‘कश्मीरियत, जम्हूरियत, इनसानियत’: सोची-समझी रणनीति

भानु धमीजा लेखक

( सीएमडी, ‘दिव्य हिमाचल’ लेखक, चर्चित किताब ‘व्हाई इंडिया नीड्ज दि प्रेजिडेंशियल सिस्टम’ के रचनाकार हैं )

प्रधानमंत्री वाजपेयी ने उक्त नारा 2003 में कश्मीर में एक भाषण के दौरान दिया था। उन्होंने संसद में इसकी व्याख्या की कि ‘‘मुद्दे सुलझाए जा सकते हैं यदि हम इनसानियत (मानवता), जम्हूरियत (लोकतंत्र) और कश्मीरियत (कश्मीर के सदियों पुराने हिंदू-मुस्लिम भाईचारे की विरासत) के तीन सिद्धांतों का अनुसरण करें।’’ आजकल मीडिया में उनके नारे के अलग-अलग मायने बताए जा रहे हैं। दि इंडियन एक्सप्रेस  ने हाल ही में एक लेख में कहा ‘‘3 शब्द, व्याख्या के 5 तरीके।’’ और प्रसिद्ध स्तंभकार प्रताप भानु मेहता केवल पूछते ही रह गए कि ‘‘कश्मीरियत क्या है? या इनसानियत? या जम्हूरियत?’’…

कश्मीर को भारत की एक सर्वोच्च उपलब्धि में बदला जा सकता है। ऐसी उपलब्धि जो भारत की महानता को दर्शाए। लेकिन इसके लिए नए सिरे से विचार करना होगा। 70 वर्षों की विफल राजनीति, पाकिस्तान के साथ तीन युद्धों, और राज्य में 40,000 से अधिक लोगों की हानि के बाद आज यह कहना सही होगा कि परंपरागत विचारधारा से बात नहीं बन रही है। मैं यहां एक सोचा-समझा नया प्रस्ताव प्रस्तुत कर रहा हूं, जो अब प्रसिद्ध हो चुके नारों-‘कश्मीरियत, जम्हूरियत, इनसानियत’ इत्यादि-को व्यवहारिक सिद्धांतों में परिवर्तित करने पर आधारित है। प्रधानमंत्री वाजपेयी ने उक्त नारा 2003 में कश्मीर में एक भाषण के दौरान दिया था। उन्होंने संसद में इसकी व्याख्या की कि ‘‘मुद्दे सुलझाए जा सकते हैं यदि हम इनसानियत (मानवता), जम्हूरियत (लोकतंत्र) और कश्मीरियत (कश्मीर के सदियों पुराने हिंदू-मुस्लिम भाईचारे की विरासत) के तीन सिद्धांतों का अनुसरण करें।’’ आजकल मीडिया में उनके नारे के अलग-अलग मायने बताए जा रहे हैं। दि इंडियन एक्सप्रेस ने हाल ही में एक लेख में कहा ‘‘3 शब्द, व्याख्या के 5 तरीके।’’ और प्रसिद्ध स्तंभकार प्रताप भानु मेहता केवल पूछते ही रह गए कि ‘‘कश्मीरियत क्या है? या इनसानियत? या जम्हूरियत?’’ दुर्भाग्यवश वाजपेयी स्वयं आगे मार्गदर्शन को उपलब्ध नहीं हैं।

