स्वायत्त राज्यों से ही मजबूत बनेगा भारत

 

भानु धमीजा लेखक

( चर्चित किताब ‘व्हाई इंडिया नीड्ज दि प्रेजिडेंशियल सिस्टम’ के रचनाकार हैं )

सच्चाई यह है कि ‘‘अनेकता में एकता’’ के भेस में विविध जनता को एक संघ में बलपूर्वक शामिल करने से बात नहीं बनती। बात इससे बनेगी कि उन्हें एक मजबूत संघीय सरकार के बख्तरबंद समझौते-नेहरू के ‘‘जोड़ने वाले सीमेंट’’- के तहत स्व-शासन की स्वतंत्रता दी जाए। एक ऐसा विकेंद्रीकृत ढांचा उपलब्ध करवाएं जिसमें स्थानीय सरकारों को स्वायत्तता मिले, फिर भी राष्ट्रीय सरकार का प्रभुत्व हो। राज्यों के पास संबंध-विच्छेद का कोई प्रावधान न हो, और वे समान राष्ट्रीय संविधान व समान नागरिक संहिता (यूनिफार्म सिविल कोड) का पालन करें।

कश्मीर में हिंसा की वापसी एक बार फिर भारतीय संघटन की कमजोरियां दर्शाती है। एक चिरपरिचित आतंकी अलगाववादी सुरक्षा बलों द्वारा ढेर किया जाता है, पर शक्तिशाली प्रधानमंत्री के संपूर्ण आशीर्वाद से चल रही राज्य की स्थानीय मुस्लिम सरकार विरोध प्रदर्शनों को एक बड़ा संकट बनने से नहीं रोक पाई। 45 से अधिक लोग मारे गए, कर्फ्यू हफ्तों तक बढ़ाया गया, मीडिया का मुंह बंद कर दिया गया, और फिर भी हजारों लोग सड़कों पर उतर आए। इस अशांति ने भारत की संसद को भी बाधित कर दिया और गृह मंत्री को सत्र के बीच राज्य का विशेष दौरा करने के लिए मजबूर होना पड़ा। सबसे बुरी बात यह कि इसने पाकिस्तान को भारत के आंतरिक मसले में फिर अपनी नाक घुसाने का अवसर दे दिया।

कश्मीर भारतीय विद्रोहों में सबसे प्रमुख है लेकिन विद्रोह कई अन्य हैं। दिल्ली स्थित संघर्ष प्रबंधन संस्थान (पंजाब के खालिस्तान विद्रोह पर लगाम लगाने वाले सेवानिवृत्त पुलिस महानिदेशक केपीएस गिल द्वारा स्थापित) के अनुसार, भारत में 224 आतंकी, विद्रोही और चरमपंथी गुट हैं, जो एक दर्जन से अधिक राज्यों में सक्रिय हैं। भारतीय सेना के एक सेवानिवृत्त मेजर जनरल की वर्ष 2010 की एक रिपोर्ट के अनुसार वामपंथी माओवादी विद्रोह देश भर के 20 राज्यों में उपस्थित था। इस रिपोर्ट में जिक्र था कि स्वतंत्रता के बाद भारत द्वारा लड़े गए पांच युद्धों की अपेक्षा आंतरिक संघर्षों में ज्यादा लोगों की जान गई।

