हर स्तर पर मिले शारीरिक शिक्षा को अधिमान

Oct 21st, 2016 12:02 am

भूपिंदर सिंह लेखक

( पेनल्टी कार्नर पत्रिका के संपादक हैं )

विकसित देशों में किशोर व युवा अवस्था में सामान्य फिटनेस का जिम्मा शिक्षा संस्थानों के ऊपर होता है। वहां हर शिक्षा संस्थान के पास भरपूर स्टाफ के साथ शारीरिक शिक्षा व स्वास्थ्य विभाग कार्यरत होता है। मगर भारत में सैकड़ों विद्यार्थियों के लिए एक शारीरिक शिक्षा का शिक्षक नियुक्त होता है…

जहां ओलंपिक खेलों में भारत के पिछड़ने का मुख्य कारण देश के शिक्षण संस्थानों में शारीरिक शिक्षा का प्रभावकारी ढंग से लागू न करना है, वहीं हिमाचल प्रदेश के राष्ट्रीय खेलों में सबसे निचले पायदान पर नजर आने के पीछे भी राज्य के शिक्षा संस्थानों में शारीरिक शिक्षा से किनारा कर लेना मुख्य कारण है। हिमाचल ही क्या, देश के अधिकांश राज्यों में शारीरिक शिक्षा को कभी प्राथमिकता नहीं मिल पाई है। विकसित देशों में किशोर व युवा अवस्था में सामान्य फिटनेस व स्वास्थ्य का जिम्मा शिक्षा संस्थानों के ऊपर होता है। वहां हर शिक्षा संस्थान के पास भरपूर स्टाफ के साथ-साथ शारीरिक शिक्षा व स्वास्थ्य विभाग कार्यरत होता है। मगर भारत में सैकड़ों विद्यार्थियों के लिए एक शारीरिक शिक्षा का शिक्षक नियुक्त होता है। प्राथमिक विद्यालय के स्तर पर तो शारीरिक शिक्षक की नियुक्ति अभी तक नहीं हो पाई है। ऐसे में देश-प्रदेश में खेलों की हालत क्या हो सकती है, इसका अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है। माध्यमिक विद्यालय में भी अब शारीरिक शिक्षक का पद हिमाचल प्रदेश में खत्म किया जा रहा है। वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय में एक पद डीपीई तथा एक पद पीईटी के लिए उस समय रखा था, जब जमा दो स्तर पर शारीरिक शिक्षा विषय नहीं था। अब डीपीई का पद बदल कर पीजीटी शारीरिक शिक्षा को दे दिया है।

उच्च विद्यालय में एक पद पीईटी के लिए है। वरिष्ठ माध्यमिक पाठशालाओं में शारीरिक शिक्षक का कार्य पीजीटी को जमा दो स्तर तक शारीरिक शिक्षा का विषय पढ़ाने के साथ-साथ पीईटी के साथ मिलकर सुबह की पीटी करवाना है। संस्थान में अनुशासन तथा अन्य गतिविधियों को देखने के साथ-साथ वह कभी-कभार खेल प्रतियोगिताओं से पहले खेल प्रशिक्षण भी करवाता है। अधिकतर शिक्षा संस्थानों में ड्रिल का पीरियड गायब है। महाविद्यालय स्तर पर भी शारीरिक शिक्षा के प्राध्यापक को जहां शारीरिक शिक्षा के विषय प्रथम से तृतीय वर्ष तक के विद्यार्थियों को पढ़ाने पड़ते हैं, वहीं खेल संगठन के साथ-साथ खेल सामान का स्टोर देखना भी जरूरी है। एक शिक्षक महाविद्यालय स्तर पर शारीरिक शिक्षा के लिए सैकड़ों विद्यार्थियों पर नियुक्त है। क्या हर विद्यार्थी की समस्या उस तक पहुंच पाती है। क्या तीन कक्षाओं के पीरियड लगाकर उसके पास इतनी ऊर्जा बची होती है कि वह खेलों को समय दे सके। शारीरिक शिक्षा के अध्यापकों का कार्य पूरे संस्थान के विद्यार्थियों की फिटनेस को बनाए रखते हुए अच्छे खिलाडि़यों के लिए प्रशिक्षण व्यवस्था के साथ-साथ उनके उत्थान के लिए भी कार्य करना होता है। इसलिए वर्षों पहले यूजीसी ने 500 विद्यार्थियों पर एक शारीरिक शिक्षक की नियुक्ति अनिवार्य कर दी थी। जिस महाविद्यालय के पास दो हजार विद्यार्थी होते हैं, उसके लिए चार शारीरिक शिक्षा के प्राध्यापकों को प्रावधान रखा था, मगर आज तो चार हजार विद्यार्थियों वाले महाविद्यालय में भी एक ही शारीरिक शिक्षा का अध्यापक नियुक्त है। मंडी, धर्मशाला, हमीरपुर, नाहन आदि महाविद्यालयों में शारीरिक शिक्षा के प्राध्यापकों के दो-दो पद सृजित थे, मगर यहां पर आजकल एक-एक ही पद है।

शारीरिक शिक्षा को प्रदेश में इसलिए भी अधिमान नहीं मिल पाया है, क्योंकि शारीरिक शिक्षा के अधिकांश स्नातक व स्नातकोत्तर स्वयं भी ठीक ढंग से शारीरिक शिक्षा का अर्थ नहीं जानते। शारीरिक शिक्षा में वे लोग अधिकतर ट्रेनिंग देते हैं, जो अच्छे खिलाड़ी नहीं रहे होते हैं। विषय में अच्छे अंक लेने वाले विद्यार्थी शारीरिक विज्ञान के विषयों को समझने के बजाय रट्टा लगाकर परीक्षा पास कर जाते हैं। अब इस विषय पर विचार होना चाहिए कि शारीरिक शिक्षा को किस तरह देश-प्रदेश में प्रभावशाली ढंग से लागू किया जा सकता है। शिक्षा संस्थान में प्रवेश पाने के बाद विद्यार्थी के मानसिक व शारीरिक विकास का जिम्मा जब शिक्षा संस्थान का है, तो फिर स्वस्थ शरीर तैयार करने में शिक्षा संस्थान क्या भूमिका अदा कर रहा है, यह आज भी एक अबूझ पहेली है। पढ़ाई के दबाव में विद्यार्थी जीवन के समय होने वाला शारीरिक व मानसिक विकास ही नहीं हो पाया, तो देश को न तो अच्छे नागरिक मिलेंगे और न ही विजेता खिलाड़ी। ऐसे में जरूरी हो जाता है कि देश तथा प्रदेश में शारीरिक शिक्षा को विद्यालय स्तर से ही प्रभावकारी ढंग से लागू किया जाए, ताकि हर विद्यार्थी का संपूर्ण विकास हो सके। जब खेल व शिक्षा राज्य सूची का विषय है, तो ऐसे में राज्य को शारीरिक शिक्षा अपने संस्थानों में सही ढंग से लागू करवाने के लिए जल्द से जल्द चिंतन कर शारीरिक शिक्षा को अनिवार्य रूप से लागू करने का नियम बना देना चाहिए।

ई-मेलः penaltycorner007@rediffmail.com

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