ट्रंप का चुनाव भारत के लिए उदाहरण

भानु धमीजा लेखक

( सीएमडी, ‘दिव्य हिमाचल’ लेखक, चर्चित किताब ‘व्हाई इंडिया नीड्ज दि प्रेजिडेंशियल सिस्टम’ के रचनाकार हैं )

दो वर्ष, एक अरब डॉलर और बेशुमार ऊर्जा लगाकर भी देश ने केवल ‘सबसे कम बुरा विकल्प’ ही चुना है। फिर भी, अमरीका को इससे अत्यधिक लाभ हुआ है। राष्ट्रपति चुनाव प्रक्रिया ने एक समर्थ नेता चुना, एक राष्ट्रीय एजेंडा ईजाद किया, जनता को शासन में भागीदारी के लिए आगे लाया, उन्हें अपने क्रोध को अभिव्यक्त करने का अवसर दिया, और सबसे बढ़कर, देश का पहला गैर-राजनीतिक राष्ट्रपति चुना। ये समस्त लाभ भारत जैसे एक देश के लिए बहुत लाभदायक सिद्ध होंगे…

अमरीका में हाल ही में इतिहास के सर्वाधिक कटु और विभक्त करने वाले राष्ट्रपति चुनाव संपन्न हुए हैं। दो वर्ष, एक अरब डॉलर और बेशुमार ऊर्जा लगाकर भी देश ने केवल ‘सबसे कम बुरा विकल्प’ ही चुना है। फिर भी, अमरीका को इससे अत्यधिक लाभ हुआ है। राष्ट्रपति चुनाव प्रक्रिया ने एक समर्थ नेता चुना, एक राष्ट्रीय एजेंडा ईजाद किया, जनता को शासन में भागीदारी के लिए आगे लाया, उन्हें अपने क्रोध को अभिव्यक्त करने का अवसर दिया, और सबसे बढ़कर, देश का पहला गैर-राजनीतिक राष्ट्रपति चुना। ये समस्त लाभ भारत जैसे एक देश के लिए बहुत लाभदायक सिद्ध होंगे। हमें पूर्वाग्रह छोड़कर यह देखना चाहिए कि अमरीका के राष्ट्रपति चुनाव आखिर हैं क्या। इस आम विश्लेषण कि ‘कौन उम्मीदवार भारत के लिए अच्छा है’ से हमें आगे जाना होगा। इस चुनाव ने यह बता दिया है कि अमरीकन भारतीयों या किन्हीं भी अन्य लोगों से बेहतर नहीं हैं। अमरीका में भी भारत की भांति असहिष्णु, जातिवादी और संप्रदायवादी लोग हैं। इसके भी अपने वोट बैंक हैं। इसमें भी मीडिया पूर्णतया दलगत हो सकता है। अमरीका में भी पेशेवर नेता हैं जो जीत के लिए कुछ भी कह देते हैं या कर लेते हैं। वे भी प्रसिद्धि पाने के लिए, लोगों के पैसे के दम पर, दुनिया भर के वादे करते हैं। वे भी समाज की निम्नतम भावनाओं और उसके डरों को बढ़ावा देते हैं। इसलिए भारतीयों को हीनता की किन्हीं भी भावनाओं—हम अशिक्षित, गरीब हैं, या जाति अथवा धर्म के आधार पर वोट देते हैं, आदि—को सिरे से निकाल देना चाहिए।

देखना तो यह है कि इन सामान्य सामाजिक दुर्बलताओं के बावजूद अमरीका का राष्ट्रपति चुनाव कैसे महान नेताओं का चयन करता है। डोनाल्ड ट्रंप इस दौर के सबसे कम बुरे विकल्प भले ही हों, लेकिन उनकी पृष्ठभूमि प्रभावशाली है। उन्होंने अपने दम पर खरबों डॉलर का रियल एस्टेट साम्राज्य खड़ा कर विश्व भर में अपना ब्रांड स्थापित किया है। कई बार वह व्यक्तिगत आर्थिक बर्बादी से उबरे हैं। वह बेस्टसेलर लेखक और एम्मी पुरस्कार को नामित टीवी सितारे रह चुके हैं। यह चुनाव जीतने के लिए उन्होंने लोक लुभावन विचारों का एक सावधानीपूर्वक नियंत्रित मंच तैयार किया। उन्होंने स्वयं अपनी पार्टी, और अमरीका के लगभग समूचे मीडिया का उपहास उड़ाया। इसके बावजूद उन्होंने एक मौजूदा लोकप्रिय राष्ट्रपति द्वारा समर्थित, और एक मजबूती से पैठ जमाए, राजनीतिक अंतरंग प्रतिद्वंद्वी पर काबू पा लिया। अपने 59 मिलियन मतों में ट्रंप ने हर वोट व्यक्तिगत योग्यता से अर्जित किया है। इसके विपरीत, भारत के मुख्य कार्यकारी सामान्यतः पर्दे के पीछे की गई सौदेबाजियों से चुने जाते हैं। वे दूरदृष्टा नहीं, परंतु डीलमेकर होते हैं। उनका अपने लक्ष्यों के प्रति एक अखिल भारतीय दृष्टिकोण नहीं होता। उनमें अकसर चरित्र, मनोदशा, अनुभव और बोलने की कला का अभाव होता है।

