प्रदेश में लागू हो फोरेस्ट राइट एक्ट

Jul 26th, 2016 12:16 am

NEWSशिमला — सोशल वेलफेयर काउंसिल ऑफ  इंडिया ने जनजाति और टे्रडिशनल फोरेस्ट डिवेलरज अधिनियम के अंतर्गत वन अधिकार लागू करने की मांग की है। सोशल वेलफेयर एंडरिफॉमस काउंसिल ऑफ  इंडिया के चेयरमैन राजेश्वर सिंह नेगी ने सोमवार को आयोजित प्रेस वार्ता में कहा कि प्रदेश सरकार वर्ष 2008 में बनाए गए अधिनियम को न तो सूचित कर पाई है और न ही लागू। उन्होंने कहा कि संसद ने इस एक्ट को 2006 में पारित किया था, जिससे देश के करीब सभी राज्यों में लागू किया जा चुका है,लेकिन प्रदेश में भाजपा और कांग्रेस इस एक्ट को लेकर गंभीर नहीं रहा है। उन्होंने कहा कि प्रदेश सरकार 2012 के बाद से इस एक्ट के तहत छूट प्राप्त करने के लिए पर्यावरण और वन मंत्रालय को गुमराह कर रही है कि 1971 में वन निपटान के समय सभी वन अधिकारों को तय किया जा चुका है, जोकि वन अधिकार अधिनियम 2006 का पूरी तरह उल्लंघन है। उन्होंने कहा कि हिमाचल उच्च न्यायालय के फैसले के मद्देनजर इन वनवासियों को अतिक्रमण घोषित किया जा रहा है और जबरन 1927 के वन अधिनियम लागू कर बेदखल किया जा रहा है, जबकि ये व्यक्ति वन अधिकार एक्ट के अधीन आते हैं। उन्होंने कहा कि प्रदेश के हजारों आदिवासियों और किन्नौर, करसोग , चंबा के वनवासियों को जबरन बेदखल कर दिया गया है, जिससे इन लोगों को अपनी जीविका कमाने में दिक्कतें पेश आ रही हैं। उन्होंने कहा कि कांगडा, चंबा और मंडी के हजारों देहाती समुदायों के गद्दीयों और गुजरों को उनकी मौसमी चराई के परिदृश्य से बेदखल किया गया है। उन्होंने कहा कि इस मामले की गंभीरता को देखते हुए सात सूत्री मांगपत्र मुख्यमंत्री और जनजातीय मामलों के केंद्रीय मंत्री को ज्ञापन सौंपा गया है, जिसमें पूरे प्रदेश में एक्ट एफआरए 2006 को लागू करना, वन अधिकारी समितियों का गठन किया जाए। उन्होंने कहा कि जनजातीय मामलों के केंद्रीय मंत्रालय द्वारा प्राप्त आंकडों के अनुसार प्रदेश में पांच सालों में कुल 5409 व्यक्तियों के दावों में से मात्र सात मामले ही निपटाए जा सके है।

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