ओबामा दिखाते हैं भारत क्यों अपनाए राष्ट्रपति प्रणाली

 भानु धमीजा लेखक

( सीएमडी, ‘दिव्य हिमाचल’ लेखक, चर्चित किताब ‘व्हाई इंडिया नीड्ज दि प्रेजिडेंशियल सिस्टम’ के रचनाकार हैं )

अमरीका के राष्ट्रपति के पास केवल कार्यकारी अधिकार हैं। विधायी एजेंडा कांग्रेस द्वारा नियंत्रित होता है, जो राष्ट्रपति पर एक वास्तविक नियंत्रण साबित हो चुका है। यह व्यवस्था सरकार को एक राजनीतिक दल के बजाय राष्ट्र की भलाई के लिए चलाती है। यह व्यवस्था भारत को भी अपनानी चाहिए। यह देश को बेहतर नीतियों के पीछे एकजुट करती है, लेकिन एक बहुमत को आपे से बाहर होने से रोकती है…

इतिहास ओबामा को एक महान राष्ट्रपति का दर्जा शायद नहीं देगा। वह अमरीका को किसी साहसिक और दूरदर्शी नई दिशा में ले जाने में असफल रहे हैं। उनके कार्य व उनके उत्कृष्ट शब्द जो उन्हें सत्ता में लाए मेल नहीं खाते। लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि उनके दो कार्यकालों के दौरान अमरीका किसी प्रकार से क्षीण हुआ है। दरअसल इसने प्रचुर मात्रा में प्रगति की है। यह दिखाता है कि अमरीका की सफलता का रहस्य वास्तव में इसकी सरकार की प्रणाली है। यह भारत के हित में है कि वह अमरीकी व्यवस्था की मजबूतियों के संबंध में और अधिक जानकारी ले, और देखे कि देश के मुख्य नेता के लड़खड़ाने के बावजूद एक बेहतर व्यवस्था कैसे काम करती है। ओबामा समर्थकों को उनकी कई उपलब्धियों से संतुष्ट होना चाहिए। निःसंदेह एक अश्वेत का नस्लीय रूप में बंटे देश के सर्वोच्च पद पर पहुंचना एक बहुत बड़ी व्यक्तिगत उपलब्धि है। उन्होंने देश के लिए कई ख्यातियां अर्जित कीं, जिनमें उनका अपना नोबेल पुरस्कार भी शामिल है। देश ने भी कई महत्त्वपूर्ण मामलों में प्रगति की है। दि इकॉनोमिस्ट के एक ताजा लेख में उन्होंने स्वयं इनका ब्यौरा दिया है-वे मुख्यतः अमरीका को मजबूत आर्थिकी, और स्वास्थ्य बीमा उपलब्ध करवाने के संबंध में हैं। इसी प्रकार संयुक्त राष्ट्र में अपनी विदेश नीति की सफलताओं पर ओबामा ने उल्लेख किया हैः वैश्विक आर्थिकी को स्थायित्व देना, ईरान का मसला सुलझाना, और जलवायु परिवर्तन के खिलाफ सुरक्षातंत्र स्थापित करना।

