प्रशिक्षकों की राह ताकती प्रतिभाएं

भूपिंदर सिंह

( लेखक, पेनल्टी कार्नर पत्रिका के संपादक हैं)

हिमाचल में प्रतिभाओं की कमी नहीं है, पर प्रशिक्षकों की जरूर कमी है। बाकी सहूलियतें भी खिलाडि़यों को पूरी नहीं मिल पाती हैं। इससे खिलाडि़यों का मनोबल गिरता है। खेल विभाग को इस बारे में पहल करनी चाहिए, ताकि खिलाडि़यों  को मजबूरी में अपनी खेल प्रतिभा से मुंह न मोड़ना पड़े…

हिमाचल प्रदेश की जलवायु मध्यम व लंबी दूरी की दौड़ों के लिए बहुत ही उपयुक्त है, मगर एक दो धावकों को छोड़कर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हिमाचल कोई खास नाम नहीं कमा पाया है। हां, राष्ट्रीय स्तर पर कई बार हिमाचल ने अपनी श्रेष्ठता सिद्ध की है। पिछले दिनों मंगलौर में आयोजित अंतर विश्वविद्यालय क्रॉस कंट्री प्रतियोगिता में राजकीय महाविद्यालय धर्मशाला की धाविकाओं ने अच्छा प्रदर्शन करते हुए हरमिलन ने चौथे, हिना ने छठे तथा गार्गी ने 11वें स्थान पर आकर हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय को सम्मानजनक स्तर पर खड़ा कर दिया। इसके अलावा अनीश ने भी 14वें स्थान पर आकर अपनी ओर सबका ध्यान खींचा है। बहुत देर बाद हिमाचल के धावकों ने फिर अच्छा प्रदर्शन करना शुरू कर दिया है। 2006 वारंगल में आयोजित अखिल भारतीय अंतर विश्वविद्यालय क्रॉस कंट्री में हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय की तरफ से दौड़ते हुए धर्मशाला महाविद्यालय की आशा कुमारी ने पहले, हमीरपुर  महाविद्यालय की मंजु कुमारी ने तीसरे तथा हमीरपुर की ही रीता कुमारी ने चौथे स्थान पर आकर पूरे देश की वाहवाही लूटी थी।

इस प्रतियोगिता में चौथी धाविका 24वें स्थान पर आने के कारण हिमाचल को आलओवर उपविजेता की ट्रॉफी भी मिली थी। 2005 में मुंबई में आयोजित अखिल भारतीय अंतर विश्वविद्यालय क्रॉस कंट्री में धर्मशाला की आशा तथा हमीरपुर महाविद्यालय के दिनेश कुमार ने अपने-अपने वर्ग में स्वर्ण पदक जीतकर हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय का मान बढ़ाया था। राष्ट्रीय स्तर पर सुमन रावत ने कई बार क्रॉस कंट्री में भारत का प्रतिनिधित्व अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में किया है। कमलेश कुमारी ने भी हरिद्वार में आयोजित राष्ट्रीय क्रॉस कंट्री में हिमाचल प्रदेश के लिए स्वर्ण पदक जीता था। पुरुष वर्ग में राष्ट्रीय स्तर पर अमन सैणी ने कई बार विजेता का खिताब जीतकर एशियाई क्रॉस कंट्री में भारत का प्रतिनिधित्व किया था। कनिष्ठ स्तर पर हिमाचल की लड़कियों ने भी कई बार हिमाचल को ट्रॉफी दिलाई है। पिछले वर्ष अंडर-18 आयु वर्ग में सावन बरवाल ने व्यक्तिगत प्रयासों से कांस्य पदक राष्ट्रीय स्तर पर हिमाचल की तरफ से जीता है। मध्यम व लंबी दूरी की दौड़ों के लिए हिमाचल के खिलाड़ी व जलवायु सबसे उत्तम है। अगर यहां पर धावकों को अच्छे जूते तथा अच्छे प्रशिक्षक मिलते हैं, तो भविष्य में यहां के धावक अंतरराष्ट्रीय स्तर तक बहुत ही उमदा प्रदर्शन कर सकते हैं। हिमाचल में प्रतिभाओं की कमी नहीं है, पर प्रशिक्षकों की जरूर कमी है। बाकी सहूलियतें भी खिलाडि़यों को पूरी नहीं मिल पाती हैं। इससे खिलाडि़यों का मनोबल गिरता है। खेल विभाग को इस बारे में पहल करनी चाहिए, ताकि खिलाडि़यों को मजबूरी में अपनी खेल प्रतिभा से मुंह न मोड़ना पड़े या दूसरे प्रदेशों में पलायन करना पड़े।

सरकार को सिर्फ खेल बजट उपलब्ध करवाने तक ही सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि उसके सही इस्तेमाल पर भी नजर रखनी चाहिए। धर्मशाला के साई खेल छात्रावास में प्रशिक्षक केहर सिंह पटियाल के प्रशिक्षण में पिछले कुछ वर्षों से काफी प्रगति हुई है। इसी तरह राज्य के खेल छात्रावासों बिलासपुर तथा ऊना में भी धावकों तथा धाविकाओं को अच्छा प्रदर्शन करवाने के लिए वहां के प्रशिक्षकों को कड़ी मेहनत करवानी होगी। धर्मशाला व शिलारू में देश के विभिन्न राज्यों के धावक यहां आकर अपने प्रशिक्षण शिविर हर वर्ष लगाते हैं। हिमाचल प्रदेश खेल विभाग को चाहिए कि वह अपने एथलेटिक प्रशिक्षकों को मध्यम व लंबी दूरी की दौड़ों में निचले स्तर से प्रशिक्षण देने के लिए प्रेरित करे। नन्ही प्रतिभाएं विद्यालयों में पढ़ रही हैं।वहां पर शारीरिक शिक्षकों को मध्यम व लंबी दूरी की दौड़ों में प्रशिक्षण देने के लिए प्रशिक्षित करवाया जाए, ताकि अधिक से अधिक धावकों तक पहुंच हो सके। जब हजारों घोड़े दौड़ते हैं, तो उनमें से ही कुछ चुनिंदा रेस के विजेता घोड़े निकल कर सामने आते हैं। इसलिए हिमाचल प्रदेश शिक्षा विभाग के साथ मिलकर राज्य एथलेटिक संघ को चर्चा कर भविष्य के लिए सही योजना बनानी चाहिए, ताकि हिमाचल की संतानें राष्ट्रीय स्तर पर अपनी श्रेष्ठता सिद्ध कर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का प्रतिनिधित्व करती हुईं पदक जीतकर देश-प्रदेश का नाम रोशन कर सकें। खिलाड़ी में सिर्फ प्रतिभा होती है, बाकी का प्रबंध तो खेल विभाग और सरकार को ही करना है।

ई-मेलः penaltycorner007@rediffmail.com

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