पहाड़ी सड़कों पर सफर की चिंताएं

प्रो. एनके सिंह लेखक

( एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया के पूर्व चेयरमैन हैं )

हिमाचल को सड़कों की हालत सुधारने के लिए गंभीर होना होगा, क्योंकि इसके बिना सड़क परिवहन को सुरक्षित बनाने का एजेंडा सफल हो ही नहीं सकता। कोरे सियासी वादों से कभी परिणाम नहीं आते हैं, अतः अब सड़कों के निर्माण और उनकी देखरेख के लिए एक निश्चित रूपरेखा तैयार करते हुए उस पर अमल करना होगा। हिमाचल सरीखे छोटे राज्य के लिए सड़कों की वार्षिक आधार पर मरम्मत करना कोई कठिन काम नहीं है। इस काम को राजनीतिक गुणा-गणित से पर रखकर गंभीरता से लेना चाहिए…

हिमाचल प्रदेश में मई महीने में हुए तीन सड़क हादसों में 41 लोगों की मौत हो गई और 54 लोग घायल हुए थे। इस दौरान प्रभावितों के प्रति सहानुभूति दिखाई गई, समितियां गठित की गईं, कुछ समय तक बस चालक गंभीर हुए और उसके बाद फिर सब कुछ उसी ढर्रे पर आ पहुंचा। इनमें से एक बड़ा हादसा बजरोली पुल के पास हुआ, जिसमें करीब 11 लोगों की मौत हो गई, जबकि 27 लोग इसमें जख्मी हो गए। सड़क यातायात की सुरक्षा के लिहाज से किन्नौर, चंबा और शिमला हमेशा से ही संवेदनशील रहे हैं। तबाही के इस भयावह मंजर को रोकने के स्तर पर कोई प्रगति या उपचार क्यों देखने को नहीं मिलता? इसमें कोई संदेह नहीं कि यदि देश भर में होने वाले सड़क हादसों पर नजर दौड़ाएं तो हिमाचल में सड़क हादसों की संख्या बहुत कम है, क्योंकि यह थोड़ी सी आबादी वाला एक छोटा सा राज्य है।

राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में सड़क हादसों को देखें, तो देश में हर घंटे सड़क हादसों में 16 लोगों की मौत हो जाती है। हर चार मिनट में सड़क पर एक हादसा हो जाता है। योजना आयोग के आंकड़ों के अनुसार हर वर्ष इन हादसों में देश की अर्थव्यवस्था को तकरीबन दस अरब की चपत लग जाती है। राष्ट्रीय राजधानी का रिकार्ड भी इस मामले में ठीक नहीं है और दिल्ली में ब्रिटेन की राजधानी लंदन की तुलना में 40 फीसदी अधिक हादसे होते हैं। हाल ही के समय में हालात में आए बदलाव से विश्लेषकों ने एक सुस्पष्ट सुधार देखा है। इसके अनुसार राष्ट्रीय राजमार्गों पर हादसों में तो गिरावट आई है, इसके विपरीत राज्यों की हालत इस संदर्भ में और भी खराब हो गई है। निश्चित तौर पर इन बढ़ती दुर्घटनाओं के लिए सड़कों की खस्ता हालत भी जिम्मेदार मानी जाएगी।

जब तक राज्य इन दयनीय सड़कों के नेटवर्क को सुधारने की ओर विशेष ध्यान नहीं देंगे, यातायात से संबंधी मुश्किलें दिन-ब-दिन बढ़ती ही जाएंगी। आबादी और आकार के हिसाब से भले ही सड़क हादसों की संख्या के मामले में हिमाचल में दूसरे राज्यों की अपेक्षा हालत कुछ संतोषजनक लगती हो, फिर अन्य छोटे राज्यों की तुलना में यहां हादसों का जोखिम अधिक बना रहता है। एक निश्चित अवधि में अरुणाचल के 67, असम के 538, जम्मू-कश्मीर के 374 सड़क हादसों की तुलना में हिमाचल में 598 घातक हमले हुए हैं। इसकी वजह जानने की कोशिश करें, तो मुख्य तौर पर इसके दो ही कारण नजर आते हैं। एक तरफ जहां यातयात सहायक अधोसंरचना में कई खामियां नजर आती हैं, वहीं हिमाचली यातायात से संबंधित एक तथ्य यह भी है कि यह मुख्य तौर पर सड़क परिवहन पर ही निर्भर रहा है। यातायात के दूसरे विकल्पों, जैसे कि रेल और हवाई यातायात का यहां अपेक्षित विस्तार नहीं हो पाया है। सड़क सुरक्षा के क्षेत्र में निरीक्षण एवं नियंत्रण की भारी उपेक्षा हुई है। लाइसेंस के लिए की जाने वाली पूछताछ को छोड़ दें, तो चालकों के लिए प्रशिक्षण देने की ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है, जिसमें उन्हें सुरक्षित ड्राइविंग के लिए प्रशिक्षित किया जा सके या उन्हें सिखाया जा सके कि यातायात नियमों का पालन कैसे करें। कई चालक बस को सकड़ के किनारे व्यवस्थित ढंग से खड़ा नहीं करते।

