सख्ती से खदेड़ने होंगे कश्मीर से आतंकी

Jul 22nd, 2016 12:15 am

NK SINGHप्रो. एनके सिंह

(लेखक, एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया के पूर्व चेयरमैन हैं)

बेरोजगारी से त्रस्त कश्मीरी उद्योग स्थापित करने की मांग करते रहते हैं, लेकिन हर दिन तो वे बंद घोषित कर देते हैं। उन हालात में कौन वहां उद्योग स्थापित करने का जोखिम उठाएगा? बाढ़ प्रभावितों को राहत पहुंचाने के लिए सेना और अन्य सुरक्षा बलों के जवानों ने अपना एक दिन के वेतन दान किया, लेकिन वहां किसी को क्या परवाह? वे सब कुछ भारत से ले रहे हैं, लेकिन भारत के प्रति वफादारी का उनमें कोई विवेक नहीं है।  सरकार को आतंकी तत्त्वों से सुलह करने की कोई जरूरत नहीं है और उनके साथ सख्ती से निपटना चाहिए

कश्मीर में पिछले कुछ दिनों से मचे उपद्रव को लेकर खूब हो-हल्ला हो रहा है, जिसकी शुरुआत कश्मीर में हिजबुल मुजाहिदीन के कमांडर बुरहान वानी के एक मुठभेड़ में मारे जाने के साथ हुई। वानी की मौत पर अपने कपड़े फाड़ने वाली जमात में कोई यह नहीं कह रहा कि वह आतंकी नहीं था, बल्कि हर कोई इसी बात का रोना रो रहा है कि उसे नहीं मारना चाहिए था। कुछ लोग इन आतंकियों पर सैन्य कार्रवाई के बजाय उनके साथ संवाद स्थापित करने की वकालत कर रहे हैं। जब हमारे जवान सीमा पर गोलीबारी में शहीद हो रहे हैं, उस समय आतंकियों के साथ राजनीतिक संवाद स्थापित करने का बेहूदा तर्क दिया जा रहा है। आज यही सबसे बड़ी समस्या है कि यदि आप खुद को बुद्धिजीवी मानते हैं, तो आपको हर हाल में सरकार का विरोध और अतर्कसंगत बातों का समर्थन करना होगा। हमारा मानना है कि इस पूरे विषय को इसके ऐतिहासिक व राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में देखना होगा। कई मसले राष्ट्रीय हितों से जुड़े होते हैं, जिन पर किसी भी दल को सियासी दखल की इजाजत नहीं होनी चाहिए। कश्मीर लंबे अरसे से आतंकवाद और दंगों का शिकार होता आया है। इस संघर्ष में वर्ष 1989 से लेकर अब तक 47 हजार लोगों समेत 7000 सुरक्षाकर्मी अपनी जान गंवा चुके हैं। यह भी एक दिलचस्प हकीकत है कि करीब 3000 पाकिस्तानी मुल्क के घुसपैठिए कश्मीर की जमीन पर ढेर हो चुके हैं। क्या ये आंकड़े इस बात को साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं कि पाकिस्तान भारतीय क्षेत्र में मुश्किलें बढ़ाने और अस्थिरता पैदा करने में मशगूल है। हाल ही में कुख्यात और स्वघोषित आतंकी बुराहन को सुरक्षाबलों ने मार गिराया, जो फेसबुक पर खुद को रोबिन हुड की तरह किसी नायक के रूप में प्रचारित कर रहा था। इसके बाद पाकिस्तान में बैठे हाफिज सईद सरीखे कई आतंकियों ने बुरहान की मौत पर शोक में आंसू बहाने शुरू कर दिए और उसकी मौत के लिए भारत को कोसना शुरू कर दिया है।

इस पूरे प्रकरण में सबसे दुखद पहलू यह रहा कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने भी उस आतंकी को शहादत देते हुए शहीद का दर्जा दे दिया। एक राष्ट्र ने जिसे आतंकी घोषित कर रखा है, उसकी मौत पर उसे पड़ोसी मुल्क द्वारा शहीद करार दिए जाने के कुत्सित प्रयास की क्या अब विश्व समुदाय कोई भर्त्सना करेगा? आखिर ऐसे कौन से हालात पैदा हो गए थे कि एक मोस्ट वांटेड अपराधी की मौत पर हमारे पड़ोसी मुल्क का मुखिया इस कद्र शोक मना रहा है। अब यह बात यकीनी तौर पर साबित हो चुकी है कि जब खुला युद्ध पाकिस्तान की औकात से बाहर है और अपने शक्तिशाली प्रतिद्वंद्वी से जीत पाना उसके लिए संभव ही नहीं है, तो उसने अब भारत के खिलाफ अघोषित युद्ध छेड़ रखा है। आज जवाहरलाल नेहरू या शेख अब्दुल्ला को कोसना किसी रूप में हमारे लिए उपयोगी नहीं है, लेकिन हमें यह बात भी नहीं भूलनी चाहिए कि महाराजा हरि सिंह ने स्वतंत्रता को बनाए रखने के लिए जो प्रयास किए थे, वही मौजूदा समस्या की जड़ हैं। अनुच्छेद-370 को हर सूरत में निरस्त करके कश्मीर का सभी भारतीय कानूनों के विषय में भारत के साथ संपूर्ण एकीकरण ही इस जटिल समस्या का एकमात्र विकल्प है। इसमें कोई संदेह नहीं कि वर्षों पहले ले लिए जाने योग्य इस निर्णय को अभी उचित समय उपलब्ध नहीं हो पाया है। इसे एक उचित रणनीतिक योजना बनाकर लोगों के स्वीकार योग्य बनाया जाना चाहिए, अन्यथा किसी तरह की जल्दबाजी कई तरह के संघर्षों को जन्म दे सकती है। कश्मीर मसले पर आज जिस तरह के हालात हैं, उसके लिए काफी हद तक भारतीय मीडिया और पत्रकार भी जिम्मेदार हैं। राष्ट्रीय हितों की अनदेखी करते हुए इस तबके के दिलोदिमाग पर अपनी तथाकथित सेकुलरिज्म को साबित करने का अजीबोगरीब सा भूत सवार रहता है। यहां तक कि जो राजनीतिक दल आतंकियों से संवाद के बारे में सोचते हैं या ऐसा विचार करते हैं कि सभी दल मिल-बैठकर इस मसले को सुलझा लेंगे, वे महा सेकुलर होने का ढोंग करते हुए किसी और ही मायावी दुनिया में जी रहे हैं।

