मजबूत राष्ट्रवाद से वंचित भारत

newsप्रो. एनके सिंह

(लेखक, एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया के पूर्व चेयरमैन हैं)

सेना ने उड़ी की कायराना हरकत के जवाब में सर्जिकल स्ट्राइक को अंजाम देकर पाकिस्तानी कब्जे वाले कश्मीर में आतंकियों के ठिकानों को तबाह करके बदला ले लिया। उसके बाद जो कुछ हमारे देश में देखने को मिला, उससे एक बार फिर से साबित हो गया कि हमारे यहां राष्ट्रवाद की अवधारणा कितनी खोखली है। यह भारतीय सेना की बहादुरी और साहस की एक गौरवमयी मिसाल थी, जिसे हर देशवासी को सहर्ष स्वीकारना चाहिए था। लेकिन देश के कुछ नेताओं ने इस उपलब्धि पर भी शंकाएं पैदा करके गुड़ को गोबर बना दिया…

स्वतंत्रता संग्राम के आंदोलन की अवधि को छोड़ दें, तो भारत राष्ट्रवाद की एक ओजस्वी भावना विकसित करने में विफल ही रहा है। उस दौरान भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने ब्रिटिश उपनिवेशवाद की दमनकारी नीतियों के खिलाफ पूरे देश में ऊर्जा का संचार किया था। यह वह दौर था, जिसमें रूसी क्रांति देखने को मिली और जर्मनी, इटली, फ्रांस में जन्मे यूरोपीय राष्ट्रवाद ने भगत सिंह समेत कई अन्य भारतीयों को अपनी ओर आकर्षित किया। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और नेहरू ब्रिटिश शासन के खिलाफ लड़ाई के लिए देशवासियों को एकजुट करने के प्रतीक बन गए। स्वतंत्रता के पश्चात भारत-पाकिस्तान के दरमियान होने वाले क्रिकेट मैचों या थोड़े वक्त के लिए होने वाले युद्धों को छोड़ दें, तो यह भावना धीरे-धीरे फिर से कहीं गुम होती चली गई। इसमें भी कोई संदेह नहीं कि सरदार वल्लभ भाई पटेल को भारतीय एकता का अगुआ माना जाता है, जिन्होंने एकता आंदोलन के मार्फत भारत के विभिन्न राज्यों व रियासतों को मिलाकर एक भारत के निर्माण का ऐतिहासिक व महत्त्वपूर्ण कार्य किया था। हालांकि यह भावना भी पटेल के साथ ही खत्म हो गई और उसके पश्चात कभी राष्ट्रवाद की भावना को जागृत करने की कोई ठोस पहल नहीं हुई।

हमारा जापान या चीन की तरह राष्ट्रवाद से जुड़ा कोई गौरवशाली इतिहास नहीं रहा है। अपनी किताब ‘ईस्टर्न एंड क्रॉस कल्चरल मैनेजमेंट’ (स्प्रिंगर) में मैंने इस संदर्भ की पड़ताल करते हुए जिक्र भी किया है कि देश में व्याप्त विविधता और जातियों व भाषाओं के आधार पर टुकड़ों में बंटे समाज ने यहां सांस्कृतिक एकता में अभाव का एक जटिल ताना-बाना बुन दिया है। संभवतया हिंदुत्व का विचार या पूरे देश में पूजनीय देवी-देवताओं की एकभाव से पूजा ही ऐसे कारण थे, जिन्होंने भारत को सदियों तक एक बनाए रखा। यदि इसने समस्त भारत को एक नहीं बनाया, तो फिर किसने बनाया? उपनिवेशवादी ब्रिटिश सत्ता के खिलाफ जब स्वतंत्रता के लिए आंदोलन अपने चरम पर था और गांधी-नेहरू देश को एक करने में जुटे थे, तो वे प्रयास राष्ट्रवाद की भावना को दहलीज पर ले आए। तब देश उस अभियान को सफल बनाने के लिए एक आवाज में एक साथ उठ खड़ा हुआ और अंततः उस अत्याचार से देश ने आजादी हासिल कर ली। स्वतंत्रता के पश्चात देश की एकता एक ही बार केंद्रीय बिंदु में देखने को मिली, जब सरदार वल्लभ भाई पटेल ने राष्ट्रवाद की भावना का संचार किया था। इतना ही नहीं, उन्होंने भारतीय क्षेत्र में आने वाली उन तमाम रियासतों को भारत संघ में शामिल करवाकर एक बहुमूल्य उपलब्धि हासिल की, जिन पर कभी राजाओं का शासन हुआ करता था। वह राष्ट्र को एक सूत्र में पिरोने का आंदोलन था। उस कालखंड के पश्चात भारतीय महज भारत-पाकिस्तान के बीच खेले जाने वाले क्रिकेट मैच या युद्ध सरीखे हालात पैदा होने पर ही एक छत के नीचे आए हैं। मूल रूप से भारतीय लोगों में राष्ट्रवाद की भावना में कमी देखने को मिलती रही है। यहां तक कि राष्ट्र हित से जुड़े मसलों पर भी ये कभी एक नहीं देखे गए और यहां भी इनके विचारों व सुरों में भिन्नता साफ दिखती रही है।

जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) का वह प्रकरण बेहद शर्मनाक माना जाएगा, जिसमें अपने ही देश के कुछ विद्यार्थी कुख्यात आतंकी अफजल गुरू का शहादत दिवस मनाने में जुटे थे। अफजल गुरू भारतीय संसद पर हुए हमले में शामिल था और उसे सर्वोच्च न्यायालय ने दोषी पाया था। यहां तक कि स्वच्छता अभियान सरीखे मसलों पर भी हर देशवासी के विचार बेमेल ही रहे। कहीं-कहीं तो यह भी देखने को मिला कि स्वच्छ भारत के सपने को हकीकत बनाने में अपनी प्रतिबद्धता दिखाने के बजाय इस पर चुटकुले बना-बनाकर फैलाते रहे। इन हालात में जापान का उदाहरण जरूर कुछ हद तक हमारी आंखें खोल सकता है, जिसने पुनर्निर्माण के दौरान अमरीका को साफ-साफ शब्दों में बता दिया था, ‘तकनीक तो आपकी होगी, लेकिन संस्कृति हमारी अपनी ही रहेगी।’ उन्होंने अपने गौरव जेन, इकेबाना आदि को नहीं छोड़ा और हर स्थिति में अपने देश से प्रेम किया। 1960 के दौर में जापान में बने उत्पादों की गुणवत्ता बहुत ही निम्न स्तरीय हुआ करती थी और लोग ‘जापानी है’ कहकर उनके उत्पादों का मजाक उड़ाया करते थे। जब उत्पाद गुणवत्ता में सुधार का राष्ट्रीय निर्णय लिया गया, तो महज दस वर्षों के दौरान ही गुणवत्ता के मामले में इसने उत्कृष्ट स्थान हासिल करके दिखा दिया। इसी के साथ जापान थोड़े से वक्त में गुणवत्ता के मामले में विश्व का नेता बन गया।

अभी कुछ समय पहले मैं पठानकोट और उड़ी में हुए आतंकी हमलों के बारे में बड़ी गंभीरता के साथ विचार कर रहा था, जिन्होंने पूरे देश को दहला कर रख दिया था। इन कायराना हमलों के बाद होना तो यह चाहिए था कि अपराध के संरक्षकों के खिलाफ पूरा देश उठ खड़ा होता। उड़ी में आतंकियों ने घात लगाकर किए हमले में हमारे सोए हुए तेईस जवानों की जान ले ली, जिसने एक राष्ट्रव्यापी आक्रोश पैदा कर दिया था। सेना ने उस कायराना हरकत का मुहतोड़ जवाब देते हुए सर्जिकल स्ट्राइक को अंजाम देकर पाकिस्तानी कब्जे वाले कश्मीर में आतंकियों के ठिकानों को तबाह करके बदला ले लिया। उसके बाद जो कुछ हमारे देश में देखने को मिला, उससे एक बार फिर से साबित हो गया कि हमारे यहां राष्ट्रवाद की अवधारणा कितनी खोखली है। यह भारतीय सेना की बहादुरी और साहस की एक गौरवमयी मिसाल थी, जिसे हर देशवासी को सहर्ष स्वीकारना चाहिए था। लेकिन देश के कुछ नेताओं ने इस उपलब्धि पर भी शंकाएं पैदा करके गुड़ को गोबर बना दिया। उसके साथ ही इन्होंने उपदेश बघारने शुरू कर दिए कि हमें इस मसले को संवाद के जरिए ही सुलझाना चाहिए। भारत ने सौहार्द स्थापित करने के लिए पाक से बहुत बार बात करके देख ली, लेकिन उस में से कुछ निकलकर सामने नहीं आया। शत्रु को यह सबक सिखाया जाना ही एकमात्र उपाय है कि यदि वह आतंकी हमलों को अंजाम देता है, तो बदले में उसे भी नुकसान उठाना पड़ेगा।

भावनाओं और रणनीतिक क्रियान्वयन से बेखबर हमारे नेताओं ने इस पर संदेह पैदा करना शुरू कर दिया कि किसी स्ट्राइक को अंजाम नहीं दिया गया था। इसके अलावा इन्होंने इस तरह के संवेदनशील मसले पर अपनी सेना व सरकार के प्रति अविश्वास पैदा करना शुरू कर दिया। ‘आप’ नेता केजरीवाल को इस हमले का भी सबूत चाहिए था। शुरू में सरकार का पक्ष लेने के बाद कांग्रेस के भी सुर बदले और इसके राहुल गांधी जैसे नेताओं ने भी निर्लज्ज भाषा का उपयोग करते हुए ‘खून की दलाली’ सरीखे नारे उछाले। अन्य दलों ने भी इस पर घटिया बयान जारी किए। मौके की फिराक में रहने वाले मीडिया को भी इस प्रकरण में मीन-मेख निकालने का मौका मिल गया और हो हल्ला मचाने वाले मुट्ठी पर एंकर और पत्रकार इसको लेकर तंज कसने लगते हैं या मोदी के सीने का नाप लेने निकल पड़ते हैं। इसके विपरीत जब अमरीका ने ओसामा बिन लादेन को विदेशी धरती पर मार गिराया था, तो पूरे देश ने एक साथ मिलकर उसका उत्सव मनाया था। लेकिन यदि भारतीय नेताओं या लोगों को उस पर टिप्पणी करनी होती, तो शायद वे उस पर भी शंका जाहिर करते। आज सही समय है कि हमारे यहां भी राष्ट्रवाद को महत्त्व मिले। जो इसका विरोध कर रहे हैं, वे एक तरह से अपनी घृणा का ही प्रदर्शन कर रहे हैं।

बस स्टैंड

पहला यात्री- सरकार द्वारा शराब व्यापार को अपने हाथ में लिए जाने के कारण शराब की पूरी आपूर्ति पटरी से उतर गई है और भ्रम की स्थिति फैल गई है।

दूसरा यात्री- शायद इसीलिए बुद्धिमान लोग कहते हैं कि सरकार के पास कोई समस्या नहीं होती, सरकार खुद ही समस्या होती है।

ई-मेलः singhnk7@gmail.com

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