जवाबदेह शहरी प्रबंधन के लिए थरूर की पहल

newsप्रो. एनके सिंह

(लेखक, एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया के पूर्व चेयरमैन हैं)

हम कार्य की ऐसी परंपरा विकसित करने में नाकाम ही रहे हैं, जिसमें भिन्न पृष्ठभमि व विचार के अवयवों के साथ काम किया जा सके। आम तौर पर परिषद और महापौर के बीच मतभेद होता है और परिषद के सदस्य इस स्थिति से बाहर निकलना चाहते हैं। यदि थरूर के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया जाता है, तो इसका उत्तर दिया जा सकता है, लेकिन विधानसभाओं और उनकी पार्टी में भी शक्ति संरचना इस विधेयक की भावना को समर्थन करने वाली नहीं है। हालांकि इस विधेयक के पास होने की संभवना बहुत कम है, लेकिन यह बहुत जरूरी है और प्रधानमंत्री ने भी इसका स्वागत किया है…

संभवतया आजादी के दिनों से ही शहरी प्रबंधन में पसरी अव्यवस्थाओं के कारण यह समूचा तंत्र अस्त-व्यस्त पड़ा हुआ है और इसके प्रति किसी एक पद की स्पष्ट जवाबदेही न होने के कारण यह खंडित अवस्था में नजर आता है। स्थानीय शासन के तहत छोटे शहरों में नगर परिषद, जबकि बड़े शहरों में निगम परिषद तथा महापौर चुने जाते हैं। मैं अकसर बनारस के महापौर से उसकी यह व्यथा सुनता हूं कि जब भी कोई विदेशी प्रतिनिधिमंडल किसी अध्ययन या हमारी सहायता के लिए आता है, तो वह सबसे पहले महापौर से मिलने की बात करता है। विदेशों के वे प्रतिनिधि इस बात के प्रति विश्वस्त हो चुके होते हैं कि महापौर ही शहरों के लिए जिम्मेदार व जवाबदेह होता है। लेकिन जब हम वहां काम कर रहे थे, तो महापौर ने हमें बताया कि जब शहर से संबंधित कोई रिपोर्ट प्रधानमंत्री के पास भेजने की बात आती है, तो देश के कई हिस्सों में महापौर के पास पूरे शहर का जिम्मा नहीं होता। इस संदर्भ में उनके पास शहर के एक ही हिस्से का जिम्मा होता है और वह भी सीमित शक्तियों के साथ।

आगे अपनी बात को पूरा करने के लिए उन्होंने एक उदाहरण का इस्तेमाल करते हुए बताया कि बनारस के घाट पर करीब दो दर्जन से  भी ज्यादा संगठन सक्रिय हैं, लेकिन उन्होंने कभी किसी विषय से हमें अवगत करवाना जरूरी नहीं समझा। एक ही शहर में परिषद, महापौर और उसी के साथ राज्य सरकार तथा केंद्र सरकार की कई एजेंसियां काम कर रही होती हैं, फिर भी उनके बीच विभिन्न कार्यों को लेकर कोई आपसी संपर्क नहीं होता। इसका नतीजा यह हुआ कि हमारे शहर एक जिम्मेदार मुखिया के अभाव में निपट भ्रम की स्थिति में उलझ कर रह गए हैं। महापौरों को अधिक शक्तियां प्रदान करने के उद्देश्य से संविधान में 74वां संशोधन किया गया, लेकिन वैकल्पिक व्याख्या ‘कर सकते हैं’ को दर्शाने वाले शुरू के शब्दों की वजह से राज्यों ने इसे नहीं अपनाया है और अब इसमें सुधार करते हुए ‘करना होगा’ को अपनाना होगा।

शशि थरूर ने इस समस्या के निदान के तौर पर एक निजी विधेयक पेश किया है और इसमें शहर के प्रशासन की जिम्मेदारी संभालने वाले महापौर के प्रत्यक्ष चुनाव समेत कई अन्य आवश्यक प्रावधानों को शामिल किया है। कई देशों में आज भी महापौर को जनता द्वारा सीधे मतदान के जरिए चुना जाता है, जबकि कई देशों में जनता द्वारा चुनी हुई परिषद ही महौपार का चुनाव करती है। वास्तव में यह सारा मसला विधायिका और कार्यपालिका की शक्तियों में स्पष्ट विभाजन पर टिका हुआ है। प्रत्यक्ष चुनाव ही एकमात्र ऐसा रास्ता है, जहां से शक्तियों का विभाजन सफलतापूर्वक किया जा सकता है, अन्यथा जब तक कार्यपालिका, विधायिका का हिस्सा रहेगी, शक्तियां एक ही संस्था तक सीमित रहेंगी। अमरीका ने मोंटेस्क्यू के सिद्धांत ने अब सिद्धहस्तता हासिल कर ली है। इसने स्वच्छंद शक्तियों को प्रभावहीन बनाने के लिए शक्तियों के विभाजन की जबरदस्त पैरोकारी की थी। इसके साथ ही राज्य को एक ऐसी स्थिति में ला दिया, जहां इसकी प्रत्येक संस्था का एक-दूसरे पर नियंत्रण रहता है। अमरीका ने अपने शासन के सफल मॉडल को इसी आधार पर बनाया है, जिसकी भानु धमीजा ने अपनी किताब ‘व्हाई इंडिया नीड्ज दि प्रेजिडेंशियल सिस्टम’ में भी व्याख्या की हुई है।

