मूल्यांकन की मांग करते पच्चीस वर्ष

Jul 26th, 2016 12:15 am

newsडा. भरत झुनझुनवाला

(लेखक, आर्थिक विश्लेषक एवं टिप्पणीकार हैं)

आर्थिक सुधारों की पच्चीसवीं बरसी पर मुक्त व्यापार के सिद्धांतों पर पुनर्विचार करने की जरूरत है। वित्त मंत्री मनमोहन सिंह द्वारा शुरू किए गए आर्थिक सुधारों के दो हिस्से थे। एक हिस्सा घरेलू सुधारों का था, जैसे उद्योग लगाने के लिए लाइसेंस व्यवस्था को रद्द करना। इस दिशा में मनमोहन सिंह द्वारा उठाए गए कदमों को स्पष्ट रूप से देश को लाभ हुआ है, लेकिन बाहरी उदारीकरण का न तो विशेष लाभ हुआ है, न ही यह टिकाऊ सिद्ध हो रहा है…

25 वर्ष पूर्व इन्हीं दिनों वित्त मंत्री मनमोहन सिंह द्वारा बजट प्रस्तुत कर आर्थिक सुधारों को प्रारंभ किया गया था। इन सुधारों का एक प्रमुख आयाम दुनिया के देशों के बीच खुला व्यापार था। 1995 में हमने डब्ल्यूटीओ संधि पर हस्ताक्षर किए थे। इस संधि के अंतर्गत हमने स्वीकार किया था कि निर्धारित सीमा से अधिक आयात कर आरोपित नहीं किए जाएंगे। इससे विश्व व्यापार को गति मिली, लेकिन कई देशों ने डब्ल्यूटीओ से आगे बढ़कर द्विपक्षीय समझौते किए हैं। उनका मानना था कि डब्ल्यूटीओ के प्रावधान पर्याप्त नहीं हैं। इन द्विपक्षीय समझौतों को फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (एफटीए) कहा जाता है। जैसे भारत द्वारा यूरोपीय यूनियन के साथ एफटीए संपन्न करने के प्रयास किए जा रहे हैं। यूरोपीयन यूनियन में यूरोप के प्रमुख देश जैसे फ्रांस, जर्मनी तथा इटली सम्मिलित हैं। एफटीए संपन्न होने के बाद दोनों पक्षों के बीच व्यापार और आसान हो जाता है। दोनों पक्षों द्वारा न्यून आयात कर लगाए जाते हैं। मान्यता है कि एफटीए संपन्न होने से यूरोपियन बाजार हमारे निर्यातों के लिए खुल जाएंगे। भारत में फैक्टरियां लगेंगी। कपड़े, टेलीविजन तथा कार जैसे माल तथा सॉफ्टवेयर जैसी सेवाओं के निर्यात से भारत में भारी मात्रा में रोजगार पैदा होंगे। चीन ने इस नीति को अपनाकर अपनी जनता की आय में भारी वृद्धि हासिल की है। इस दृष्टिकोण को अपनाते हुए नीति आयोग के प्रमुख अरविंद पनगढि़या ने कहा है कि हमें विश्व बाजार पर कब्जा स्थापित करना चाहिए। सरकार के सकारात्मक इस मंतव्य का स्वागत है।

डब्ल्यूटीओ संधि तथा द्विपक्षीय एफटीए का दूसरा आयाम पेटेंट कानूनों का है। मूल विचारधारा है कि कंपनियों द्वारा किए गए आविष्कारों को उन्हें 20 वर्षों तक बेचने का एकाधिकार होना चाहिए। किसी दूसरे को इनका उत्पादन करके बेचने की छूट नहीं दी जानी चाहिए। एफटीए तथा पेटेंट कानूनों के बीच घनिष्ठ संबंध हैं। विकसित देश अपने बाजार को हमारे निर्यात के लिए तभी खोलते हैं, जब उनकी कंपनियों को पेटेंट की कड़ी सुरक्षा उपलब्ध कराई जाए। एफटीए के अंतर्गत बढ़े हुए निर्यातों से हमें लाभ होता है, लेकिन साथ-साथ कड़े पेटेंट कानून से हमें महंगे माल खरीदने पड़ते हैं और इस सौदे में हानि होती है। एफटीए के आकलन के लिए जरूरी है कि लाभ-हानि दोनों का समग्र आकलन किया जाए। मेरी जानकारी में नीति आयोग ने ऐसा अध्ययन नहीं कराया है।

