हिमाचल में लगेगी रेशम उद्योग इकाई

newsभुंतर— सालों से मार्केट की राह देख रहा प्रदेश का रेशम उद्योग अब पटरी पर लौटेगा। प्रदेश में रेशम उद्योग की पहली यूनिट स्थापित करने की तैयारी आरंभ हो गई है। इस यूनिट में करोड़ों रुपए की लागत से बनी करीब 36 टन वजनी विशेष रियरिंग मशीन लगेगी। एसआरडीसी, सेरीकल्चर रिसर्च एंड डिवेलपमेंट काउंसिल दिल्ली ने इसके लिए हामी भरी है। हालांकि काउंसिल ने इसके लिए प्रदेश में करीब 8000 बीघा जमीन पर रेशम की खेती करने की शर्त भी रखी है। काउंसिल की इस पहल से प्र्रदेश में रेशम उत्पादन में जुटे लोगों को अपने उत्पाद को बेचने का जरिया मिलेगा, साथ ही हजारों किसानों को इससे सीधा लाभ भी होगा। एसआरडीसी ने उक्त यूनिट को स्थापित करने के लिए प्रदेश में इस क्षेत्र से जुड़ी संस्थाओं के माध्यम से पहल की है। इन संस्थाओं को जोड़कर प्रदेश में एक सोसायटी या बोर्ड बनाने की भी योजना है। इसी कड़ी में हमीरपुर के कांगू में एसआरडीसी के निदेशक मंडल की एक अहम बैठक प्रदेश की दो दर्जन से अधिक अग्रणी कृषि संस्थाओं के साथ हुई है, जिसमें उक्त प्रोजेक्ट को लेकर रणनीति पर चर्चा हुई। कार्यक्रम के दौरान एसआरडीसी के प्रबंध निदेशक राजेश पाटिल ने कहा कि काउंसिल प्रदेश में तैयार होने वाले रेशम के लिए कीट उपलब्ध करवाएगी तो उत्पाद को भी घर द्वार जाकर खरीदेगी। उक्त प्रोजेक्ट के तहत प्रदेश के आठ जिलों में पहले स्तर पर कार्य होगा और हर खंड में विभिन्न एजेंसियों को इसका कार्य सौंपा जाएगा। एसआरडीसी के नॉर्थ जोन के सलाहकार इकबाल सिंह ठाकुर ने कहा कि किसानों को आधुनिक तरीके से इसकी खेती करने के लिए प्रेरित किया जाएगा। कार्यक्रम में नादौन के विधायक विजय अग्निहोत्री ने रेशम उद्योग को बढ़ावा देने के लिए हो रहे प्रयासों को सराहा।

ट्राइबल में मूंगा या टसर के जरिए उत्पादन

प्रोजेक्ट के तहत प्रदेश के जनजातीय जिलों में मूंगा या टसर के पौधे के जरिए रेशम उत्पादन करने की योजना पर सहमति बनी। एसआरडीसी के प्रबंधक सुनील कश्यप ने बताया कि ट्राइबल एरिया में यह महत्त्वपूर्ण साबित हुआ है। मेघालय में जिस तकनीक से उत्पादन हो रहा है, वही तकनीक प्रदेश में भी लागू की जाएगी।

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