थरूर के ‘अध्यक्षीय’ विधेयक पर ध्यान देना जरूरी

भानु धमीजा लेखक

( चर्चित किताब ‘व्हाई इंडिया नीड्ज दि प्रेजिडेंशियल सिस्टम’ के रचनाकार हैं)

शहरी स्थानीय निकायों को स्वशासन की संस्थाएं बनाने को 20 वर्ष पूर्व किया गया 74वां संविधान संशोधन असफल रहा है। लेकिन अब उम्मीद दिख रही है। तिरुवंनतपुरम से कांग्रेस के सांसद शशि थरूर ने इन विकारों को दूर करने के लिए संसद में एक विधेयक प्रस्तुत किया है। लोकसभा में बिना शोर-शराबे इस माह पेश किया गया थरूर का विधेयक सीधा मसले की जड़ तक जाता है। यह स्थानीय म्युनिसिपल निकायों को शक्तिशाली बनाना चाहता है…

भारतीय शहर पूर्णतया अस्त-व्यस्त है क्योंकि स्थानीय सरकारें पूरी तरह अयोग्य और गैर जिम्मेदार हैं। शहरी स्थानीय निकायों को स्वशासन की संस्थाएं बनाने को 20 वर्ष पूर्व किया गया 74वां संविधान संशोधन असफल रहा है। लेकिन अब उम्मीद दिख रही है। तिरुवंनतपुरम से कांग्रेस के सांसद शशि थरूर ने इन विकारों को दूर करने के लिए संसद में एक विधेयक प्रस्तुत किया है। लोकसभा में बिना शोर-शराबे इस माह पेश किया गया थरूर का विधेयक सीधा मसले की जड़ तक जाता है। यह स्थानीय म्युनिसिपल निकायों को शक्तिशाली बनाना चाहता है। यह उन्हें स्वायत्तता देता है, उन्हें आत्मनिर्भर बनाता है, राज्य सरकारों को उन्हें शक्तियां देने के लिए मजबूर करता है, और उनके संविधान का पुनर्निर्माण करता है। इसमें सबसे अच्छी बात है कि यह नगर निकाय के अध्यक्ष के प्रत्यक पर निर्वाचन पर जोर देता है। विधेयक अपने उद्देश्यों में स्पष्ट कहता है कि ‘‘एक प्रत्यक्ष निर्वाचित मेयर, राजनीतिक, कार्यात्मक व बजट संबंधी स्वायत्तता से पूरी तरह लैस होगा और कस्बे अथवा नगर का शासन चलाने के लिए स्वामित्व व उत्तरदायित्व दोनों तय करेगा।’’

विधेयक का लक्ष्य स्थानीय स्तरों पर नेतृत्व का विखंडन रोकना, विकेंद्रीकरण सुधारना और जिम्मेदारी बढ़ाना है। अगर हम अपने नगरों में बेहतर शासन चाहते हैं तो यह बहुत उपयोगी लक्ष्य है। नेतृत्व का विखंडन हमारे नगरों की गंभीर समस्या है। हमारे मुख्यमंत्री, विधायक, सांसद, उपायुक्त, नगर निकाय आयुक्त, पार्षद और मेयर के बीच उत्तरदायित्वों की खिचड़ी है। कोई स्पष्टता नहीं कि कौन, किस चीज के लिए जवाबदेह है। इसी प्रकार, विकेंद्रीकरण भी अति आवश्यक है। दूर स्थित नेता या सरकारें संभवतया पहुंच या प्रशासनिक गुणवत्ता उपलब्ध नहीं करवा सकते। सरकार का उत्तरदायित्व स्पष्ट करना भी समय की आवश्यकता है, जब हम अपने नगरों को प्रदूषण, ट्रैफिक जाम, बाढ़ से डूबी गलियों में घुटते जीवन की समग्र खराब गुणवत्ता को देखते हैं।

विधेयक के कई प्रस्ताव अमरीकी अध्यक्षीय व्यवस्था के नगरीय सरकारों के समान हैं। एक प्रत्यक्ष निर्वाचित मेयर उनकी एक विख्यात विशेषता है। लेकिन थरूर के मेयर की अन्य समानताएं भी हैं : एक तय कार्यकाल; नगर निकाय की बैठकों में वोट का अधिकार नहीं; और सबसे महत्त्वपूर्ण, म्युनिसिपिलिटी के निर्णयों को वीटो करने की शक्ति। हालांकि एक महत्त्वपूर्ण नजरिए से प्रस्तावित योजना अध्यक्षीय व्यवस्था से भिन्न है। मेयर को नगर निकाय के अन्य निर्वाचित सदस्यों की एक परिषद दी गई है। यह विशुद्ध अध्यक्षीय व्यवस्था, और कार्यकारी व विधायी पदाधिकारियों के पृथक्करण के सिद्धांत, से अलग है। थरूर के विधेयक में मध्यावधि चुनावों की अध्यक्षीय संकल्पना भी गायब है। इसके अंतर्गत, मेयर और नगर निकाय, दोनों समानांतर कार्यकालों के लिए चुने जाएंगे।

