विमुद्रीकरण अव्यवस्थाः संस्थाओं की बजाय व्यक्तियों पर निर्भर हैं हम

भानु धमीजा

( सीएमडी, ‘दिव्य हिमाचल’ लेखक, चर्चित किताब ‘व्हाई इंडिया नीड्ज दि प्रेजिडेंशियल सिस्टम’ के रचनाकार हैं )

विमुद्रीकरण को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी व्यक्तिगत नीति के रूप में पेश किया है। उन्होंने इसे यह कहकर उचित ठहराया है कि प्रभावशाली होने के लिए इसे गुप्त रखना आवश्यक था। इतना आवश्यक कि उन्होंने अपनी कैबिनेट तक को सूचित नहीं किया। परंतु इसने एक सामान्य आर्थिक कार्रवाई को एक नैतिक युद्ध में बदल डाला है। मोदी की पहल बुरी तरह नियोजित और कार्यान्वित हुई, क्योंकि शायद लोकप्रियता पाने के लिए उन्होंने इसे पूरी तरह अपने तक ही सीमित रखा। अब समय आ गया है कि इस प्रकार के बडे़ नीतिगत निर्णय लेने और लागू करने के लिए भारत को एक नेता के पांडित्य के बजाय संस्थाओं पर निर्भर होना चाहिए…

विमुद्रीकरण को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी व्यक्तिगत नीति के रूप में पेश किया है। उन्होंने इसे यह कहकर उचित ठहराया है कि प्रभावशाली होने के लिए इसे गुप्त रखना आवश्यक था। इतना आवश्यक कि उन्होंने अपनी कैबिनेट तक को सूचित नहीं किया। परंतु इसने एक सामान्य आर्थिक कार्रवाई को एक नैतिक युद्ध में बदल डाला है। मोदी की पहल बुरी तरह नियोजित और कार्यान्वित हुई, क्योंकि शायद लोकप्रियता पाने के लिए उन्होंने इसे पूरी तरह अपने तक ही सीमित रखा। अब समय आ गया है कि इस प्रकार के बडे़ नीतिगत निर्णय लेने और लागू करने के लिए भारत को एक नेता के पांडित्य के बजाय संस्थाओं पर निर्भर होना चाहिए। क्योंकि इतने विशाल अभियान में कोई अकेला व्यक्ति सब कुछ ठीक नहीं बिठा सकता।

यह पहला अवसर नहीं है जब एक भारतीय प्रधानमंत्री ने समीक्षा और सलाह के बिना, गोपनीयता से लोकलुभावन उपायों का आश्रय लिया हो। इंदिरा गांधी द्वारा 1969 में बैंकों का राष्ट्रीयकरण तुरंत ध्यान में आता है। यह अनैतिक नीति भी बहुत लोकप्रिय थी। इसे भी भारत के हित में आवश्यक बताया गया था। इसे भी अति गोपनीयता से तैयार कर अचानक घोषित किया गया था। भारतीय संविधान का अभिलेखन करने वाले ग्रैनविल ऑस्टिन ने कलई खोली थी कि बैंकों को राष्ट्रीयकृत करने वाला गुप्त अध्यादेश प्रधानमंत्री के सेक्रेटेरियट में केवल चार लोगों का काम था। इसका ड्राफ्ट मात्र एक शाम के भीतर तैयार किया गया था। ऑस्टिन ने लिखा कि ‘‘कुछ मामूली सुधारों के बाद, अध्यादेश एक दोपहर बाद हुई कैबिनेट मीटिंग में पहुंचा, जहां यह निर्विरोध मंजूर हो गया। बैठक से पहले किसी मंत्री ने इसकी विषयवस्तु नहीं देखी थी, और बात लीक होने से रोकने के लिए मीटिंग के बाद प्रतियां वापस ले ली गईं।’’ इंदिरा गांधी ने उसी शाम अध्यादेश की घोषणा रेडियो प्रसारण में की। उन्होंने कहा कि बैंकिंग व्यवस्था ‘‘आवश्यक रूप से एक वृहद सामाजिक उद्देश्य से प्रेरित होनी चाहिए।’’

