तेजी से लुढ़कती आम आदमी पार्टी

Sep 9th, 2016 12:05 am

newsप्रो. एनके सिंह

लेखक, एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया के पूर्व चेयरमैन हैं

‘आप’ की परेशानियों को बढ़ाने वाली ताजातरीन घटना में दिल्ली सरकार के एक मंत्री द्वारा एक महिला के यौन शोषण वाली एक सीडी सामने आई है। इसके पश्चात की करामात उससे भी अफसोसजनक है, जिसमें आरोपी मंत्री के बचाव के लिए उसकी गांधी जी और नेहरू से तुलना करनी शुरू कर दी। संभवतः यह गंदी सियासत की अंतिम हद ही होगी…

आम आदमी पार्टी (आप) का प्रभाव लगातार मद्धिम पड़ता जा रहा है और पार्टी अनिश्चित भविष्य की ओर अग्रसर है। कुछ माह पूर्व पार्टी का ग्राफ ऊंचाइयों को छू रहा था और पंजाब व गोवा में इसके पक्ष में भारी समर्थन देखने को मिल रहा था। अब अचानक से पार्टी के प्रति उत्साह खत्म होता दिख रहा है। यहां तक कि दिल्ली में भी जहां कहीं टैक्सी या स्कूटर चालकों से मैंने इस संदर्भ में सवाल किया, उनका पार्टी के प्रति मोह भंग होता दिखा। पिछले कुछ समय में पार्टी के भीतर घटी कई घटनाओं व फर्जी आचरण से हटे पर्दों ने सफलता की राह पर बढ़ती पार्टी के कदमों को विचलित किया है। दूसरे राजनीतिक दलों से अलग होने के दावे और आचरण के अंतर ने पार्टी की छवि को इतना धूमिल किया है, जितना भाजपा और कांग्रेस भी नहीं कर पाए। ‘आप’ के भीतर भी वही भ्रष्ट चेहरे हैं, जिन्हें व्यवस्था से हटाने के लिए यह दल सियासी मैदान में उतरा था। इसके अलावा ‘आप’ ने भी संगठन पर एकाधिकारप्राप्त नियंत्रण की उपनिवेशवादी परंपरा को आगे बढ़ाया है और अब यह दिखावे की राजनीति से लोकतंत्र को शर्मसार कर रही है। केजरीवाल की स्वेच्छाचारी निर्णयन प्रणाली ने ‘आप’ के सामूहिक सहभागिता और जन आधारित पार्टी के दावों ने जनता को काफी हद तक निराश किया है।

‘आप’ की परेशानियों को बढ़ाने वाली ताजातरीन घटना में दिल्ली सरकार के एक मंत्री द्वारा एक महिला के यौन शोषण वाली एक सीडी सामने आई है। इसके पश्चात की करामात उससे भी अफसोसजनक है, जिसमें आरोपी मंत्री के बचाव के लिए उसकी गांधी जी और नेहरू से तुलना करनी शुरू कर दी। संभवतः यह गंदी सियासत की अंतिम हद ही होगी। इस तरह के मूर्खतापूर्ण ट्वीट के जवाब में एक व्यक्ति ने बिलकुल सटीक टिप्पणी की है, ‘आम आदमी पार्टी के नेता अब जल्द ही ट्रेनों को भी लूटना शुरू कर देंगे और फिर बचाव में तर्क देंगे कि चंद्रशेखर आजाद ने भी स्वतंत्रता संग्राम के दिनों में ऐसा ही किया था।’ केजरीवाल के ईश्वर के समान पवित्र होने के दावे भी अब हवा हो गए हैं। कमोबेश ‘आप’ और अन्य राजनीतिक दलों में कोई फर्क नजर नहीं आता, बल्कि कई मामलों में तो इसकी हालत पहले से हो रही राजनीति से भी बदतर हो चुकी है।

‘आप’ की छवि को नुकसान पहुंचाने वाला दूसरा कारक है संगठन में पारदर्शिता कायम रखने में इसकी विफलता और दिल्ली में निष्क्रियता के लिए न केवल राजग गठबंधन, बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को व्यक्तिगत तौर पर कोसना। केजरीवाल इस अहंकार से ग्रस्त हैं कि वह खुद बनाम मोदी के अलावा किसी अन्य चीज के बारे में सोच ही नहीं रहे। केजरीवाल द्वारा जनता के बीच झूठ बोलने की आदत के कारण, जैसे कि थोड़े दिन पहले ही वह कह रहे थे कि मोदी उनकी हत्या करवाने वाले हैं, पार्टी में पारदर्शिता सरीखे गुण नदारद हैं। यही बात उन्होंने बनारस में भी कही थी और वहां पराजित होने के बाद वह उस बात को भूल गए। केजरीवाल सरकार के मंत्री पत्नी से मारपीट, फर्जी डिग्री या ऐसे ही कई अन्य अपराधों के कारण अपनी और पार्टी की किरकिरी करवा चुके हैं।