भारतीय राज्यों में हिंसा मात्र राजनीतिक विद्रोहों तक सीमित नहीं है। देश ने राज्यों के मध्य संघर्ष हर विषय पर देखे हैं। जलस्रोतों पर (असम बनाम अरुणाचल, हरियाणा बनाम पंजाब, कनार्टक बनाम तमिलनाडु); जातीय निवासों पर (पश्चिम बंगाल में गोरखालैंड, असम में बोडोलैंड, राजस्थान में मरू प्रदेश); क्षेत्रीय असमानता पर (तेलंगाना, झारखंड, छत्तीसगढ़); राजधानियों पर (चंडीगढ़, हैदराबाद), इत्यादि। ये उदाहरण भाषायी और सांप्रदायिक असहमतियों पर वर्षों चले हिंसक संघर्षों के अलावा हैं, जिनमें कश्मीर का संघर्ष भी शामिल है। ये एक मजबूत संघटन के लक्षण नहीं हैं। यह संघर्ष उन मूलभूत सिद्धांतों में संशोधन की अति आवश्यकता को रेखांकित करते हैं जिन पर भारतीय संघटन बने रहने की उम्मीद करता है।भारतीय सोच थी कि विविधता को नियंत्रण की आवश्यकता होती है। मान्यता थी कि एक बहुलवादी समाज स्वाभाविक रूप से केंद्र से दूर जाने वाला होता है, इसलिए इसे पूर्णतयः बिखरने से बचाने के लिए एक बाहरी शक्ति आवश्यक है। निश्चित रूप से, यह विचार विभाजन के आघात और स्वतंत्रता के समय राज्यों की बहुतायत से प्रभावित थे। लेकिन वे विचार भारतीय संविधान में एक अव्यावहारिक सिद्धांत बना गए। और यह था ‘‘एक मजबूत केंद्र द्वारा संचालित संघ’’ का सिद्धांत। परन्तु परिभाषा के अनुसार, एक संघ को राजनीतिक रूप से स्वायत्त राज्य सरकारों की आवश्यकता होती है, जो केंद्रीय नियंत्रण के सिद्धांत के विपरीत है।

भारत के सिद्धांत की अव्यावहारिकता हमारा संविधान बनाते समय भी स्पष्ट थी। सबसे संजीदा उदाहरण राज्यपाल के पद से जुड़ा है। आरंभिक दिनों में भारत की संविधान सभा ने-सरदार पटेल की अनुशंसा पर-यह अंगीकार किया था कि हर राज्य का राज्यपाल राज्य के लोगों द्वारा प्रत्यक्ष निर्वाचित किया जाएगा। लेकिन यह निर्णय बदलना पड़ा। क्योंकि सभा की कार्यवाहियों में यह बाद में स्पष्ट हुआ कि एक प्रत्यक्ष निर्वाचित राज्यपाल राज्य सरकारों पर केंद्र का नियंत्रण लगभग असंभव बना देगा। भारतीय संविधान सभा में कोई बड़ा निर्णय बदले जाने का यह एकमात्र मामला था।

‘‘मजबूत केंद्र’’ का यह सिद्धांत भारत के लगभग सभी राज्य विवादों के पीछे छिपा है, और भारत की एकता को चोट पहुंचा रहा है। यह निष्कर्ष कई विश्लेषकों द्वारा निकाला गया है। भारतीय लोकतंत्र का कालक्रम से इतिहास लिखने वाले ग्रैनविल ऑस्टिन ने लिखा कि ‘‘अति केंद्रीकरण ने केंद्र-राज्य संबंधी कई संवैधानिक प्रावधानों को असंतुलित कर दिया और एकता को ठेस पहुंचाई।’’ इसी प्रकार, न्यायमूर्ति सरकारिया, जिनके केंद्र-राज्य संबंधों पर गठित प्रसिद्ध आयोग ने मसले का 1980 के दशक में अध्ययन किया था, भारत की कार्य करने की ‘‘व्यक्तिगत शैली’’ के प्रति तिरस्कार व्यक्त किया। उन्होंने लिखा, यह ‘‘संघीय व्यवस्था की बढ़त रोक देता है जो कि द्वि-स्तरीय लोकतांत्रिक राजनीति के स्वास्थ्य और सुचारू रूप से कार्य करने के लिए अनिवार्य है।’’ मेरे स्तंभों ने भी यह दिखाया है कि केंद्रीय दखलअंदाजी ने कैसे सीमावर्ती राज्यों में भारत की सुरक्षा को खतरे में डाला, और राज्य सरकारों के स्थानीय उत्तरदायित्व को आघात पहुंचाया है। यहां तक कि पंडित नेहरू ने भी सोचा था कि स्थानीय सरकारों को उचित स्वायत्तता देना आवश्यक है। उन्होंने वर्ष 1946 में डिस्कवरी ऑफ इंडिया में लिखा :

