मंत्रिमंडलीय फेरबदल में स्मृति को झटका

Jul 15th, 2016 12:16 am

प्रो. एनके सिंह

( एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया के पूर्व चेयरमैन हैं )

मंत्रिमंडलीय फेरबदल में सबसे ज्यादा चर्चा स्मृति ईरानी को लेकर हुई, जो कि मोदी की नीतियों को लेकर उठने वाले सवालों पर साहस व सख्ती के साथ बचाव करती आई हैं। स्मृति से एचआरडी मंत्रालय छिनने पर मीडिया और ट्विटर पर कई लोगों ने हद दर्जे के घटिया शब्दों का इस्तेमाल करते हुए नैतिकता की सारी हदें लांघ गए। जिन लोगों में व्यवहार संबंधी रत्ती भर नफासत भी बची है, उन्हें इ न लोगों की कड़ी निंदा करनी चाहिए। उन्हें स्वीमिंग सूट के साथ दिखाना या एक ऐसे व्यक्ति के रूप में पेश करना जिसे कपड़े से अपना शरीर ढकना चाहिए, निंदनीय माना जाएगा…

अभी हाल ही में नरेंद्र मोदी ने मंत्रिमंडल में बड़ा फेरबदल किया, जिसे लेकर तरह-तरह की चर्चाओं का बाजार गर्म रहा। कुछ समाचार पत्रों ने इसे ऊपरी लीपापोती करार दिया, मानों यह यूपीए शासन काल के दौरान होने वाले छोटे-मोटे बदलावों जैसा ही था। यह एक गलत व्याख्या है। निश्चित तौर पर यह एक प्रगतिशील कदम है, जिसे मध्य अवधीय सुधार कहा जा सकता है। इस बदलाव के जरिए मोदी ने पार्टी क्षमताओं को बढ़ाया है और समझदारी दिखाते हुए उन्होंने निकट भविष्य में होने वाले राज्यों के चुनावों में जातीय समीकरणों को साधने का भी प्रयास किया है। साथ ही गृह, वित्त, रक्षा, विदेश मामले, ऊर्जा, यातायात और रेलवे सरीखे महत्त्वपूर्ण मंत्रालयों में बदलाव न करके वह अपनी पहले की पसंद पर कायम रहे हैं। कई अन्य कम महत्त्व के मंत्रालयों में भी यथास्थिति बनाए रखी है। यह फैसला मंत्रियों के प्रदर्शन पर आधारित माना जाएगा। कुछ मंत्रियों को अपेक्षाओं पर खरा न उतरने की वजह से भी बदला भी गया और पांच मंत्रियों को मंत्रिमंडल से बाहर का रास्ता दिखाया गया।

इस फेरबदल में सबसे ज्यादा चर्चा स्मृति ईरानी को लेकर हुई, जो कि मोदी की नीतियों को लेकर उठने वाले सवालों पर साहस व सख्ती के साथ बचाव करती आई हैं। स्मृति से एचआरडी मंत्रालय छिनने पर मीडिया और ट्विटर पर कुछ लोग हद दर्जे के घटिया शब्दों का इस्तेमाल करते हुए नैतिकता की सारी हदें लांघ गए। जिन लोगों में व्यवहार संबंधी रत्ती भर नफासत भी बची है, उन्हें इन लोगों की कड़ी निंदा करनी चाहिए। उन्हें स्वीमिंग सूट के साथ दिखाना या एक ऐसे व्यक्ति के रूप में पेश करना, जिसे कपड़े से अपना शरीर ढकना चाहिए, निंदनीय माना जाएगा। जब उन्हें मानव संसाधन विकास मंत्रालय, जिसके अधीन शिक्षा भी आती है, आबंटित किया गया था, तो उस जटिल व अति संवेदनशील मंत्रालय को संभालने को लेकर उनकी क्षमताओं पर मुझे भी संदेह था। यह मंत्रालय देश के विकास में बेहद महत्त्वपूर्ण माना जाता है। मैं नहीं मानता हूं कि इस क्षेत्र के मंत्री के कंधों पर जिस तरह की जिम्मेदारियों का बोझ होता है, वह उसे संभालने के काबिल थीं। वह तेजतर्रार मिजाज की हैं और विरोधियों की निंदा में बोलते वक्त वह कोई कसर नहीं छोड़ती हैं। उनका यही लहजा उन्हें विरोधियों के निशाने पर ले आया। स्मृति की कई अन्य बड़ी कमजोरियां भी हैं। पहली तो यही कि उनके पास विशेष अकादमिक उपलब्धियां नहीं हैं, लेकिन वह खुद को प्रभावी ढंग से व्यक्त करती आई हैं। हिंदी और अंग्रेजी, दोनों ही भाषाओं पर उनकी पकड़ जबरदस्त है।