वर्ष 1969 के बैंक राष्ट्रीयकरण की सार्वजनिक जय जयकार हुई। यहां तक कि जनसंघ ने भी इसका समर्थन किया। अगले चुनावों में 352 सीटें जीतकर इंदिरा गांधी ने संसद में विशाल बहुमत हासिल कर लिया। इससे इंदिरा गांधी इतनी मजबूत हो गईं कि पांच साल बाद उन्होंने कुख्यात आपातकाल घोषित कर डाला। मोदी का निर्णय बैंक राष्ट्रीयकरण के अनुरूप खुल्लम-खुल्ला समाजवाद नहीं है, परंतु इसका उद्देश्य भी अमीर को दंडित कर गरीब को फायदा पहुंचाना है। उन्होंने अपनी घोषणा में कहा, ‘‘आइए हम सुनिश्चित करें कि राष्ट्र की संपत्ति से निर्धन को लाभ मिले।’’ उनका लक्ष्य मात्र कालेधन को दूर करने से आगे निकल चुका है; वह धन जमा रखने वालों की हानि करना, और अमीर-गरीब को समान पंक्ति में खड़ा देखना चाहते हैं। लक्ष्य प्रशंसनीय हैं, पर अव्यावहारिक हैं। जैसा हम देख रहे हैं, सभी भारतीय, केवल धनवान ही नहीं, कैश के जमाखोर रहे हैं, क्योंकि भारत की आर्थिक परिपाटी में यही कायदा रहा है। और पंक्ति में खड़ा अमीर आदमी हमें अभी तक दिखाई नहीं दिया है। मोदी की नीति के लोकप्रिय होने का एक कारण यह है कि यह धनवान को दंडित करती है। लोग प्रसन्न हैं कि धनवान अब आश्रय के लिए इधर-उधर भागे फिरते हैं। सच्चाई यह है कि मोदी की नीति गरीब को तभी लाभ पहुंचा पाएगी अगर वह सुधारों का एक समूचा संग्रह प्रस्तुत करते हैं। लगभग समस्त अर्थशास्त्रियों  ने कहा है कि अगर कालेधन के सभी इंजन बंद नहीं किए गए तो भारत ठीक वहीं पहुंच जाएगा जहां वह पहले था। वे टैक्स और स्टैंप ड्यूटी कम करने, टैक्स का रिसाव रोकने, लाइसेंस राज खत्म करने, कानूनों को घटाने, नौकरशाहों की अनियंत्रित शक्तियां घटाने, और सबसे बढ़कर, राजनीतिक दक्षिणाओं पर प्रतिबंध लगाने के पक्षधर हैं। यह अंतिम आयटम सबसे बड़ी अपराधी है। जब मोदी की अपनी पार्टी का एक मंत्री उनके कालेधन के खिलाफ जारी अभियान के बीच एक शादी पर 500 करोड़ खर्च देता है, तो यह लोगों में उनके लक्ष्य के प्रति भरोसा नहीं जगाता।