‘‘एकता की समस्या और पाकिस्तान के प्रति दृष्टिकोण का रास्ता निराकार और भावुकता में नहीं, बल्कि व्यावहारिकता पर आधारित है।… वह दृष्टिकोण हमें कुछ स्पष्ट निष्कर्षों पर ले जाता है, कि कुछ महत्त्वपूर्ण कार्यों और मसलों के संबंध में समूचे भारत के लिए एक जोड़ने वाला सीमेंट आवश्यक है। इनके अतिरिक्त, घटक इकाइयों के लिए संपूर्ण स्वतंत्रता हो सकती है और होनी चाहिए, और एक ऐसा मध्यवर्ती दायरा होना चाहिए जहां संयुक्त व अलग कामकाज दोनों हों।’’ यहां तक कि वह घटक इकाइयों को संबंध-विच्छेद का अधिकार देने को भी तैयार थे। उन्होंने बड़े राष्ट्रीय क्षेत्रों के विषय में लिखा कि वह ‘‘एक विशाल राज्य की तरह काम करे लेकिन स्थानीय स्वायत्तता के साथ।’’ उन्होंने कहा, ‘‘क्योंकि छोटे देश अब अभिशप्त हैं।’’

क्या इस प्रकार की विचारधारा कश्मीर के लिए अभी भी उपयुक्त है? विचार कीजिए कि 2009 में जिसे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने ‘‘बड़ी उपलब्धि’’ कहा था और जिस पर जनरल मुशर्रफ और वह लगभग एक समझौते पर पहुंच गए थे, वह ‘‘एक गैर-प्रादेशिक समाधान’’ था। कश्मीर विशेषज्ञ एजी नूरानी के शब्दों में ः ‘‘यह एक तदर्थ समझौता था जिसके तहत भारतीय सैनिक सीमाओं पर वापस बुला लिए जाएंगे, और नियंत्रण रेखा ‘अप्रासंगिक’ हो जाएगी। इससे जम्मू-कश्मीर राज्य वस्तुतः फिर एक हो जाएंगे। साथ ही राज्य के दोनों (भारत-पाकिस्तान) भागों में स्वशासन होगा, जिसके ऊपर एक संयुक्त तंत्र काम करेगा।’’ नूरानी के अनुसार कश्मीर के लिए किसी उच्च स्तरीय समझौते के तहत स्व-शासन ‘‘बेहतरीन रास्ता’’ था।

सच्चाई यह है कि ‘‘अनेकता में एकता’’ के भेस में विविध जनता को एक संघ में बलपूर्वक शामिल करने से बात नहीं बनती। बात इससे बनेगी कि उन्हें एक मजबूत संघीय सरकार के बख्तरबंद समझौते – नेहरू के ‘‘जोड़ने वाले सीमेंट’’ – के तहत स्व-शासन की स्वतंत्रता दी जाए। एक ऐसा विकेंद्रीकृत ढांचा उपलब्ध करवाएं जिसमें स्थानीय सरकारों को स्वायत्तता मिले, फिर भी राष्ट्रीय सरकार का प्रभुत्व हो। राज्यों के पास संबंध-विच्छेद का कोई प्रावधान न हो, और वे समान राष्ट्रीय संविधान व समान नागरिक संहिता (यूनिफार्म सिविल कोड) का पालन करें। इस प्रकार राज्यों को सब नियामतें हासिल होंगीः घरेलू मसलों में संपूर्ण अधिकार, राष्ट्रीय योजनाओं में उचित हक, और एक बड़े आकार वाले देश के लाभ। एक मजबूत संघ का हिस्सा बने रहने में उनको हर प्रकार से लाभ होगा।

ट्विटर पर : @BhanuDhamija

साभार : The Huffington Post

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