निस्संदेह वह एक सामान्य पृष्ठभूमि से आती हैं और छोटे पग बढ़ाते हुए आगे बढ़ी हैं। बाद में टेलीविजन कार्यक्रमों में उन्होंने अभिनय किया, तो उससे उन्हें खासी लोकप्रियता मिली। दिल्ली स्थिति लुटियन के कुलीन वर्ग ने कभी उन्हें अपेक्षित सम्मान के साथ स्वीकार नहीं किया। लेकिन उनके पूर्ववर्ती और हार्वर्ड से पढ़कर लौटे कपिल सिब्बल ने भी क्या किया, जिनसे इस क्षेत्र में कुछ खास करने की उम्मीदें थीं। उन्होंने महज सस्ते कम्प्यूटर लाने और अंततः खनन क्षेत्र में शून्य नुकसान सिद्धांत और दूरसंचार मंत्रालय में हुए घोटालों के लिए ख्याति हासिल की। उनसे पहले अर्जुन सिंह ने भी इस मंत्रालय को शिक्षा के निरंतर गिरते स्तर को सुधारने के बजाय अपने सियासी अभियान को आगे बढ़ाने के लिए इस्तेमाल किया। स्मृति ने भूतकाल के विस्मृत नायकों को किताबों में स्थान न मिलने की गलती को दुरुस्त किया था। ऐसे विस्मृत हो चुके नायक ब्रांडेड श्रेणी में नहीं आते। उनकी कार्यशैली की एक बड़ी खामी यह रही कि उन्होंने इस क्षेत्र में शीर्ष पदों पर नियुक्तियां व्यक्तिगत क्षमताओं के आधार पर नहीं, बल्कि पार्टी पृष्ठभूमि के आधार पर कीं। उनके मंत्री पद पर रहते हुए जो नियुक्तियां हुईं, उनके आधार पर मैंने स्वयं भी इस बात को महसूस किया। आज विद्यालयों और यहां तक कि विश्वविद्यालयों में भी शिक्षा क्षेत्र के लिए निर्धारित अंतरराष्ट्रीय मापदंडों पर खरा उतरने की विशालकाय चुनौती हमारे समक्ष खड़ी है। यदि जावड़ेकर इस क्षेत्र में विभिन्न पदों के लिए चयन और नियुक्तियां व्यक्ति की खूबियों के आधार पर करेंगे, तो मुझे यह देखकर हैरानी होगी, क्योंकि शिक्षा के दिन-ब-दिन गिरते स्तर को सुधारने के लिए इसके अलावा कोई दूसरा चारा भी नजर नहीं आता। नवाचार और सृजनात्मक शोध के क्षेत्र में जो सफलता दूसरे देशों ने हासिल की है, उसमें भारत आज तक नाकाम रहा है। यह सच है कि स्मृति ईरानी से पूर्व जो लोग इस पद पर रहे हैं, वे शिक्षा गुणवत्ता और शोध को इस निम्न स्तर पर लाने के लिए जिम्मेदार रहे हैं। एक-दूसरे से गहराई से जुडे़ इन दोनों क्षेत्रों यानी शिक्षण और शोध में तुरंत प्रभाव से सुधार करने की जरूरत है। देश के भविष्य के लिहाज से यह एक अति गंभीर मसला है।

स्मृति के कार्यकाल में भी कोई खास बदलाव देखने को नहीं मिलता, लेकिन शिक्षा नीति के संबंध में एक बड़ी शुरुआत जरूर दिखती है। इसके अतिरिक्त हैदराबाद और दिल्ली स्थित जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में घटी दो घटनाओं को लेकर विपक्ष द्वारा संसद में भी उनकी घेरेबंदी की गई। इसमें संदेह नहीं कि दोनों ही मसलों पर उनका पाला देश विरोधी व पाक समर्थित तत्त्वों से पड़ा था। यह बात बिलकुल स्पष्ट है कि विश्वविद्यालयों को ऐसे तत्त्वों से मुक्त रखा जाए, लेकिन इन्हें इन संस्थानों से खदेड़ने का कार्य कुशलता व दक्षता के साथ होना चाहिए। अभिव्यक्ति की आजादी और असहमतियों को लेकर हमारे संविधान ने कुछ सीमाएं तय कर रखी हैं, जिनका हर हालत में पालन करना होगा। जावड़ेकर एक सुशील व भद्र व्यक्ति हैं, जिनके पास पर्याप्त डिग्रियों भी हैं और पृष्ठभूमि संबंधित विवादों से भी उनका कभी कोई नाता नहीं रहा। जिन मुद्दों को लेकर स्मृति जूझती रहीं, जावड़ेकर को दृढ़ व निर्बाध रूप से उन विषयों को एक अभियान के तौर पर अंजाम देना होगा। जो लोग ऐसा मानते हैं कि स्मृति को इस फेरबदल के बाद कूड़ेदान में फेंक दिया गया, वे भी बड़े मुगालते में जी रहे हैं। कपड़ा मंत्रालय भी एक अहम मंत्रालय है और इसमें सुधार के लिए अभी हाल ही में 6000 करोड़ रुपए का बजट आबंटित किया गया है। लिहाजा स्मृति के समक्ष भी एक बड़ी चुनौती रहने वाली है कि वह कपड़े के निर्यात की क्षमताओं को बढ़ाने के साथ रोजगार सृजन के ज्यादा से ज्यादा अवसर पैदा करने के लिए क्या प्रयास करती हैं। यदि वह अपनी आक्रामकता पर नियंत्रण पा लेती हैं, तो कपड़ा उद्योग के कायाकल्प में सक्षम हो जाएंगी और यही उनके आलोचकों के लिए उनका सटीक जवाब भी होगा। इसे शर्मनाक ही माना जाएगा कि वरिष्ठ नेताओं समेत कई महिला नेता भी उनके खिलाफ घटिया बयानबाजी पर उतर आई थीं, जिसका खुद सामना करने पर वे इसकी कड़ी निंदा कर चुकी हैं।

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पहला यात्री : यदि हिमाचल में बहुत सारे राष्ट्रीय राजमार्ग बन जाएंगे, तो क्या होगा?

दूसरा यात्री : तब सभी हिमाचली सड़क पर आ जाएंगे।

मेलः singhnk7@gmail.com

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