सागर माला पर कई सवाल

By: Jul 19th, 2016 12:16 am

डा. भरत झुनझुनवाला लेखक

( आर्थिक विश्लेषक एवं टिप्पणीकार हैं )

नदी के पानी को साफ  रखने में मछली का बहुत महत्त्व है। यह कूड़े को खाकर पानी को साफ कर देती है। जलमार्ग बनाने के लिए डे्रजिंग की जाएगी, जिससे मछली मरेगी और गंगा का पानी दूषित होगा। जलमार्ग योजना वास्तव में देश के प्राकृतिक संसाधनों को आम आदमी से छीन कर अमीर तक पहुंचाएगी। इस योजना से मछली मरेगी। मछुआरे मरेंगे। पानी दूषित होगा। आम आदमी गंगा में स्नान ज्यादा करता है। उसका सुख जाता रहेगा। योजना का लाभ अमीरों को पहुंचेगा…

केंद्र सरकार ने गंगा पर इलाहाबाद से हल्दिया तक जहाज चलाने का निर्णय लिया है। इस मंतव्य को लागू करने के लिए एक जहाज पटना से रामनगर के लिए रवाना हुआ था। जहाज को बनारस में राजघाट पर राज्य के जंगल विभाग ने रोक लिया। राजघाट से रामनगर तक की 10 किलोमीटर की दूरी को कछुओं के संरक्षण के लिए कछुआ सेंक्चुरी घोषित किया गया है। वन विभाग का कहना है कि कछुआ सेंक्चुरी में बड़े जहाज को चलाने से कछुओं को नुकसान होगा। यूं तो बात छोटी सी दिखती है। अनेक विद्वानों का मत है कि कछुओं को बचाने के नाम पर देश के आर्थिक विकास को नहीं रोकना चाहिए। मान्यता है कि गंगा पर जहाज चलाने से ढुलाई का खर्च घटेगा और देश समृद्ध होगा, लेकिन वास्तविकता इसके विपरीत है। पानी के जहाजों से ढुलाई सस्ती नहीं पड़ती है।

गंगा को जलमार्ग में बदलने की योजना को अमरीका में मिसीसिप्पी नदी की तर्ज पर बनाया गया है। यह नदी अमरीका के उत्तरी राज्यों से गेहूं आदि को दक्षिणी तट पर स्थित बंदरगाहों तक पहुंचाती है, लेकिन इस नदी पर ढुलाई का अनुभव सुखद नहीं रहा है। पहली समस्या है कि सूखे के समय नदी में पानी कम हो जाता है। पानी कम होने से जहाजरानी के लिए उपयुक्त नदी की चौड़ाई कम हो जाती है। नदी में पानी अधिक होने से जहाज 100 मीटर की चौड़ाई में चल सकते है। पानी कम होने से 50 मीटर की चौड़ाई में ही उपयुक्त गहराई का पानी उपलब्ध होता है। जैसे सिंगल लाइन की रेल टे्रक पर रेलगाड़ी एक-दूसरे को स्टेशन पर ही पार करती है। ऐसी ही स्थिति मिसीसिप्पी जलमार्ग की हो जाती है। एक जहाज रुक कर दूसरे को पास देता है। इससे ढुलाई में समय एवं खर्च दोनों ज्यादा आते हैं। रेल तथा रोड की तुलना में जलमार्ग जलवायु पर ज्यादा निर्भर रहता है, इसलिए स्थायी नहीं होता है।

नदी से ढुलाई सस्ती भी नहीं पड़ती है। देश की संसदीय समिति के सामने नेशनल थर्मल पावर कारपोरेशन ने कहा था कि रेल की तुलना में जलमार्ग से ढुलाई मामूली ही सस्ती पड़ती है, चूंकि ढुलाई एक तरफ  होती है। नेशनल थर्मल पावर कारपोरेशन के अनुसार जहाजों को इलाहाबाद से हल्दिया को वापसी ढुलाई के लिए माल नहीं मिलता है। इन्हें खाली जाना पड़ता है। इसलिए ढुलाई का यह मार्ग सस्ता नहीं पड़ता है। इसी तर्ज पर इनलैंड वाटर-वे अथारिटी कमेटी के सामने कहा था कि नदी में अढ़ाई मीटर से अधिक पानी होने पर नदी से ढुलाई सस्ती पड़ती है, परंतु इससे कम होने पर ढुलाई ज्यादा पड़ती है। ज्ञात हो कि इलाहाबाद से बनारस तक वर्तमान में पानी की गहराई डेढ़ मीटर रह जाती है अतः इस क्षेत्र में जलमार्ग सफल होने में संदेह है। गंगा से सिंचाई के लिए उत्तरोत्तर अधिक पानी निकाला जा रहा है। इसलिए आने वाले समय में जलस्तर के और घटने की संभावना है। ऐसे में ढुलाई का खर्च और अधिक बढ़ सकता है। ग्लोबल वार्मिंग के कारण भी वर्षा के पैटर्न में परिवर्तन होने को है। अनुमान है कि अधिक मात्रा में वर्षा कम समय में होगी। ऐसे में गर्मी के माह में गंगा में पानी का स्तर कम रहेगा।

