साहसिक खेलों का आश्रय बने हिमाचल

newsभूपिंदर सिंह

लेखक, पेनल्टी कार्नर पत्रिका के संपादक हैं

इस समय हिमाचल में बिलिंग अंतरराष्ट्रीय पैराग्लाइडरों का स्वर्ग है। हिमाचल प्रदेश में सतलुज, ब्यास, रावी तथा चिनाब सहित कई सहायक नदियां बहती हैं। उनमें रिवर राफ्टिंग जैसे साहसिक खेल को बड़े पैमाने पर शुरू कर खेल पर्यटन को बढ़ावा दिया जा सकता है…

हिमाचल प्रदेश को प्रकृति ने ऊंचे पहाड़ों तथा गहरी घाटियों के अनमोल नजारों से नवाजा है। यहां का कुदरती सौंदर्य, संस्कृति, विविधता, स्वच्छता व शांतिप्रिय वातावरण भी इसमें शामिल हैं। आज के इस दौड़-भाग वाले जीवन से जब लोग उकता जाते हैं, तो इससे निजात पाने के लिए देश-विदेश से लोग पर्यटन व प्रकृति प्रेम में हर वर्ष लाखों की संख्या में हिमाचल का रुख करते हैं। इसी भ्रमण में से हिमाचल को साहसिक खेलों का मूल मंत्र मिला है। सबसे पहले हिमाचल में पैराग्लाइडिंग को विदेशी पर्यटकों द्वारा ही शुरू किया गया था। कांगड़ा की बिलिंग घाटी में तत्कालीन बैजनाथ के विधायक पंडित संत राम के सहयोग से ही पैराग्लाइडिंग की शुरुआत हुई थी। प्रो. प्रेम कुमार धूमल के कार्यकाल में भी पैराग्लाइडिंग की कई अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं को सफलतापूर्वक संपन्न किया गया था। आज इस खेल को ओलंपिक व एशियाई खेलों ने गैर परंपरागत खेलों में शामिल किए जाने की बात लगभग तय हो चुकी है।

इस समय हिमाचल में बिलिंग तो अंतरराष्ट्रीय पैराग्लाइडरों का स्वर्ग ही है, मगर इसके अतिरिक्त मंडी, बिलासपुर के बंदला, कुल्लू में रोहतांग से नीचे व चंबा में भी पैराग्लाइडिंग के लिए कई अच्छे-अच्छे स्थान हैं। हिमाचल सरकार अभी भी विश्व भर के पैराग्लाइडरों को बुलाकर अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता आयोजित करवाती रहती है। बर्फ की खेलों के लिए  शिमला के कुफरी में जहां अच्छा स्थान है, वहीं पर मनाली के सोलंगनाला में तो कई एशियाई खिलाड़ी व ओलंपियन अपना अभ्यास करते रहते हैं। मनाली के शिवा केशवन लगातार छह ओलंपिक खेलों में भारत का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। पर्वतारोहण के लिए मनाली में राष्ट्रीय स्तर का संस्थान है। इस संस्थान से ही डिकी डोलमा जैसी प्रतिभाएं सागर माथा को छू पाई हैं। इस समय राज्य के कई अच्छे स्कूलों के विद्यार्थी पर्वतारोहण को प्राथमिकता दे रहे हैं और विश्व की ऊंची चोटियों तक पहुंच रहे हैं। पर्वतारोहण तथा शीतकालीन खेलों के लिए हिमाचल में अपार संभावनाएं हैं, मगर इनका दोहन नहीं हो पा रहा है। इसके लिए सबसे बड़ा कारण है, इन खेलों में प्रयुक्त होने वाले बहुत महंगे खेल उपकरण।

शिवा केशवन यदि विदेश में शिक्षा ग्रहण नहीं कर रहा होता तो वह कभी भी ओलंपिक तक का सफर पूरा नहीं कर सकता था। इटली में पढ़ाई के समय उसने वहां उधारी के उपकरणों से ही प्रवीणता हासिल की। हिमाचल में होता तो बिना उपकरणों से वह कुछ नहीं कर पाता। प्रतिभाओं को ऊपर लाने के लिए आधारभूत ढांचा व उसके जरूरी खेल उपकरण तो चाहिएं ही। पानी की खेलों के लिए राज्य में दो बहुत बड़ी मानव निर्मित झीलें हैं। गोबिंद सागर व पौंग डैम में पानी की खेलों के लिए प्ले फील्ड पूरी तरह से उपयुक्त है। हिमाचल प्रदेश तो इसका लाभ उठा नहीं पा रहा है, मगर पड़ोसी राज्यों के विश्वविद्यालय जरूर यहां अपनी खेल प्रतियोगिता करवाते रहते हैं। हिमाचल प्रदेश ने पौंग डैम में पानी की खेलों के लिए प्रशिक्षक भी नियुक्त कर रखे हैं, मगर खेल परिणाम आज तक सामने नहीं आ पाए हैं। मध्य प्रदेश सरकार ने भोपाल यानी झीलों के शहर में पानी की खेलों के लिए नौका तथा अन्य उपकरण माकूल मात्रा में खिलाडि़यों को उपलब्ध करवाए हुए हैं और उनके राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अच्छे खेल परिणाम भी हैं। हिमाचल प्रदेश में सतलुज, ब्यास, रावी तथा चिनाब सहित कई सहायक नदियां बहती हैं। उनमें रिवर राफ्टिंग जैसे साहसिक खेल को बड़े पैमाने पर शुरू कर खेल पर्यटन को बढ़ावा दिया जा सकता है। 2001 में धूमल सरकार के समय बनी खेल नीति में साहसिक व शीतकालीन खेलकूद गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए विशेष प्रावधान थे। इस नीति के अनुसार चुने गए स्थलों पर साहसिक खेलों के लिए आधारभूत ढांचे का निर्माण भी करवाया गया है। वहां पर प्रयुक्त होने वाला साजो-सामान व प्रशिक्षक सही न होने के कारण  वह सब नहीं हो पाया है, जो होना चाहिए था। किसी भी क्षेत्र में प्रतिभाओं के उत्खनन उनके उत्तरोत्तर विकास और उन्हें मुकाम तक पहुंचाना एक बहुत बड़ा दायित्व है। इस दायित्व का निर्वाह हर प्रदेश व देश को करना चाहिए। हिमाचल में प्रतिभाओं की कमी नहीं है। यह केशवन तथा विजय कुमार जैसे ओलंपियन सिद्ध करते आए हैं।

हिमाचल प्रदेश में यदि कोई कमी है, तो वह है प्रतिभाओं को उचित मंच पर सही प्रशिक्षण की। इस दिशा में अब कागजी प्रोत्साहनों से ऊपर उठकर जमीनी स्तर पर प्रतिभाओं को प्रोत्साहित करने के लिए ईमानदार प्रयास करने होंगे। हिमाचल प्रदेश सरकार के साथ राज्य के शिक्षण संस्थानों तथा बड़े व्यापारिक घरानों को चाहिए कि वे खेल प्रतिभाओं को गोद लें, उन्हें उचित मंच के ऊपर सही प्रशिक्षण का प्रबंध करें, ताकि प्रकृति के इस अनमोल भौगोलिक स्थान पर पैदा हुई संतानें भी आकाश, पानी तथा पहाड़ पर अपने अद्भुत साहस का परिचय अपने लोगों के बीच पूरे संसार को दे सकें।

ई-मेलः penaltycorner007@rediffmail.com

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