विकसित देशों के बाजार हमारे लिए खुलेंगे, इसमें भी संदेह है। वर्ष 1995 में डब्ल्यूटीओ संधि के संपन्न होने के बाद विश्व व्यापार में अप्रत्याशित वृद्धि हुई है, लेकिन अब इसके दुष्परिणाम सामने आने लगे हैं। विकसित देशों की जनता एफटीए के विरोध में खड़ी हो रही है। अमरीका में इस वर्ष के अंत में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव के प्रत्याशियों ने आयातों पर अधिक टैक्स लगाने की वकालत की है। डेमोक्रेटिक प्रत्याशी हिलेरी क्लिंटन ने कहा है कि मैक्सिको तथा कनाडा के साथ संपन्न हुए एफटीए में सुधार की जरूरत है। रिपब्लिकन प्रत्याशी डोनल्ड ट्रंप ने सभी एफटीए में संशोधन करने की मांग की है और दूसरे पक्ष द्वारा संशोधन नहीं किए जाने पर इन्हें रद्द करने की मांग की है। ऐसा ही वातावरण इंग्लैंड में बन रहा है। वर्तमान में इंग्लैंड यूरोपीय यूनियन का सदस्य है। यूरोपीय देशों में बने माल तथा उनके श्रमिकों को इंग्लैंड में आने-जाने की पूरी छूट है। इससे इंग्लैंड के श्रमिकों के रोजगार का हनन हो रहा है। इंग्लैंड में पिछले माह जनमत संग्रह हुआ, जिसमें इंग्लैंड की जनता ने निर्णय दिया कि वह यूरोपीय यूनियन से बाहर आना चाहती है। यूरोप के साथ खुले व्यापार को उसने नकार दिया। स्पष्ट है कि विकसित देशों के मुक्त व्यापार के विरुद्ध जनमत बन रहा है। लोगों का अनुभव है कि मुक्त व्यापार से बड़ी कंपनियों को लाभ होता है और आम जनता को हानि। कंपनियों को पूरे विश्व में फैलने व लाभ कमाने का अवसर मिल जाता है। जैसे भारतीय तथा यूरोपीय यूनियन के बीच एफटीए संपन्न हो जाए तो भारतीय कंपनियों को यूरोप में दवा बेचने का अवसर मिल जाएगा, परंतु यूरोपीय कंपनियों को पेटेंट की कड़ी सुरक्षा उपलब्ध कराने से जनता को महंगी दवा खरीदनी पड़ेगी। नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री जोसेफ  सगलिट्ज ने इस बात को बार-बार कहा है कि मुक्त व्यापार से कंपनियों को लाभ तथा लोगों को हानि होती है। इस परिस्थिति में यूरोपीयन यूनियन समेत दूसरे देशों के साथ से हम एफटीए संपन्न कर लें, तो भी इसके सफल होने में संदेह बना रहेगा।

फिर भी एफटीए संपन्न करने से हमें कुछ लाभ हो सकता है, चूंकि हमारे यहां श्रमिकों के वेतन कम हैं। भारत में माल की उत्पादन लागत कम आती है, लेकिन चीन के सामने हमारी परिस्थिति इसके ठीक विपरीत है। चीन में उत्पादन की लागत हमसे भी कम आती है। अतः यदि हम मुक्त व्यापार के सिद्धांत को मानते हैं तो हमारे माल का यूरोपीय यूनियन को अधिक मात्रा में निर्यात होगा, लेकिन साथ-साथ चीन से सस्ते माल का आयात होगा और भारतीय श्रमिकों के रोजगार का हनन होगा, बिलकुल उसी तरह जैसा कि हमारे माल के निर्यात से अमरीकी श्रमिकों का हो रहा है। अरविंद पनगढि़या जैसे मध्य धारा के अर्थशास्त्रियों का मानना है कि विकसित देशों के साथ मुक्त व्यापार को अपनाकर हम आगे बढ़ेंगे। यह विचारधारा असफल होगी। पहला कारण यह कि विकसित देशों के साथ मुक्त व्यापार समझौता संपन्न हो जाए तो विकसित देशों की कंपनियों को पेटेंट कानून के अंतर्गत भारत में महंगा माल बेचने की छूट मिल जाएगी। बढ़े हुए निर्यातों से हमें हुआ लाभ इस महंगे माल को खरीदने से निरस्त हो जाएगा।

दूसरा कारण है कि विकसित देशों में एफटीए के विरोध में स्वर जोर पकड़ रहा है। ऐसे में इनके द्वारा एफटीए तभी संपन्न किया जाएगा, जब उनकी कंपनियों को भारत में छूट ज्यादा मिले और हमारे निर्यातों को उनके देश में प्रवेश की छूट कम मिले। तीसरा कारण है कि हम यदि मुक्त व्यापार के नियम को मानते हैं, तो चीन के लिए अपने बाजार को खोलना पड़ेगा। हमारे श्रमिकों के रोजगार नष्ट होंगे। अतएव मुक्त बाजार के रास्ते हमारे श्रमिकों का हित नहीं स्थापित होगा, जैसा अमरीका तथा इंग्लैंड में हो रहा है।

आर्थिक सुधारों की पच्चीसवीं बरसी पर मुक्त व्यापार के सिद्धांतों पर पुनर्विचार करने की जरूरत है। वित्त मंत्री मनमोहन सिंह द्वारा शुरू किए गए आर्थिक सुधारों के दो हिस्से थे। एक हिस्सा घरेलू सुधारों का था, जैसे उद्योग लगाने के लिए लाइसेंस व्यवस्था को रद्द करना। इस दिशा में मनमोहन सिंह द्वारा उठाए गए कदमों को स्पष्ट रूप से देश को लाभ हुआ है, लेकिन बाहरी उदारीकरण का न तो विशेष लाभ हुआ है, न ही यह टिकाऊ सिद्ध हो रहा है। अतः सरकार को चाहिए कि घरेलू अर्थव्यवस्था में सुधार पर ध्यान दे। विदेशी निवेश तथा विदेशी बाजारों का अनुभव सुखद नहीं रहा है।

ई-मेल : bharatjj@gmail.com

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