भारत को ब्रेग्जिट के सबक

By: Jul 5th, 2016 12:15 am

डा. भरत झुनझुनवाला

( लेखक, आर्थिक विश्लेषक एवं टिप्पणीकार हैं )

ग्लोबलाइजेशन बड़ी कंपनियों को अधिक लाभ पहुंचाता है और आम आदमी को नुकसान या फिर बहुत ही मामूली लाभ। इंग्लैंड द्वारा लिए गए निर्णय ने इस सच्चाई को सामने लाया है। इंग्लैंड द्वारा लिए गए निर्णय में हमारे लिए गहरा सबक है। यूरोपियन यूनियन की सदस्यता से जो अमीरों को लाभ और आम आदमी को हानि इंग्लैंड में देखी गई है, वही अपने देश में भी हो ही रही है, चाहे इसे वर्तमान में पर्दे के पीछे ढक दिया गया हो…

इंग्लैंड द्वारा यूरोपियन यूनियन से बाहर आने का निर्णय लिए जाने के बाद संपूर्ण विश्व में उथल-पुथल जारी है। इंग्लैंड की मुद्रा पाउंड लुड़क रही है, जो कि समझ में आता है। इंग्लैंड का यूरोप से अलगाव होने के बाद संभव है कि उस देश में स्थित बहुराष्ट्रीय कंपनियों को कठिनाई हो, लेकिन शेष विश्व में क्यों संकट पैदा हो रहा है? कारण है कि इंग्लैंड का यह कदम ग्लोबलाइजेशन की मूल प्रक्रिया पर ही प्रश्न चिन्ह खड़ा करता है। सच यह है कि इंग्लैंड की आम जनता के लिए यूरोपीयन यूनियन की सदस्यता घाटे का सौदा हो गई थी। यूरोपियन यूनियनके सदस्य देशों के बीच श्रमिकों, माल तथा पूंजी का मुक्त आवागमन होता है। परिणामस्वरूप यूरोपियन यूनियन के गरीब देश के कर्मियों का पलायन यूरोपियन यूनियन के अमीर देशों को होता है। इंग्लैंड सरकार के लिए काम करने वाले एक अधिकारी ने हंगरी की महिला को गृहकार्य के लिए रखा। इंग्लैंड के गृह कर्मियों की तुलना में वह कम वेतन पर काम करने को तैयार थी। गरीब देशों से श्रमिकों के इस पलायन से इंग्लैंड के कर्मियों के वेतन दबाव में आए हैं, इसलिए इन्होंने यूरोपियन यूनियन के सदस्य बने रहने से इनकार कर दिया है। यूरोपियन यूनियन से बाहर आने से हंगरी जैसे गरीब देशों से इंग्लैंड को श्रमिकों का पलायन रुक जाएगा और आने वाले समय में इंग्लैंड के कर्मियों के वेतन में वृद्धि होने की संभावना है।

यूरोपियन यूनियन से बाहर निकलने का इंग्लैंड के उद्योगों पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा। पिछले दशक में इंग्लैंड के उद्योगों को इस सदस्यता से भारी लाभ हुआ है। उन्हें हंगरी तथा पोलैंड के सस्ते श्रमिक उपलब्ध हुए हैं। इंग्लैंड में बने माल को वे मुक्त रूप से यूरोपीय देशों में बेच सके हैं। अर्थशास्त्र के सिद्धांत के अनुसार इंग्लैंड में उद्योगों को हुए लाभ से इंग्लैंड की सरकार को अधिक टैक्स मिलना चाहिए था। इस टैक्स का उपयोग इंग्लैंड की जनता को शिक्षा, स्वास्थ्य तथा अन्य सेवाएं उपलब्ध कराने के लिए किया जा सकता था। इसे अर्थशास्त्र में ‘ट्रिकल डाउन’ यानी रिसाव की थ्योरी कहा जाता है। मान्यता है कि अमीरों की बढ़ती अमीरियत से गरीब को भी अतिरिक्त लाभ होगा, जैसे शहद के छत्ते से शहद टपकता है। लेकिन इंग्लैंड की जनता का प्रत्यक्ष अनुभव इसके विपरीत रहा। उन्होंने पाया कि ट्रिकल डाउन से उन्हें जो लाभ हुआ, उससे ज्यादा नुकसान हंगरी के सस्ते श्रमिकों के आने से हुआ है। इसलिए उन्होंने यूरोपीय यूनियन से बाहर आने का निर्णय लिया है। जाहिर है कि इस मुद्दे पर अमीरों तथा आम आदमी के विचार बिलकुल विपरीत रहे। जार्ज सोरस जैसे अमीरों ने यूरोपीय यूनियन की सदस्यता बनाए रहने की पुरजोर वकालत की थी। भारतीय कंपनी टाटा कोरस ने कहा था कि इंग्लैंड के यूरोपीय यूनियन से बाहर आने से कंपनी को भारी घाटा लगेगा। इंग्लैंड की जनता ने इस प्रचार को नकार दिया।