ये सभी बड़ी सफलताएं हैं, पर इतनी ही बड़ी असफलताएं भी हैं। घरेलू मोर्चे पर आर्थिक असमानता, नस्लीय तनाव, और राजनीतिक ध्रुवीकरण में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है। विदेश मामलों में तो निराशाएं प्रत्यक्ष हैंः इराक में नियंत्रण खोना, रूस और चीन से संबंध खराब होना, अफगानिस्तान और सीरिया के युद्धों में लापरवाही जिससे आईएसआईएस का जन्म हुआ, और इस्लामिक जिहाद पर रोक लगाने में असफलता। लेकिन आइए ओबामा के समय में अमरीका की मुख्य घरेलू सफलताओं-आर्थिकी और हैल्थकेयर-को गौर से देखें। इसमें कोई संदेह नहीं कि इन सफलताओं का बहुत बड़ा श्रेय ओबामा के नेतृत्व को जाता है। अन्य राष्ट्रपतियों की तरह उन्होंने नए विचार प्रदान किए, लोगों को अमल के लिए प्रेरित किया, कांग्रेस से बातचीत की, और प्रशासन का नेतृत्व किया। पर इन सफलताओं का श्रेय अमरीका की शासन प्रणाली को भी समान रूप से जाता है। देश की आर्थिकी उस महामंदी से, जो दिसंबर 2007 में शुरू हुई, एक विशाल और सही समय पर किए गए मुद्रा में बढ़ाव (स्टिमूलस) के कारण उबरी। ओबामा की अपनी आर्थिक सलाहकार परिषद की अध्यक्षा ने 2010 में खुद कहा कि ‘‘2008 में फेडरल रिजर्व (अमरीका का केंद्रीय बैंक) और ट्रेज़री (वित्त मंत्रालय) द्वारा की गई तीव्र कार्यवाही से अमरीका आर्थिक त्रासदी से बच पाया।’’ वह बुश प्रशासन द्वारा बनाए गए 700 बिलियन अमरीकी डॉलर के ट्रबल्ड एस्सेट रिलीफ प्रोग्राम (टार्प), और कोषागार द्वारा उपलब्ध करवाई गईं मुद्रा की बड़ी खुराकों का संदर्भ दे रही थीं। टाइम मैगजीन के अनुसार, जनवरी 2009 में कार्यभार संभालने के बाद ओबामा के लिए यह ‘‘प्रभावशाली और आवश्यक’’ था कि ‘‘वह भी लगभग यही क्रम जारी रखें।’’ टैक्स घटा और खर्च बढ़ाकर 787 बिलियन अमरीकी डॉलर से अमरीकी इतिहास के सबसे बड़े स्टिमूलस कार्यक्रम के जरिए उन्होंने दरअसल यही किया। जहां तक फेडरल रिजर्व की भूमिका का प्रश्न है, टाइम के विश्लेषण ने निष्कर्ष निकाला कि ‘‘एक और महामंदी टालने में अगर कोई संस्था सबसे अधिक श्रेय रखती है, तो यह फेडरल रिजर्व है।’’

मुद्दा यह नहीं है कि श्रेय किसे मिलना चाहिए, बल्कि यह बताना है कि अमरीकी प्रणाली के तहत एक सरकार जरूरत पड़ने पर शीघ्र और निर्णायक कार्यवाही कर सकती है। यह इसकी बनावट के अनुरूप है। अमरीका के निर्माताओं ने एकल-व्यक्ति आधारित कार्यपालिका इसलिए तैयार की ताकि यह ‘‘निर्णय, क्रियाशीलता, गोपनीयता, और शीघ्रता’’ (अलेग्जेंडर हैमिल्टन के शब्दों में) से काम कर सके। जैसे ही आर्थिक संकट उत्पन्न हुआ बुश और ओबामा दोनों तुरंत कार्यवाही करने में सक्षम थे क्योंकि राष्ट्रपति की एकल कार्यपालिका एक समिति या राजनीतिक गठबंधन नहीं थी। परंतु चुनावों के बीच भी इतने बड़े आर्थिक कार्यक्रम अमरीकी कांग्रेस से इतनी जल्दी पास कैसे हो गए? यहां फिर, व्यवस्था के डिजाइन ने मदद की। बुश का स्टिमूलस कार्यक्रम जिसे हाउस (जनसदन) ने दो बार अस्वीकार किया, सेनेट (राज्य सदन) में पारित हुआ। हाउस को लोगों के आवेग का प्रतिनिधित्व करने के लिए बनाया गया था, जबकि सेनेट का उद्देश्य परिपक्वता लाना था। यह ‘‘विधान को शीतल’’ (जॉर्ज वाशिंगटन के शब्दों में) करने के लिए बनाई गई थी। यही  कारण है कि हर दो वर्ष समूचा हाउस बदल दिया जाता है, जबकि सेनेट के मात्र एक तिहाई सदस्य ही चुनावों का सामना करते हैं। सेनेटरों का कार्यकाल लंबा है (दो के मुकाबले छह वर्ष), और चुनाव लड़ने को उम्र अधिक (25 के मुकाबले 30 वर्ष)। इसी प्रकार आर्थिक संकट को संभालने में फेडरल रिजर्व इतना प्रभावी रहा क्योंकि इसे एक गैर राजनीतिक संस्था के रूप में बनाया गया था। इसका अध्यक्ष राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त किया जाता है, लेकिन सेनेट की मंजूरी भी जरूरी है।