यह अर्थपूर्ण है कि मायने स्पष्ट न होने के बावजूद यह नारा एक दशक से भी अधिक समय तक गूंजता रहा है। यह शायद इसलिए कि यह नारा यह कहता है कि भारत के पास एक सर्वहितकारी नई रणनीति है। लेकिन वायपेयी की सरकार जाती रही और नारा गायब हो गया। प्रधानमंत्री मोदी ने इसे 2014 में पुनर्जीवित किया, यह कहकर कि यह उनका मंत्र है। हालांकि कश्मीर में उनकी नीति को ताजा झटकों के बाद उनके अनुगामियों ने एक और शब्द जोड़ दिया, ‘‘भारतीयता।’’ वह यह बताने की कोशिश थी कि कश्मीर को अलग-थलग नहीं देखा जा सकता। यह हर शब्द उपयोगी सिद्धांतों में अनुवादित होना चाहिए, क्योंकि ये कश्मीर समस्या के महत्त्वपूर्ण पहलू हैं। परंतु ऐसा करने से पहले हमें उन दो बड़े मुद्दों को संबोधित करना होगा जिनको स्पष्टता से नहीं देखा जा रहा है ः पाकिस्तान, और भारत के राष्ट्रवादी। पाकिस्तान की कश्मीर में रुचि कुछ और नहीं बल्कि धार्मिक महत्त्वाकांक्षा है। एक स्वयं-भू इस्लामिक राष्ट्र अन्य लोगों व क्षेत्रों को इस्लाम के दायरे में लाने का अपना मुख्य उद्देश्य पूरा कर रहा है। इसकी राजनीतिक व सामाजिक व्यवस्था, शहादत की संस्कृति को बढ़ावा देकर, इस उद्देश्य में जुटे अतिवादियों को उकसाती है। और इसकी सेना राष्ट्रीय नीति के तौर पर हिंसक जेहाद को बढ़ावा देती है। देश की सुरक्षा के उद्देश्य से नहीं, बल्कि इस्लाम की विचारधारा के तहत। पाकिस्तान कश्मीर में एक धर्म निरपेक्ष क्षेत्र बनाने का इच्छुक नहीं है।

एक भारतीय विचाराधारा का कश्मीर बनाने में पाकिस्तान से किसी भी रचनात्मक मदद की अपेक्षा करना मूर्खता होगी। भारतीय कश्मीर में इसे किसी भी प्रकार से जोड़े रखने का कोई भी प्रस्ताव केवल इसे मुस्लिमों को और भड़काने का तरीका ही मुहैया करवाएगा। बेहतर यह है कि पाकिस्तान को भारतीय कश्मीर से दूर रखकर अपनी सीमाओं को सुरक्षित किया जाए। व्यक्तियों के बीच परस्पर संपर्कों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए, पर वीजा जारी करने से पूर्व संपूर्ण जांच-परख हो जाने के बाद। अगर पाकिस्तान किन्हीं अन्य संबंधों पर जोर देता है तो पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर को भी वार्ता का हिस्सा बनाना चाहिए। और अगर यह खुलेआम या छिपकर सैन्य गतिविधियां जारी रखता है तो जवाब उसी तर्ज पर और जोरदार होना चाहिए। क्या कश्मीर के मुसलमान पाकिस्तान को इस प्रकार किनारे करने की इजाजत देंगे? इसका उत्तर इस शेष प्रस्ताव में निहित है, और इस पर कि हिंदू राष्ट्रवादियों के प्रति भारत क्या नजरिया रखता है।

राष्ट्रप्रेम के भेस में कई भारतीय राष्ट्रवादियों ने यह ठान लिया है कि कश्मीर को ताकत के दम पर पकड़े रखना चाहिए। उनका निष्कर्ष है कि कश्मीरी मुस्लिम केवल देश का एक और बंटवारा व एक निर्बल हिंदू भारत देखना चाहते हैं। ये राष्ट्रवादी सोचते हैं कि भारत की ओर से कोई भी रियायत केवल उस लक्ष्य को बढ़ावा देगी। परंतु इतिहास में शक्ति के बूते किसी समाज को हमेशा के लिए बांधे नहीं रखा जा सका। सात दशकों के प्रयास ने कश्मीरी जनता को केवल भारत से और पृथक ही किया है। लंदन आधारित एक स्वतंत्र प्रबुद्ध मंडल के 2010 के एक सर्वेक्षण में स्वतंत्रता के लिए कश्मीर में समर्थन बढ़ता पाया गया। इसलिए कोई भी ऐसा प्रयास जिसका तात्पर्य शक्ति का निरंतर प्रयोग हो, केवल मूर्खता होगी।

