनाक तत्त्व आ जाते हैं और इसकी मार पशुओं पर पड़ती है तथा दूध की गुणवत्ता भी समाप्त हो जाती है। इन तमाम नकारात्मक अवगुणों के बीच जैविक खेती मानव के लिए संजीवनी से कम नहीं। आज हिमाचल के कृषक जहां अपने खेतों में गोबर, जैविक खाद की जगह रासायनिक खादों का प्रयोग करके भूमि को बंजर बना रहे हैं, वहीं दूसरी ओर कृषक, बैल पालना छोड़ रहे हैं तथा खेतों में बैल जोतने की जगह ट्रैक्टरों से खेती की जा रही है। कृषकों के लिए ट्रैक्टर, रासायनिक खाद व महंगे विदेशी बीज पर भारी खर्च करने से खेतीबाड़ी-बागबानी घाटे का सौदा साबित हो रहे हैं। निश्चित तौर पर यह भी एक कारण है कि आज ऋण  तले डूबा किसान आत्महत्या करने पर विवश हो रहा है।

हिमाचल में वर्तमान में करीब 55 लाख हेक्टेयर भूमि में से 19 लाख 55 हजार हेक्टेयर भूमि बंजर पड़ी हुई है। रासायनिकों कीटनाशक व उर्वरकों से इस बेकार होती भूमि का क्षेत्रफल लगातार बढ़ता ही जा रहा है। कृषकों को लाभ के बजाय लगातार हानि उठानी पड़ रही है। स्थिति यह है कि बीते एक दशक से देश भर के लाखों किसान मौत को गले लगा चुके हैं। देश की कृषि व्यवस्था को दीर्घकाल के लिए बेहतर बनाए रखने के लिए जैविक खेती का मार्ग ही सही रहेगा। जैविक कृषि प्राचीन एवं नवीन कृषि तकनीकों का समागम है, जिसके अंतर्गत कृषि व प्रकृति के बीच संतुलन बना रहता है और कृषि बिना पर्यावरणीय विनाश के फल-फूल सकती है। मानव स्वास्थ्य के लिए जैविक खेती की राह अत्यंत लाभदायक है, इसलिए आवश्यकता है कि प्राकृतिक संसाधन प्रदूषित न हों, वातावरण शुद्ध रहे एवं पौष्टिक आहार भी मिलता रहे।

इसके लिए जैविक खेती की कृषि पद्धतियों को अपनाना होगा। हमें रासायनिक कीटनाशक दवाओं को अपने जहन से निकालना होगा तथा पारंपरिक कृषि की ओर लौटना होगा।  हमें फिर से गोमाता का आदर करना होगा तथा गोवंश संवर्द्धन के प्रयासों से जैविक खेती की ओर लौटना होगा। गाय के गोबर से हम जैविक खाद से खेती की पैदावार को बढ़ावा दे सकते हैं। गाय के गोबर, मूत्र का प्रयोग फसलों के लिए कीटनाशक और जैविक खाद के तौर पर किया जा रहा है। गाय के गोबर और मूत्र को तीन वर्षों तक खेती में इस्तेमाल करने से किसी रसायन की जरूरत नहीं पड़ती है। जैविक खेती के लिए न तो किसान को कर्ज की आवश्यकता है, न ही नशेड़ी लत की तरह की सबसिडी की। पहाड़ी राज्यों में सिक्किम जैविक राज्य बन सकता है, तो देवभूमि हिमाचल क्यों नहीं? हिमाचल में हर किसान को जैविक खेती अपनाने के भरसक प्रयास करने होंगे, सोच बदलनी होगी। जीरो बजट खेती हिमाचल में हर तरह से संभव है। ‘जैविक लाओ, रासायनिक हटाओ’ अभियान प्रदेश स्तर पर चलाने की आवश्यकता है।

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