केंद्र सरकार ने पूर्व में योजना बनाई थी कि इलाहाबाद से पटना के बीच बैराज बनाकर गंगा को चार-पांच बड़े तालाबों में तबदील कर दिया जाएगा। जाहिर है कि ऐसा करने से संपूर्ण नदी तंत्र पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ना तय था, लेकिन जनता के विरोध के कारण सरकार को पीछे हटना पड़ा। वर्तमान योजना है कि बैराज नहीं बनाए जाएंगे। इसके स्थान पर नदी की बालू को हटाकर एक संकरा एवं गहरा चैनल बना दिया जाएगा। इस चैनल में जहाज चलाए जाएंगे। वर्तमान में नदी फैल कर बहती है। इसकी गहराई हर स्थान पर एक समान नहीं हाती। कहीं एड़ी तक का पानी होता है, तो कहीं डूब जाने लायक। डे्रजिंग करने के बाद पूरा पानी सिमट कर एक चैनल में समा जाएगा। जो जीव-जंतु छिछले पानी में जीते थे, वे मर जाएंगे। इस दृष्टिकोण को अपनाते हुए केरल राज्य ने संसदीय समिति के सामने कहा था कि ‘गहराई बढ़ाने के लिए नदी में डे्रजिंग करना पर्यावरण के लिए हानिकारक होगा। नदी के मुंह पर समुद्र का खारा पानी अधिक मात्रा में प्रवेश करेगा। मछलियों के प्रजनन पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा।’ ज्ञात हो कि कई मछलियां छिछले पानी में अंडे देती हैं। छिछला पानी उपलब्ध न होने पर उनका प्रजनन चक्र अवरुद्ध हो जाता है।

गंगा से सिंचाई के लिए पानी निकालने एवं फरक्का बैराज बनाने का पहले ही मछलियों पर भयंकर दुष्प्रभाव पड़ चुका है। सेंट्रल इनलैंड फिशरीज इंस्टीच्यूट कोलकाता ने इस दुष्प्रभाव की पुष्टि की है। पूर्व में इलाहाबाद तक हिलसा मछली पाई जाती थी। फरक्का बैराज बनने के कारण समुद्र से चलने वाली हिलसा फरक्का के आगे नहीं पहुंच रही है, उसका आवागमन अवरुद्ध हो गया है और अब यह केवल गंगा के निचले हिस्से में पाई जाती है। ऊपरी हिस्सों में भी मछुआरों का धंधा चौथाई रह गया है, चूंकि गंगा में पानी कम है और मछलियां नरोरा के ऊपर तथा फरक्का के नीचे आवागमन नहीं कर पा रही है। जो मछली बची है, वह डे्रजिंग से समाप्त हो जाएगी। नदी के पानी को साफ  रखने में मछली का बहुत महत्त्व है। यह कूड़े को खाकर पानी को साफ कर देती है। जलमार्ग बनाने के लिए डे्रजिंग की जाएगी, जिससे मछली मरेगी और गंगा का पानी दूषित होगा।

जलमार्ग योजना वास्तव में देश के प्राकृतिक संसाधनों को आम आदमी से छीन कर अमीर तक पहुंचाएगी। इस योजना से मछली मरेगी। मछुआरे मरेंगे। पानी दूषित होगा। आम आदमी गंगा में स्नान ज्यादा करता है। उसका सुख जाता रहेगा। योजना का लाभ अमीरों को पहुंचेगा। वर्तमान में जलमार्ग का विकास करने का मुख्य उद्देश्य आयातित कोयले को हल्दिया बंदरगाह से इलाहबाद में बनने वाले थर्मल पावर प्लांट तक पहुंचाने का है। आयातित कोयला पटना तथा इलाहबाद के पास लगे बिजली प्लांटों तक आसानी से पहुंच सकेगा। इनसे बनी बिजली सस्ती पड़ेगी। बिजली की खपत अमीरों द्वारा ही ज्यादा की जाती है। सस्ती बिजली के उपयोग से जो माल बनाया जाता है, वह भी अधिकतर अमीरों द्वारा ही खरीदा जाता है। इस प्रकार जलमार्ग के विकास से नदी को गरीब से छीन कर अमीर को दिया जा रहा है। मामला नदी को गरीब से छीन कर अमीर को देने का है। प्रधानमंत्री मोदी ने सत्तारूढ़ होने के बाद कहा था कि गंगा से कुछ लेना नहीं है, केवल देना है। उनकी सरकार गंगा से मछली और आम आदमी का गंगा स्नान का सुख छीन रही है, बदले में दिया जा रहा है बड़े जहाज।

ई-मेल : bharatjj@gmail.com

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