उसका कार्यकाल निश्चित है, जिससे ओबामा को मुद्रा नीति में अति आवश्यक निरंतरता उपलब्ध हो पाई। ओबामा का हैल्थकेयर प्रोग्राम भी अमरीकी सरकार की ऐसी ही निर्भीकता का एक और उदाहरण है। यद्यपि कई बार यह दलगत होती है। अपने पहले दो सालों में ओबामा ने वह स्वास्थ्य बीमा कार्यक्रम पारित करवा लिया जिसका चुनाव में वचन दिया था, क्योंकि कांग्रेस के दोनों सदनों पर उनकी डेमोक्रेटिक पार्टी का नियंत्रण था। हालांकि सरकार द्वारा हर नागरिक को बीमा खरीदना अनिवार्य बनाने के खिलाफ विपक्ष सैद्धांतिक रुख से विरोध में उतर आया था। ओबामा ने पूरी तरह दलीय समर्थन के बूते अपना कार्यक्रम कांग्रेस से पास करवाने का निर्णय लिया। इसने ओबामा के प्रशासन को पटरी से उतार दिया। अगले तीन चुनावों के दौरान लोग बड़े पैमाने पर उनकी पार्टी के खिलाफ हो गए। जहां वर्ष 2009 में हाउस 257-178 डेमोक्रेट-रिपब्लिकन था, वह 2011 में 193-242, और दो साल बाद डेमोक्रेट्स के खिलाफ 247-188 हो गया। इसी प्रकार सेनेट में भी आंकड़ा 57-41 से पलटकर 44-54 हो गया। परिणामस्वरूप ओबामा अपने शेष वामपंथी आर्थिक एजेंडा को पूरा करने में असमर्थ हो गए। चुनावों में किए गए वायदों, जैसे कि अमीरों के लिए टैक्स छूट निरस्त करना, गृहस्वामियों को ऋणों की अदायगी न कर पाने पर सुरक्षा दिलवाना, अवैध अप्रवासियों को नागरिकता दिलवाना, और श्रमिकों के लिए यूनियनबाजी आसान करना इत्यादि धरे के धरे रह गए। यहां फिर, व्यवस्था ने यह सुनिश्चित किया कि अमरीका दलगत स्थिति में भी आगे बढ़े। एक राष्ट्रपति अपने चुनाव के मुख्य वचन को पूरा कर पाया, लेकिन जब उसने जरूरत से ज्यादा करने की कोशिश की मध्यावधि चुनाव देश को सही रास्ते पर ले आए। जब एक उग्र एजेंडा दलगत आधार पर कांग्रेस में धक्केशाही से पास किया जाने लगा, व्यवस्था ने लोगों को इसे रोकने की शक्ति दी।

भारत के नेताओं और विचारकों को अमरीकी प्रणाली के विषय में और अधिक जानकारी चाहिए। जब वर्ष 2013 में भारत के एक अग्रणी स्तंभकार स्वामीनाथन अय्यर ने लिखा, ‘‘ओबामा दिखाते हैं भारत को क्यों राष्ट्रपति प्रणाली का अनुसरण नहीं करना चाहिए,’’ तो इसने केवल लेखक की नासमझी ही दर्शाई। वह अमरीकी प्रणाली में निर्णायकता की कमी की आलोचना कर रहे थे क्योंकि उस समय ओबामा घोर विरोध का सामना कर रहे थे। परंतु, इसके डिजाइन के अनुसार, उस प्रणाली में भारत के प्रधानमंत्री के समान कोई ‘‘शासक’’ नहीं होता, और न ही यह ‘‘समस्त शक्तियां एक राष्ट्रपति में समाहित’’ करती है, जैसा अय्यर ने गलत तौर पर लिखा। अमरीका के राष्ट्रपति के पास केवल कार्यकारी अधिकार हैं। विधायी एजेंडा कांग्रेस द्वारा नियंत्रित होता है, जो राष्ट्रपति पर एक वास्तविक नियंत्रण साबित हो चुका है। यह व्यवस्था सरकार को एक राजनीतिक दल के बजाय राष्ट्र की भलाई के लिए चलाती है। यह व्यवस्था भारत को भी अपनानी चाहिए। यह देश को बेहतर नीतियों के पीछे एकजुट करती है, लेकिन एक बहुमत को आपे से बाहर होने से रोकती है।

-साभार

हफिंगटन पोस्ट/टाइम्स ऑफ इंडिया

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