स्वयं से शुरू करें स्वच्छता का सफर

(राजेश वर्मा लेखक, बलद्वाड़ा, मंडी से हैं)

यदि हम धार्मिक व ऐतिहासिक स्थलों को प्रदूषण मुक्त देखना चाहते हैं, तो पहल हमें खुद से करनी होगी। प्रशासन को भी सख्त कदम उठाने होंगे, तभी आने वाले समय में इन स्थलों का अस्तित्व बच पाएगा अन्यथा एक बार जाने के बाद कोई भी वहां दोबारा नहीं जाना चाहेगा…

पिछले सप्ताह मंडी जिला के ऐतिहासिक पर्यटन स्थल रिवालसर में जाने का मौका मिला। ये तीनों धर्मों का पूजनीय स्थल है। लोमाश ऋषि का मंदिर, बौद्ध आस्था से जुड़े बौद्ध गोंपा व सिख धर्म की आस्था का प्रतीक एक गुरुद्वारा-ये तीनों स्थल यहां की पद्मसंभव नामक झील के किनारे बसे हुए हैं। खैर मैं आज इसके इतिहास की बात नहीं करूंगा। मैं बात करूंगा इस इतिहास को संजोने व इसके रखरखाव के प्रति पर्यटकों व स्थानीय लोगों की जिम्मेदारी की। मैं परिवार सहित वहां पहुंचा और पहुंचते ही सबसे पहले वहां गंदगी से स्वागत हुआ। झील के किनारे घास के गलने-सड़ने से फैली ऐसी दुर्गंध मानों बेहोश करने पर आमादा हो।

हालांकि प्रशासन व सरकार द्वारा इसके रखरखाव के लिए काफी कुछ किया गया है, परंतु इस किए-कराए पर हम लोग ही पानी फेर देते हैं। झील को प्रदूषण मुक्त बनाने के लिए प्रशासन ने झील के अंदर मछलियों को आटा, मक्का, बिस्कुट या अन्य खाद्य पदार्थ डालने पर भी पाबंदी लगा रखी है। लोगों की आस्था को ध्यान में रखते हुए प्रशासन ने मछलियों को ये सब डालने के लिए एक जगह झील के किनारे चिन्हित की है, जहां आप इनको खाद्य व अन्य सामग्री डाल सकते हैं। झील के अन्य स्थानों पर ऐसा करने की मनाही है। जगह-जगह ऐसा न करने के साइन बोर्ड भी लगाए गए हैं। मैंने भी परिवार सहित चिन्हित स्थान पर मछलियों को आटा खिलाया। फिर जैसे ही मैं झील के किनारे भ्रमण करने लगा तो देखा कि लोग जगह-जगह मछलियों को खाद्य पदार्थ डाल रहे हैं। एकमात्र कर्मचारी, जिसकी ड्यूटी लोगों को ऐसा करने से रोकने के लिए लगाई गई है, वह कभी एक तरफ  भाग कर आ रहा है तो कभी दूसरी तरफ  भाग कर जा रहा है, लेकिन लोग नहीं मानते। वे मना करने के बावजूद ऐसा कार्य करते जाते हैं। एक जगह मैंने भी कुछेक लोगों को ऐसा करने से मना किया। मैंने कहा यदि आपने ऐसा करना है तो आप झील के उस छोर पर जाएं, जहां प्रशासन ने स्थान चिन्हित किया है, लेकिन लोग नहीं माने। जब मैंने दोबारा कहा कि यदि आपने ऐसा किया तो आपको जुर्माना होगा तथा इसके लिए वह कर्मचारी अभी आपकी तरफ  आ रहा है तो वे लोग एकदम से वहां से चल दिए। यानी कि जुर्माने के डर से हम नियमों को मान लेते हैं, अन्यथा नहीं। यह कैसी आस्था है, जो आपको आपके ही धार्मिक स्थलों को दूषित करने को कहती है।

सबसे बड़ा आश्चर्य तब होता है, जब खुद को पढ़ा-लिखा बताने वाले अनपढ़ों से भी ऊपर काम करते हैं। जब इन धार्मिक व पर्यटन स्थलों पर ऐसा न करने के साइन बोर्ड लगाए होते हैं, तो फिर हम उनकी अनदेखी कैसे कर देते हैं, समझ से परे है। वहीं महज जुर्माने व सजा के डर से हम मान जाते हैं। आखिर हमारी यह कैसी जिम्मेदारी है, अपने प्रदेश के सभी स्थलों के प्रति? कोई भी धर्म आस्था के नाम पर इन स्थलों को प्रदूषित करने की इजाजत नहीं देता। यदि हम अपनी आस्था के लिए मछलियों को कुछ डालना भी चाहते हैं, तो वह थोड़ी मात्रा में चिन्हित जगह पर डालने से भी हो सकती है । जरूरी नहीं हमारे एक किलो, पांच किलो या दस किलो से अधिक खाद्य पदार्थ प्रतिबंधित स्थान पर डालने से ही हमारी आस्था की पहचान होगी। हर चीज की प्रशासन व सरकार से ही उम्मीद करना बेमानी है। आखिर हमें भी तो अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। यह स्थिति रिवालसर की ही नहीं, कमोबेश प्रदेश के तमाम मंदिरों व पर्यटन स्थलों में भी ऐसा ही आलम है। हम मंदिर में आस्था से जाते हैं, लेकिन वहां जाकर अपनी तरफ  से साफ-सफाई तो क्या करनी, उल्टा तरह-तरह से गंदगी फेंक कर आ जाते हैं। हमें औरों की फैलाई गंदगी तो नजर आ जाती है, परंतु अपने द्वारा किया ऐसा कार्य नजर नहीं आता। सबसे बड़ी विडंबना तो यह है कि जब इन स्थानों पर लिखित दिशा-निर्देश लगे होते हैं, तब भी पढ़ा-लिखा वर्ग इसकी अवहेलना करता नजर आता है, फिर हम औरों से क्या उम्मीद कर सकते हैं। आखिर क्यों नहीं हम भी अपनी  जिम्मेदारी समझ पाते?

प्रदेश को देवभूमि के नाम से जाना जाता है। देश-विदेश से लोग भी इसी देवभूमि के सौंदर्य व आस्था के कारण ही यहां आते हैं, लेकिन यदि यही हाल और यही सोच रही तो वह दिन दूर नहीं, जब इन जगहों पर कोई भी नहीं आएगा। एक तरफ  हम इनके रखरखाव की जिम्मेदारी प्रशासन से चाहते हैं, वहीं यदि प्रशासन कोई सख्त कदम उठाता है तो भी हम विरोध करने पर उतारू हो जाते हैं। तो फिर आखिर हम इन जगहों को कैसे प्रदूषण मुक्त रख पाएंगे? मैं तो यही समझता हूं कि यदि हम इन जगहों को प्रदूषण मुक्त देखना चाहते हैं, तो पहल हमें खुद से करनी होगी। वहीं प्रशासन को भी सख्त कदम उठाने होंगे, तभी आने वाले समय में इन ऐतिहासिक धार्मिक व पर्यटन स्थलों का अस्तित्व बच पाएगा अन्यथा एक बार जाने के बाद कोई भी वहां दोबारा नहीं जाना चाहेगा।

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-संपादक

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