इंगलैंड की जनता द्वारा लिया गया यह निर्णय ग्लोबलाइजेशन की मूल प्रक्रिया की विसंगति को दर्शाता है। ग्लोबलाइजेशन से बहुराष्ट्रीय कंपनियों को संपूर्ण विश्व में उत्पादन करने एवं माल बेचने की सुविधा मिल जाती है। इससे इनके लाभ बढ़ते हैं, लेकिन आम आदमी के लिए यह मुख्य रूप से घाटे का सौदा हो जाता है। इंग्लैंड में हंगरी से गरीब श्रमिक प्रवेश करते हैं और इंग्लैंड के श्रमिकों के वेतन दबाव में आते हैं। चीन में बना सस्ता माल इंग्लैंड में प्रवेश करता है और इंग्लैंड के उद्योग बंद हो जाते हैं। केवल गरीबतम देशों के श्रमिकों को लाभ होता है। हंगरी एवं चीन के कर्मियों को रोजगार के बढ़े हुए अवसर मिलते है, परंतु इन्हें भी बहुत मामूली लाभ होता है। चीन के सस्ते कर्मियों को वियतनाम के और सस्ते कर्मियों से प्रतिस्पर्धा करनी पड़ती है। उनके वेतन में मामूली ही वृद्धि होती है। इस प्रकार ग्लोबलाइजेशन बड़ी कंपनियों को अधिक लाभ पहुंचाता है और आम आदमी को नुकसान या फिर बहुत ही मामूली लाभ। इंग्लैंड द्वारा लिए गए निर्णय ने इस सच्चाई को सामने लाया है।

इंग्लैंड द्वारा लिए गए निर्णय में हमारे लिए गहरा सबक है। यूरोपियन यूनियन की सदस्यता से जो अमीरों को लाभ और आम आदमी को हानि इंग्लैंड में देखी गई है, वही अपने देश में भी हो ही रही है, चाहे इसे वर्तमान में पर्दे के पीछे ढक दिया गया हो। इंग्लैंड के उद्योगों की तरह हमारे उद्योग भी ग्लोबलाइजेशन से लाभान्वित हुए हैं। हमारे उद्यमियों द्वारा इंग्लैंड के उद्यमों को खरीदा जा रहा है, जैसे टाटा ने कार निर्माता जैगुआर को खरीदा है। इंग्लैंड में आने वाले विदेशी निवेश में भारतीय उद्यमी तीसरे नंबर पर हैं। संभव है कि आने वाले समय में विश्व व्यापार पर भारतीय उद्यमी हावी हो जाएं, लेकिन भारत के आम आदमी के लिए ग्लोबलाइजेशन फिर भी घाटे का सौदा बना रहेगा। चीन में बना सस्ता माल अपने देश में प्रवेश कर रहा है और तमाम छोटे उद्योगों को चौपट कर चुका है। असम तथा बंगाल में बांग्लादेश से भारी संख्या में लोग प्रवेश किए हैं। दिल्ली जैसे महानगरों में भी बांग्लादेश से आए कर्मी उपलब्ध हैं। उत्तर प्रदेश एवं उत्तराखंड में नेपाल से सस्ते कर्मी आ रहे हैं। जिस प्रकार इंग्लैंड के कर्मी के रोजगार को हंगरी के कर्मियों ने हड़प लिया है, उसी प्रकार असम, बंगाल, दिल्ली, उत्तर प्रदेश एवं उत्तराखंड के कर्मियों के रोजगारों को बांग्लादेश एवं नेपाल के कर्मी हड़प रहे हैं। अर्थशास्त्र के सिद्धांत के अनुसार भारतीय उद्यमों के बढ़े हुए लाभ से भारत सरकार को अधिक टैक्स मिलना चाहिए था। इस रकम का उपयोग मुफ्त स्वास्थ्य तथा शिक्षा, मनरेगा एवं इंदिरा आवास जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से आम आदमी तक पहुंचना चाहिए था। लेकिन हमारी जनता का भी यही अनुभव है कि चीन के सस्ते माल तथा बांग्लादेश व नेपाल के कर्मियों के प्रवेश से नुकसान ज्यादा तथा सरकारी टैक्स में वृद्धि से लाभ कम हुआ है। इसलिए भारत की जनता भी मूल रूप से ग्लोबलाइजेशन से खुश नहीं है, यद्यपि अभी सरकारी प्रचार का खुमार इस सच्चाई को दबाए हुए है।

भारत का मध्यम वर्ग भी बड़े उद्योगों के साथ खड़ा है। इनका अनुभव है कि ग्लोबलाइजेशन के चलते भारत के तमाम कर्मी अमरीका में नौकरी पा सके हैं। विकसित देशों की तमाम कंपनियों द्वारा भारत में सॉफ्टवेयर तथा रिसर्च की इकाइयां स्थापित की गई हैं। जो सॉफ्टवेयर कर्मी भारत में पचास हजार रुपए प्रतिमाह के वेतन पर उपलब्ध है, उसी को अमरीका में पांच लाख रुपए देने पड़ते हैं। ग्लोबलाइजेशन के चलते भारत को पूरे विश्व से मध्यम वर्गीय रोजगारों का पलायन हो रहा है। अपने देश में अमीर और मध्यम वर्ग एक साथ ग्लोबलाइजेशन के पक्ष में खड़े हैं और गरीब दीवार के दूसरी तरफ  खड़ा है। यह विसंगति ज्यादा समय को नहीं चल सकती है। सरकार को चेतना चाहिए। मेक इन इंडिया के ख्याली पुलाव से भारत के आम आदमी को ज्यादा समय तक भुलावे में नहीं रखा जा सकेगा। जो हश्र आज इंग्लैंड की गलोबलाइजेशन समर्थक सरकार का हुआ है, वह कल भारत की ग्लोबलाइजेशन समर्थक सरकार का अवश्य होगा। सच्चाई के सामने आने मे देर है, अंधेर नहीं।

ई-मेल : bharatjj@gmail.com

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