भारत में इसकी शुरुआत के लिए थरूर महापौर के प्रत्यक्ष चुनाव की शुरुआत करवाने के पक्ष में हैं। इसके साथ ही वह चाहते हैं कि महापौर को जरूरत के मुताबिक शक्तियां भी प्रदान की जाएं, ताकि वह उसे सौंपे गए सभी कार्यों को सफलतापूर्वक निष्पादित कर सके। दुर्भाग्य से भारत ने जो संसदीय प्रणाली ब्रिटेन से अपनाई है, उसमें तीनों संस्थाओं यानी विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका का पृथक्करण संभव ही नहीं है। विधायिका, कार्यपालिका का ही एक अंग है, जिसे किसी अलग चुनाव के मार्फत नहीं चुना जाता। हमने ब्रिटेन के मॉडल को अपनाने का प्रयास किया और इस प्रक्रिया में हमारे कुछ प्रतिष्ठान महज अलंकारिक बनकर रह गए हैं, जैसे राष्ट्रपति, राष्ट्रपति की तरह और राज्यपाल, राज्यपाल की तरह व्यवहार नहीं कर पाते।

दिल्ली को एक उप राज्य और उसका भी एक मुख्यमंत्री बनाकर, जो यह मानता है कि वह पूर्ण मुख्यमंत्री है और जिसकी संविधान इजाजत नहीं देती, हमने सबसे बड़ी गलती की है। स्पष्ट नियंत्रण होने के कारण चंडीगढ़ आज एक सुव्यवस्थित शहर है, लेकिन केजरीवाल सरकार वाला दिल्ली, जिसके साथ अनुपयुक्त ढंग से मुख्यमंत्री की पदावली भी जुड़ी हुई है, प्रशासनिक दृष्टि से रसातल में पहुंचता जा रहा है। वहां अब भी शासन उप राज्यपाल और गृह मंत्रालय चला रहे हैं। इन तीन परतों के भीतर एक म्युनिसिपल अथारिटी का स्थान भी आता है, जो कि मुख्यमंत्री के प्रति जवाबदेह नहीं है। यह शासन की एक ऐसी रूपरेखा है, जहां से पूरे शहर की कार्य प्रणाली ठप हो सकती है और इन दिनों कमोबेश ऐसा ही देखने को भी मिल रहा है। जिसे केजरीवाल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की गलती कहते हैं, वह संविधान द्वारा प्रदत्त प्रारूप है, जिसे केजरीवाल समझते तो हैं, लेकिन स्वीकार नहीं करते। ब्रिटिश शासकों द्वारा खींची लाइन पर बढ़ने का ही नतीजा है कि आज हम पूरी तरह से उनके आदी हो चुके हैं और किसी ऐसी प्रणाली की कल्पना तक करने को राजी नहीं, जो राज्य को न्यायपूर्ण व साफ-सुथरा प्रशासन देने में समर्थ है। इसके हमें कई प्रतिगामी परिणाम भी झेलने पड़े हैं। शिमला का ही उदाहरण ले लीजिए, जहां महापौर तो कम्युनिस्ट पार्टी के टिकट से चुना जाता है, जबकि परिषद में अधिकतर सदस्य भाजपा और कांग्रेस के होते हैं।

हम कार्य की ऐसी परंपरा विकसित करने में नाकाम ही रहे हैं, जिसमें भिन्न पृष्ठभमि व विचार के अवयवों के साथ काम किया जा सके। आम तौर पर परिषद और महापौर के बीच मतभेद होता है और परिषद के सदस्य इस स्थिति से बाहर निकलना चाहते हैं। यदि थरूर के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया जाता है, तो इसका उत्तर दिया जा सकता है, लेकिन विधानसभाओं और उनकी पार्टी में भी शक्ति संरचना इस विधेयक की भावना को समर्थन करने वाली नहीं है। हालांकि इस विधेयक के पास होने की संभवना बहुत कम है, लेकिन यह बहुत जरूरी है और प्रधानमंत्री ने भी इसका स्वागत किया है। मैं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से दरख्वास्त करता हूं कि वह शहरों के बेहतर प्रबंधन के लिए पार्टी लाइन से ऊपर उठकर थरूर द्वारा पेश किए गए निजी विधेयक पर उचित ध्यान व समर्थन दें, जो कि उनके खुद के निर्वाचन क्षेत्र की भी जरूरत है।

बस स्टैंड

पहला यात्रीः सरकार बंदरों पर प्रभावी ढंग से नियंत्रण नहीं कर पा रही है और इसके कारण किसान खेती छोड़ने के लिए मजबूर होने लगे हैं।

दूसरा यात्री : किसानों का कहना है कि बंदरों ने तो अब चोरी-छिपे भैंसों का दूध भी निकालना शुरू कर दिया है। अब इसके आगे वे क्या करेंगे, भगवान ही जानें!

ई-मेलः singhnk7@gmail.com

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