इसके उलट कई बार देखने को मिलता है कि दो विपरीत दिशा से आने वाली बसों को बीच सड़क के खड़ा कर दिया जाता है और चालक आपस में गप्पें लड़ाने में मग्न हो जाते हैं। इस अव्यवस्था से पूरा यातायात थम जाता है और वहां विभाग का कोई कर्मचारी भी नहीं होता, जिससे शिकायत की जा सके या उन्हें इस अनाचार से रोका जा सके। बस चालक तीखे मोड़ों से भी बिना हॉर्न बजाए या दूसरी तरफ से आने वाले वाहनों को देखे, तेज रफ्तार से गुजर जाते हैं। बस चालक सामने से आने वाले छोटे वाहनों की परवाह किए बगैर अपने वाहन के आकार और क्षमता को देखते हुए निश्चिंत होकर निकल जाते हैं। जो चालक सड़क सुरक्षा को नजरअंदाज करके सड़क पर गलतियां करते हैं, उन्हें सुधारने के लिए दृष्टिकोण में सुधार संबंधी प्रशिक्षण और मनोवैज्ञानिक परामर्श की जरूरत है। वास्तव में इस लापरवाह रवैये से निपटने और सड़क संस्कृति में सुधार हेतु एक व्यवस्थित प्रशिक्षण पैकेज को अपनाना होगा। यह न केवल ड्राइविंग आदतों को दुरुस्त करेगा, बल्कि सड़क पर चलने वाले पथिकों व छोटे वाहनों की सुरक्षा के लिए भी हितकारी होगा। इसलिए अब इस दिशा में सुधार अपेक्षित है।

वाहनों की प्रगति में तो भारत ने बहुत अध्ययन एवं प्रशिक्षण कर लिए हैं। आज जरूरत है कि चालकों के प्रशिक्षण हेतु भी कुछ कोर्सेज चलाए जाएं। यह भी एक विदित तथ्य है कि मैदानी इलाकों से जो चालक हिमाचल आते हैं, वे नहीं जानते कि पहाड़ी इलाकों में गाड़ी कैसे चलानी है या पहाड़ी सड़कों पर चलते वक्त किन बातों का ध्यान रखना होता है। राज्य की सीमाओं पर ऐसे होर्डिंग लगाने होंगे, जिसमें बाहर से आने वाले चालकों को सतर्कता संबंधी छह नियम बताए जाएं। ये छह नियम हैं-वाहन हमेशा अपनी साइड यानी बायीं तरफ ही चलाएं, एक ही दिशा में जाने वाले वाहनों को रास्ता दें, मोड़ पर हॉर्न का इस्तेमाल अवश्य करें, चढ़ाई चढ़ रहे बड़े वाहनों के बिलकुल साथ न चलें, बड़ी बसों या ट्रालों को एक तरफ रुकते हुए रास्ता दें और फिसलन भरे रास्तों को अच्छी तरह से भांप ले।

प्रदेश में चेक पोस्ट के बजाय पैट्रोलिंग पुलिस की ज्यादा जरूरत है। नियमों का उल्लंघन करने वाले किसी ट्रक को एक स्थान पर रोककर जांच करने के बजाय उन पर पूरे रास्ते में नजर बनाकर रखनी चाहिए। यातायात पुलिस और परिवहन विभाग द्वारा सड़क पर सुरक्षा और सही ड्राइविंग सुनिश्चित करने के लिए सचल निरीक्षकों को तैनात करना चाहिए। लेकिन इन तमाम प्रयासों से बढ़कर राज्य को सड़कों की हालत सुधारने के लिए गंभीर होना होगा, क्योंकि इसके बिना सड़क परिवहन को सुरक्षित बनाने का एजेंडा सफल हो ही नहीं सकता। कोरे सियासी वादों से कभी परिणाम नहीं आते हैं, अतः अब सड़कों के निर्माण और उनकी देखरेख के लिए एक निश्चित रूपरेखा तैयार करते हुए उस पर अमल करना होगा। हिमाचल सरीखे छोटे राज्य के लिए सड़कों की वार्षिक आधार पर मरम्मत करना कोई कठिन काम नहीं है। इस काम को राजनीतिक गुणा-गणित से पर रखकर गंभीरता से लेना चाहिए।

बस स्टैंड

पहला यात्रीः राज्य में सड़क हादसों को नियंत्रित करके के लिए परिवहन मंत्री क्या प्रयास कर रहे हैं?

दूसरा यात्री : वह एक सेमिनार का आयोजन करवा रहे हैं।

ई-मेलः singhnk7@gmail.com

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