व्यापक प्रतिभा भंडार

अमरीका का दुष्कर राष्ट्रव्यापी चुनाव अच्छे राजनेता पैदा करता है क्योंकि राष्ट्रपति उम्मीदवारों को पार्टी का व्यक्ति होना जरूरी नहीं है। वे जीवन के किसी भी क्षेत्र से आ सकते हैं। इस चुनाव की सबसे बड़ी कहानी यही है कि किस प्रकार ट्रंप ने रिपब्लिकन पार्टी को ही हाईजैक कर लिया। एक व्यवसायी जिसकी कोई राजनीतिक पृष्ठभूमि नहीं थी वह विशुद्ध जनता के समर्थन की ताकत पर एक प्रमुख राजनीतिक दल की उम्मीदवारी हासिल करने में सफल रहा। पूर्व 10 अमरीकी राष्ट्रपतियों में केवल आधे ही पेशेवर राजनेता थे। शेष की अन्य पृष्ठभूमियां थीं—एक मिलिट्री कमांडर, एक किसान, एक अभिनेता और दो व्यवसायी। भारत में, जैसा हम जानते हैं, केवल पार्टी के कट्टर आदमी, जिन्होंने जीवन पर्यंत राजनीति के सिवा कुछ न किया हो, ही ऊपर पहुंच पाते हैं। यह योग्य नेता चुनने के लिए उपलब्ध प्रतिभाओं के भंडार को सीमित कर देता है।

नियंत्रण और संतुलन

अमरीकन दबंग नए नेताओं का जोखिम उठा पाते हैं क्योंकि उनको अपनी व्यवस्था में नियंत्रण और संतुलन के प्रावधानों पर भरोसा है। भारतीय प्रधानमंत्री की तरह अमरीकी राष्ट्रपति को समस्त कार्यकारी और विधायी शक्तियां नहीं दी जातीं। वह कानून पास करवाने, कोई भी व्यय करने, या युद्ध की घोषणा करने के लिए कांग्रेस—जिसे भी लोगों द्वारा प्रत्यक्ष निर्वाचित किया जाता है—पर निर्भर होता है। उसे राज्य सरकारों के साथ काम करना होता है जो उसके नियंत्रण से पूरी तरह बाहर होती हैं। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट में उसके कार्यों को चुनौती दी जा सकती है। सबसे कारगर नियंत्रण तो यह है कि प्रत्येक राष्ट्रपति को हर दो साल में होने वाले मध्यावधि चुनावों से गुजरना होता है। ये प्रावधान राष्ट्रपति, या उसकी पार्टी को आपे से बाहर होने से रोकते हैं। दूसरी ओर, भारतीय व्यवस्था सत्ताधारी दल को पूर्ण स्वतंत्रता दे देती है। निरीक्षण या नियंत्रण के अभाव में वे अकसर अधिक महत्त्वाकांक्षी हो जाते हैं, और भ्रष्ट बन जाते हैं।