किसी भी योजना की सफलता के लिए सबसे पहले ‘कश्मीरियत’ को संबोधित किया जाना चाहिए। हर विश्लेषक ने कहा है कि कश्मीर की मुख्य समस्या स्थानीय लोगों को राजनीतिक शक्तियां न सौंपना है। लोग स्वतंत्रता और स्वशासन चाहते हैं। वर्ष 1953 की योजना ने कश्मीर को स्थानीय मुद्दों पर नियंत्रण दिया; केंद्र के पास मात्र तीन काम रहे – सुरक्षा, विदेश मामले और संचार। परंतु धारा 370 और भारतीय संविधान के अन्य प्रावधानों ने केंद्र का प्रभुत्व जारी रखा। कश्मीर को वास्तविक स्वायत्तता दी जानी चाहिए। मात्र स्थानीय मामलों- पुलिस, न्यायिक व्यवस्था, जनस्वास्थ्य, आदि- ही नहीं बल्कि उनके अपने चुनावों के संचालन पर भी। केंद्र को अपना नियंत्रण डिफेंस, सीमा सुरक्षा, विदेश मामले, धन, और अंतराज्यीय मुद्दों तक सीमित रखना चाहिए।‘जम्हूरियत’ सार्थक करने के लिए राज्य का अपना संविधान होना उचित है। परंतु भारत के संविधान में कश्मीर को विशेष दर्जा हरगिज नहीं होना चाहिए। धारा-370 निरस्त होनी चाहिए। यह किसी का भला नहीं करती; भारतीय कश्मीर के प्रति स्पैशल व्यवहार से घृणा करते हैं, और कश्मीरी इसे राज्य को नियंत्रित करने की एक धूर्त व्यवस्था के रूप में देखते हैं। कश्मीर का संविधान, जिसमें इसकी विधानसभा द्वारा बदलाव किया जा सकता है, को ये प्रमाणित विशेषताएं शामिल करने के लिए संशोधित किया जाना चाहिए :

1) एक प्रत्यक्ष निर्वाचित गवर्नर

2) दो सदनों की विधायिका, जिसका एक प्रकोष्ठ हर क्षेत्र (जम्मू, कश्मीर घाटी, लद्दाख) की जनता का प्रतिनिधित्व करे, और दूसरा हर क्षेत्र को समान प्रतिनिधित्व दे।

3) राज्य के कानूनों पर निर्णय करने को एक उच्च न्यायालय।

4) सरकार की इन शाखाओं के बीच शक्तियों का वास्तविक पृथक्करण।

गर्वनर और विधायिका केवल जनता के प्रति जवाबदेह हों, और जब तक राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरा न हो, केंद्र के पास राज्य सरकार भंग करने की शक्ति न हो। ‘इनसानियत’ के लिए कश्मीरी और गैर कश्मीरियों दोनों से समान व्यवहार होना चाहिए। आर्म्ड फोर्सेस स्पेशल पावर एक्ट जैसे घृणित और कड़े कानून हटाए जाने चाहिएं और इनके विरोध में जेल में डाले गए कश्मीरी रिहा होने चाहिए। राज्य के लोगों को भारत में स्वतंत्र रूप से आने-जाने की अनुमति होनी चाहिए, और सभी भारतीयों को राज्य में संपत्ति खरीदने की आजादी। विस्थापित कश्मीरी पंडितों को घर वापसी की इजाजत होनी चाहिए। साथ ही कश्मीर के संविधान को सभी के लिए धर्म व अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गारंटी देनी होगी। और ‘भारतीयता’ मांग करती है कि भारत की सुरक्षा व अखंडता पर किसी प्रकार का कोई संकट न हो। इस समय राज्य में मौजूद 7,00,000 सैनिकों को केंद्र को पाकिस्तान के बार्डर पर भेज देना चाहिए। राज्य सरकार को आंतरिक, और केंद्र को वाह्य सुरक्षा की पूरी जिम्मेदारी होनी चाहिए। इस योजना से भारत को कोई नुकसान नहीं होगा। भारत का सीमा पर नियंत्रण मजबूत होगा; राज्य में जनमत संग्रह की मांग आखिरकार खत्म होगी; अधिक गैर-मुस्लिम लोग राज्य में बसने के लिए आएंगे; और भारत का सम्मान  दुनिया भर में बढ़ेगा। यह योजना प्रमाणिक है, क्योंकि यह अमरीका में दो शताब्दियों से इस्तेमाल किए जा रहे संघवाद और शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांतों पर आधारित है। शक्ति के बजाय कश्मीर को नैतिक सिद्धांतों से शासित कर भारत एक उदाहरण स्थापित करेगा कि महान लोग विविधता में कैसे रहते हैं। और यह वास्तव में गर्व का विषय होगा।

-साभार

हफिंगटन पोस्ट/टाइम्स ऑफ इंडिया

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