आखिर भारत में यह किस किस्म की पार्टी अपनी जड़ें जमाई हैं, जिसकी न कोई जिम्मेदारी है और न ही विश्वसनीयता? इसके बावजूद ‘आप’  प्रभावी ढंग से पंजाब के मतदाताओं को विश्वास दिलाने में सफल रही कि वह राज्य में ड्रग माफिया को उखाड़ फेंकेगी, जो कि आज वहां एक बड़ी समस्या बन चुका है। एक समय तक ‘आप’ पंजाब में बढ़त बनाती दिख रही थी, लेकिन उसी दौरान वह अपने आत्म विध्वंस के खेल में उलझ गई। केजरीवाल ने कहा कि उनके पास पैसा नहीं है, तो उनकी पार्टी के नेताओं ने ज्ञात-अज्ञात किसी भी स्रोत से पैसा जुटाना शुरू कर दिया। छोटेपुर आज जो आरोप संजय सिंह और केजरीवाल पर लगाते रहे हैं, वही काम वह खुद भी करते रहे हैं। इस तरह से पार्टी आज अपनी विश्वसनीयता खो चुकी हैं। छोटेपुर ने पंजाब में पार्टी को खड़ा किया और अचानक उन्हें एक सीडी के आधार पर बिना जांच-पड़ताल या उनसे सीडी में कैद मामले पर बिना स्पष्टीकरण मांगे पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया। राज्य में उनका उल्लेखनीय प्रभाव था।

इसी दौरान जिस तरह का व्यवहार पार्टी ने नवजोत सिंह सिद्धू के साथ किया, वह पार्टी के लिए सबसे ज्यादा घातक साबित हो सकता है। इससे पंजाब में पार्टी की स्थिति में गिरावट आ सकती है। लोकसभा के लिए हुए चुनावों में शिरोमणि अकाली दल के 26.3 फीसदी मतों के साथ चार सीटों के मुकाबले ‘आप’ को पंजाब में 24.4 फीसदी मतों के साथ चार सीटें हासिल हुई थीं। सिद्धू की अच्छी खासी ख्याति है और जनता के बीच वह काफी लोकप्रिय भी हैं। अकालियों के साथ भाजपा के अच्छे संबंध होने के कारण वह सिद्धू को उनका मनचाहा स्थान नहीं दे सकी। उचित स्थान न पा सकने के कारण अब सिद्धू ने एक नया मोर्चा तैयार कर लिया है। पार्टी पर नियंत्रण और नेतृत्व को लेकर पंजाबी बनाम बाहरी की बहस में सिद्धू के तर्क कुछ वैध कहे जा सकते हैं। कमोबेश छोटेपुर को भी इसी बात का शिकवा है कि उन्हें हर काम के लिए केंद्र से नियंत्रित किया जा रहा है। यहां तक कि पंजाब से ‘आप’ के जो सांसद चुने गए हैं, वे भी पार्टी के केंद्रीय नेताओं से चिढ़कर डा. गांधी के नेतृत्व में चलना पसंद करते हैं, जो स्वयं खुद का एक अलग मोर्चा गठित करना चाहते हैं। ‘आप’ के पंजाब से एक अन्य सांसद भगवंत मान शराब पीकर संसद जाने और संसद के गोपनीयता नियमों का उल्लंघन करने सरीखे मूर्खतापूर्ण कृत्यों के लिए विवादों में आ चुके हैं। ऐसा प्रतीत हो रहा है कि पंजाब में ही आम आदमी पार्टी चार मोर्चों में खंडित होने वाली है। पहला मतभेद वाले सांसदों का, दूसरा छोटेपुर का, तीसरा सिद्धू का आवाज-ए-पंजाब और चौथा ‘आप’ के शेष नेताओं का।

पंजाब में जो कुछ भी होगा, केजरीवाल उसके लिए भी जिम्मेदारी नहीं लेंगे। हमेशा की ही तरह वह इस बार भी इसे प्रधानमंत्री द्वारा रचा षड्यंत्र करार दे देंगे। ‘आप’ पंजाब में अपना आधार खो चुकी है और अब यह दूसरे राज्यों में अपना परचम फहराने के सपने देख रही है। ‘आप’ ने अपनी तमाम संभावनाओं को केजरीवाल की निरंकुशता के कारण मिट्टी में मिला दिया है और एक डाक्टर के अनुसार तनाव तथा अन्य रोगों के कारण स्वास्थ्य उनका साथ नहीं दे रहा है और इसी लिए वह दवाओं और योग का सहारा ले रहे हैं। अपनी रोम यात्रा से लौटने के बाद केजरीवाल पंजाब में पार्टी पर एक और कॉमेडियन गुरप्रीत घुग्गी थोप दिया है, जिनके कार्यक्रम बेहद लोकप्रिय होते हैं। अपनी तेज गिरावट को रोकने के लिए ‘आप’ द्वारा किए जाने वाले प्रयास उसके भविष्य को और भी धुंधला बना रहे हैं।

बस स्टैंड

पहला यात्रीः  भरमौरी एक बंदर को मारने के लिए 300 रुपए की घोषणा कैसे कर सकते हैं, जबकि मनरेगा की दिहाड़ी अब भी 150 रुपए है।

दूसरा यात्री : यह मनरेगा के मुकाबले में चलाई गई धांसू बनरेगा योजना है।

ई-मेलः singhnk7@gmail.com

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