एक राष्ट्रीय एजेंडा

एक अन्य महत्त्वपूर्ण सबक इसमें यह है कि कैसे अमरीकी राष्ट्रपति चुनाव एक राष्ट्रीय एजेंडा तैयार करता है। सब उम्मीदवार देश के भविष्य के लिए अपने विचार प्रस्तुत करते हैं। प्राथमिक चुनावों की शृंखला के अंतर्गत ये विचार और उनके प्रस्तावक समीक्षा के लिए जनता के समक्ष रखे जाते हैं। इस चुनाव में, अकेले इसी चरण में, टेलीविजन पर 20 से अधिक बहस हुईं। राजनीतिक दलों के मंच इस प्रकार लोगों की प्रतिक्रिया देख कर उभरते हैं। नीचे से ऊपर की ओर बढ़ने वाला यह दृष्टिकोण लोगों को अपना पार्टी प्लेटफार्म, और फिर राष्ट्रीय एजेंडा को आकार देने का बल देता है। भारत में ऐसा नहीं होता। लोग अकसर चुनाव से कुछ ही दिन पहले पार्टियों के उद्देश्य जान पाते हैं। और ये भी अकसर न्यूनतम साझा कार्यक्रम होते हैं जो पार्टी आकाओं द्वारा उनकी राजनीतिक सुविधाओं के अनुसार जोड़-तोड़ से बनाए जाते हैं। परिणामस्वरूप लोग इन घोषणापत्रों की ओर ध्यान नहीं देते, और इसके बजाय जाति जैसे तुच्छ आधारों पर वोट देते हैं। देश का एजेंडा और जनता का एजेंडा कभी एक समान नहीं हो पाता। राष्ट्रीय लक्ष्य तय करने की अमरीकी प्रक्रिया का एक और महत्त्वपूर्ण लाभ है, खासकर भारत जैसे देश के लिए। यह राष्ट्रीय राजनीति को द्विदलीय व्यवस्था में ढालने में मदद करती है। प्रत्यक्ष राष्ट्रव्यापी चुनाव अकसर परस्पर विरोधी, लेकिन मध्यमार्गी, विकल्प प्रस्तुत करते हैं। सतही या अतिवादी विचारों, और उनके प्रस्तावकों को देशव्यापी समर्थन जुटाने की संभावना बहुत कम होती है। भारत में ऐसे तंत्र का अभाव कई दलों के गठबंधन पर टिकी केंद्रीय सरकारें दे चुका है। क्योंकि छोटे राजनीतिक दलों को अपने विचारों को राष्ट्रव्यापी समर्थन जुटाने के लिए मुकाबला नहीं करना पड़ता, वे संसद में कुछ सीटों के बल पर सत्ता तक अपना रास्ता बना लेते हैं। भारत में राजनीतिक विखंडन का यह ही मुख्य कारण है।

भावनाओं की शुद्धि की प्रक्रिया

अमरीका के राष्ट्रीय चुनाव देश की सामाजिक सफाई में भी मदद करते हैं। देश के बड़े मुद्दों—अवैध अप्रवास, आर्थिक असमानता, हैल्थकेयर में महंगाई, जातीय तनाव, युद्ध, आदि—पर कड़वाहट और नाराजगी एक साल से अधिक समय तक जनता के बीच खुलकर खंगाली गई। इससे समाज में भावनाओं का शुद्धिकरण हुआ। भारत भी लोगों को उनकी सरकार और एक-दूसरे के प्रति बुरी भावनाओं की शुद्धि के लिए ऐसी राष्ट्रव्यापी स्वच्छीकरण प्रक्रिया का उपयोग कर सकता है। अमरीकनों ने हर चार वर्ष बाद होने वाली इस सामाजिक उथल-पुथल में अपनी रुचि खुलकर जाहिर की है। वे स्वयं को सोशल मीडिया पर अभिव्यक्त करते हैं, टाउन हॉल मीटिंगों में शामिल होते हैं, सार्वजनिक बहसें देखते हैं, और अपने समय व धन से सहयोग करते हैं। इस वर्ष के राष्ट्रपति चुनाव से जुड़ी बहसों ने रिकार्ड 84 मिलियन दर्शक जुटाए। पिछले चुनाव में लोगों ने लगभग 600 मिलियन अमरीकी डॉलर—इस बार 721 मिलियन डॉलर—का सहयोग 200 डॉलर से कम छोटी-छोटी राशियां देकर किया। भारत चुनाव प्रचार में खर्च के लिए ऐसे ही जनता द्वारा दिए गए धन, और इसी प्रकार की लेखा-पद्धति का प्रयोग कर सकता है। और भारत को ऐसी जन बहसों से तो निश्चित तौर पर लाभ मिलेगा। समय आ गया है कि भारत का मुख्य कार्यकारी भी अमरीका की तरह समूचे देश के लोगों द्वारा प्रत्यक्ष रूप से चुना जाए। पर्दे के पीछे सौदेबाजियों से पार्टी के एक आदमी को चुनना, जो एक छोटे से चुनाव क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करता हो, एक महान राष्ट्र के लिए उपयुक्त नहीं है।

-साभार

हफिंगटन पोस्ट/टाइम्स ऑफ इंडिया

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