इसी प्रकार, एकत्रित धन से आर्थिकी को लाभ पहुंचेगा, लेकिन तभी अगर इसे अच्छे कार्य में लगाया जाता है। बुनियादी ढांचे में बड़ा निवेश एक बेहतरीन शुरुआत होगी, क्योंकि इससे छोटी श्रेणी की नौकरियां पैदा होंगी। आइए उम्मीद रखें कि यह धन गरीबों के लिए तथाकथित कल्याण योजनाओं या बैंक बैलेंस शीट्स के साथ वित्तीय दिखावटीपन में नहीं उड़ाया जाएगा। फिलहाल, मोदी के कदम ने आर्थिकी की सांसें फुला दी हैं। बाजार ज्यादा आशावादी नहीं हैं। घोषणा के बाद से सेंसेक्स और रुपया दोनों में गिरावट आई है। जहां तक जालसाजी रोकने और आतंकवादियों को नुकसान पहुंचाने के मोदी के अन्य उद्देश्यों की बात है, इसमें कोई शक नहीं कि करंसी नोटों में बदलाव आवश्यक था। लेकिन यह नियमित प्रक्रिया होनी चाहिए। भारतीय करंसी का डिजाइन, कागज, और प्रिंटिंग तकनीक लगातार बदलनी चाहिए। अमरीकी डॉलर दुनिया की सर्वाधिक इस्तेमाल होने वाली करंसी है, लेकिन इसके साथ जालसाजी की समस्या बहुत कम है। अमरीकी राजकोष इसका श्रेय ‘‘डाटा एकत्रीकरण, शिक्षा प्रयासों, कानून लागू करने और विश्व भर में बैंकों से संपर्क रखने’’ को देता है। अमरीका ने कभी किसी करंसी नोट का विमुद्रीकरण नहीं किया।

मेरा तर्क यह है कि हम नहीं जानते कि क्या मोदी ने अपने निर्णय से जुड़ी समस्त जटिलताओं, खतरों और विकल्पों पर विचार किया। हम नहीं जानते क्योंकि भारतीय व्यवस्था के तहत वह अपने विचार साझा करने या उन्हें किसी अन्य संस्था से अनुमोदित करवाने के लिए बाध्य नहीं हैं। और यही असली मुद्दा है। हमें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि इतना बड़ा निर्णय-देश की 85 प्रतिशत करंसी को एक रात में रद्दी कर देना-सोच विचार कर लिया जाए। उदाहरण के लिए क्या साथ-साथ कुछ सुधार करने; या विवाह समारोहों के चलते कुछ और दिन प्रतीक्षा करने; या सहकारी बैंकों के लिए उचित प्रक्रिया तैयार करने; या एटीएम में नए नोट चलाकर देखने; इत्यादि, पर विचार किया गया?

स्पष्टतया, हमारी व्यवस्था में कमजोरी है जब हमारे मुख्य कार्यकारी को कार्यान्वयन के लिए जवाबदेह नहीं ठहराया जा सकता। यह एक बुरी व्यवस्था है जिसमें उच्च पदाधिकारी श्रेय पाते हैं, लेकिन समस्याएं अधीनस्थों-मंत्रालय या नौकरशाहों के मत्थे मढ़ दी जाती हैं। एक अच्छी व्यवस्था इससे ठीक विपरीत करती है। मूल समस्या यह है कि भारतीय व्यवस्था में कार्यकारी निर्णयों पर स्वतंत्र निरीक्षण का अभाव है। अगर एक स्वतंत्र संस्था-जैसे कि विधानमंडल-को धन अनुमोदित करने, या सुनवाई करने, इत्यादि, की शक्तियां होतीं, हमारे निर्णय और उनका क्रियान्वयन बेहतर होता। गोपनीयता ऐसे नियंत्रणों  में भी रखी जा सकती है, बशर्ते प्रतिसंतुलन बनाने वाली संस्थाएं भी सीधे जनता के प्रति जवाबदेह बनाई जाएं। एक अधिक सम्मिलित, संतुलित और पारदर्शी व्यवस्था का इससे भी महान लाभ यह होगा कि निर्णयों के पीछे भारत एकजुट होगा। समस्त भारतीय चाहते हैं कि मोदी सफल हों। मोदी भक्त ही अकेले देशभक्त नहीं हैं। परंतु सभी भारतवासियों को यह भरोसा चाहिए कि उनके देश के बड़े फैसले निष्पक्ष और सोच-समझकर लिए गए हैं। एक एकल व्यक्ति आधारित व्यवस्था समस्त भारतीयों को एकजुट नहीं कर सकती। हमारी व्यवस्था में बदलाव लाना जरूरी हो गया है।

-साभार

हफिंगटन पोस्ट/टाइम्स ऑफ इंडिया

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