यह विधेयक नगरों को अच्छे नेता उपलब्ध करवाएगा, और उनकी मनमानी पर रोक लगाएगा, लेकिन नगर निकायों को असल शक्तियां दिलाने की थरूर की क्या योजना है? उनका समाधान राज्य सरकारों के लिए यह अनिवार्य करना है कि वे संविधान की 12वीं अनुसूची के अनुरूप सभी शक्तियां स्थानीय सरकारों को दें। राज्यों को शक्तियां नगर निकायों को दिए जाने से संबंधित खंड में, उनका विधेयक ‘‘दी जा सकती हैं’’ (may) को ‘‘दी जाएंगी’’ (shall) में बदलता है – यही हल जीएसटी विधेयक को पारित करने के लिए हाल ही में निकाल गया। इसके अतिरिक्त विधेयक नगर निकायों को फंड जुटाने का अधिकार भी देता है। थरूर कहते हैं, ‘‘नगर नेतृत्व को सचमुच सशक्त करने के लिए, तदनुसार कार्यात्मक, पदाधिकार संबंधी और आर्थिक हस्तांतरण आवश्यक हैं।’’ विधेयक और भी आगे जाता है। इसके विकेंद्रीकरण को एक नई सीमा तक ले जाया गया है। नगर सरकारों को प्रभावी बनाने के लिए, यह प्रति वार्ड समिति जनसंख्या को तीन लाख से घटाकर एक लाख करता है। और क्षेत्र सभाएं बनाने का प्रावधान रखता है जो पांच मतदान केंद्रों तक से बनी होंगी, और जिनकी पदाधिकारी भी प्रत्यक्ष निर्वाचित होंगे।

थरूर ने एक दूरगामी, व्यावहारिक और दूरदर्शी विधेयक प्रस्तुत किया है, लेकिन यह शायद लोकसभा में पास नहीं होगा। विधेयक के समक्ष तीन प्रमुख रुकावटें हैं। पहली यह कि राज्य इसे पारित होने की अनुमति नहीं देंगे क्योंकि यह उनके अधिकार क्षेत्र का अतिक्रमण करता है। विधायक या मुख्यमंत्री क्यों एक मेयर को अधिक महत्त्वपूर्ण बनने देंगे? इसी कारण 74वां संविधान संशोधन असफल रहा है। मौजूदा व्यवस्था के तहत सांसदों और विधायकों को सरकारी धन से उनके चुनाव क्षेत्रों में अधिशाषी परियोजनाएं (सांसद आदर्श ग्राम योजना, सांसद क्षेत्रीय विकास योजना, इत्यादि) के माध्यम से लुभाया जा रहा है। वे सब थरूर के प्रस्ताव के खिलाफ एकजुट हो जाएंगे। विधेयक की दूसरी रुकावट है विशुद्ध राजनीति। प्रस्ताव को न भाजपा और न ही कांग्रेस से समर्थन की उम्मीद है, क्योंकि यह सभी प्रमुख पार्टियों के लिए खतरा है। एक प्रत्यक्ष निर्वाचित मेयर एक छोटे राजनीतिक दल से या बतौर निर्दलीय उभर सकता है। ठीक ऐसा ही शिमला में हुआ।

भाजपा और कांग्रेस ने परिषद पर नियंत्रण हासिल किया, जबकि प्रत्यक्ष निर्वाचन से मेयर सीपीआई (एम) से आया। परिणामस्वरूप कोई भी मुख्य राजनीतिक दल मेयर को सफल नहीं होने देना चाहता। मात्र एक कार्यकाल के बाद ही सरकार ने प्रत्यक्ष निर्वाचन समाप्त कर दिया। थरूर की अंतिम समस्या है भारत का अत्यधिक दलगत कानून निर्माण। प्राइवेट मेंबर विधेयकों के पारित होने का कोई चांस नहीं, विशेषतया उन विधेयकों का जो एक विपक्षी दल की ओर से पेश हुए हों। इतिहास में मात्र 14 प्राइवेट मेंबर विधेयक ही पारित हुए हैं, और 1970 के बाद एक भी नहीं। लेकिन मुझे खुशी है कि थरूर अच्छे नेतृत्व का प्रदर्शन करते हुए यह विधेयक सामने लाए। वास्तव में मेरी पुस्तक ‘‘व्हाई इंडिया नीड्स दि प्रेजिडेंशियल सिस्टम’’ की लांचिंग से ही मैं उन पर जोर डाल रहा था कि वह भारत को अध्यक्षीय व्यवस्था अपनाने की दिशा में बढ़ने को विधेयक लाएं। महीनों से मैं उन्हें एक पूर्ण रूपांतरण के लिए प्रस्ताव लाने को कह रहा था, मात्र स्थानीय सरकारों के लिए नहीं। इस मुख्य कारण ऊपर दी गई यह रुकावटें ही था। अध्यक्षीय व्यवस्था को टुकड़ों में अपनाना ज्यादा कठिन है।

हालांकि जून में थरूर ने एक ट्वीट के माध्यम से स्पष्ट कहा कि यह विधेयक अध्यक्षीय व्यवस्था की तरफ पहला कदम होगा। थरूर के इस प्रयास के बाद भारतीय संसद के पास अध्यक्षीय व्यवस्था लाने को अब दो औपचारिक प्रस्ताव हैं। दोनों मुख्य पार्टियों के सुसम्मानित नेताओं ने प्रयास किए हैं। इससे पहले वर्ष 2013 में भाजपा महासचिव राजीव प्रताप रूडी ने राज्यसभा से ‘‘केंद्र व राज्यों में मुख्य कार्यकारी के लिए प्रत्यक्ष निर्वाचन,’’ और ‘‘विधायिका से कार्यपालिका को पृथक करने’’ का प्रस्ताव पारित करने को कहा था। मैं थरूर के विधेयक का भरपूर समर्थन करता हूं। हम सभी जानते हैं कि भारत के नगर बदहाल हैं। अनियंत्रित ट्रैफिक, सड़क में गड्ढों, श्वास संबंधी तकलीफों और गिरते भवनों से हम और बच्चों की जानें गवाएंगे, या अभी कदम उठाएंगे?

साभारः हफिंग्टन पोस्ट व टाइम्स ऑफ इंडिया

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