जब राज्य में चुनाव हो रहे थे, तो उस दौरान इन लोगों ने उन्हें प्रभावित करने की काशिशें की और आज जब राज्य में लोगों द्वारा चुनी हुई सरकार सत्तासीन है, तो राज्य में मुश्किलें पैदा करने वाले इन लोगों से नए सिरे से बातचीत का सवाल ही कहां से पैदा होता है? अभी हाल ही में राज्य में हुए उप चुनावों में महबूबा मुफ्ती ने जबरदस्त जीत दर्ज करते हुए विरोधी दलों को धूल चटाई है। क्या उनकी यह जीत उनके पक्ष में विशाल जनसमर्थन को नहीं दर्शाती? बुरहान वानी के जनाजे पर जुटी भीड़ किसी तरह की अशांति का संकेत नहीं है। यह महज फेसबुक से मिली लोकप्रियता की हत्या के प्रति भावनात्मक प्रतिक्रिया थी। जब भड़की हुई भीड़ सुरक्षाबलों पर पथराव करती है, उनके वाहनों को नदी में फेंकती है या फिर अपनी हिफाजत के लिए अपने बच्चों का सहारा लेती है, तो ये तमाम दृश्य एक नियोजित संघर्ष को ही बयां करते हैं। वहां सूफी मत को मानने वालों पर भी हमला किया गया, जिन्होंने बाकायदा टेलीविजन स्क्रीन पर आकर राज्य में अस्थिरता पैदा करने के लिए विदेशी फंडिंग की बात कबूल की थी। अब अलगाववादी नेताओं को ही देख लीजिए, जो किसी किसी लोकतांत्रिक प्रक्रिया से चुनकर नहीं आए हैं, बल्कि घाटी के चंद हुड़दंगियों के बीच ये स्वघोषित नेता हैं। गिलानी या उनके शागिर्दों का उदय यहीं से हुआ है। उनके बच्चे बेहतरीन स्कूलों में पढ़ रहे हैं या भारत और विदेश में उच्च पदों पर नौकरी कर रहे हैं, लेकिन वे कश्मीर के दूसरे बच्चों को गोलियों का सामना करने के लिए उकसाते हैं। थोड़े-थोड़े अंतराल पर वहां सुरक्षाकर्मियों की कार्रवाई होती रहती है और उसके बाद वे बंद घोषित कर देते हैं। परिणामस्वरूप कश्मीर को अपने अस्तित्व के लिए भारतीय सहायता पर निर्भर रहना पड़ता है। बेरोजगारी से त्रस्त कश्मीरी उद्योग स्थापित करने की मांग करते रहते हैं, लेकिन हर दिन तो वे बंद घोषित कर देते हैं। उन हालात में कौन वहां उद्योग स्थापित करने का जोखिम उठाएगा? बाढ़ प्रभावितों को राहत पहुंचाने के लिए सेना और अन्य सुरक्षा बलों के जवानों ने अपना एक दिन के वेतन दान किया, लेकिन वहां किसी को क्या परवाह? वे सब कुछ भारत से ले रहे हैं, लेकिन भारत के प्रति वफादारी का उनमें कोई विवेक नहीं है। सरकार को आतंकी तत्त्वों से सुलह करने की कोई जरूरत नहीं है और उनके साथ सख्ती से निपटना चाहिए। इस दौरान असल परीक्षा उन्हें सुशासन देने और भटके हुए लोगों को अलगाववादी तत्त्वों के चंगुल से मुक्त करवाने की रहेगी।

बस स्टैंड

पहला यात्री : केजरीवाल ने स्वर्ण मंदिर में बरतनों की सफाई की, लेकिन कुछ लोगों का दावा है कि उन्होंने धुले हुए बरतनों को ही फिर से धोया?

दूसरा यात्री : आम आदमी भी पंजाब पहुंचकर खास बन गया।

मेलः singhnk7@gmail.com

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