चुनौतियों से ‘दंगल’ लड़ती रही हैं पहाड़ी बेटियां

88भूपिंदर सिंह

लेखक, राष्ट्रीय एथलेटिक प्रशिक्षक हैं

इस समय भी प्रदेश में कई अभिभावक अपनी बेटियों को खेल प्रशिक्षण में ला चुके हैं। देखते हैं कौन-कौन मां-बाप महावीर पहलवान की तरह अपनी बेटियों को इतनी ऊंचाई पर ले जाता है, जहां से तिरंगे को सबसे ऊंचा उठाकर जन-गण-मन की राष्ट्रीय धुन पूरे विश्व को सुनाएगा…

सिनेमा भारतीय जनमानस पर अपने चलचित्रों द्वारा की गई अभिव्यक्ति से प्रभाव डालता आया है। पिछले कुछ दशकों से खेलों पर आधारित फिल्में आनी शुरू हुई हैं। ‘चक दे इंडिया’ में जहां एक खिलाड़ी की अधूरी इच्छा को महिला हाकी टीम द्वारा पूरा करने की कहानी रूह को छू जाती है, वहीं पर अब बनी ‘दंगल’ में अमीर खान ने हरियाणा के पूर्व पहलवान महावीर की इच्छा को उसकी बेटियों द्वारा पूरा करते दिखाया गया है। हिमाचल प्रदेश में ही नहीं, अपितु पूरे देश में जब ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ अभियान शुरू किया गया है, तो आज हम इस कॉलम के माध्यम से हिमाचल के उन अभिभावकों को भी याद करते हैं, जिन्होंने अपनी बेटियों को खेल के क्षेत्र में बेटों की तरह अवसर दिलाया। इन प्रतिभाओं ने भी उनकी अपेक्षाओं-उम्मीदों का सम्मान करते हुए हिमाचल को राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई बार गौरव दिलाया है।  1974 में स्वर्गीय प्रताप सिंह राव ने अपनी बड़ी बेटी सुमन रावत को पहली बार स्कूली जिला खेल प्रतियोगिता में लाकर उसे भविष्य की राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय पदक विजेता बनाने के लिए उसके प्रशिक्षण की शुरुआत सवेरे अपने साथ शिमला की सड़कों पर दौड़ने से शुरू कर दी थी। स्वर्गीय प्रताप सिंह के भी बेटियों ही हैं और ये रावत बहनें नब्बे के दशक तक हिमाचली खेलों में दिखाई देती रही हैं। सुमन रावत ने आगे चलकर लंबी दूरी की दौड़ों में भारतीय स्तर पर कई स्वर्ण पदक जीते तथा कीर्तिमान बनाए। 1986 सियोल एशियाई खेलों में इन्होंने 3000 मीटर की दौड़ में कांस्य पदक जीतकर अर्जुन अवार्ड का सम्मान भी पाया है। हिमाचल में बेटियों को आगे बढ़ाने का यह सिलसिला यहीं नहीं थमा। आगे चलकर सिरमौर की सीता व गीता गोसाईं बहनें, जिन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हाकी में भारत का प्रतिनिधित्व किया है, इनके अभिभावकों ने भी अपनी इन कन्या संतानों को खेल मैदान में जाने के लिए प्रोत्साहित किया। सीता गोसाईं लगभग एक दशक से भी अधिक समय तक एशियाई व राष्ट्रमंडल खेलों में स्टार खिलाड़ी रहीं। भारत का नेतृत्व करने वाली इस हिमाचली खिलाड़ी को विश्व एकादश टीम में स्थान मिला था।  पिछली सदी के अंतिम दशक में जब हर अभिभावक अपने बच्चों का भविष्य केवल पढ़ाई में तलाश रहा था, स्कूलों में ड्रिल का पीरियड भी खत्म करके उस समय भी पढ़ाई हो रही थी, हर अभिभावक अपने बच्चों को डाक्टर व इंजीनियर बनाना चाहता था, उस समय में हमीरपुर की स्वर्गीय निर्जला देवी ने अपनी बेटी पुष्पा ठाकुर का भविष्य खेल मैदान में तलाशा। तेज गति की दौड़ों में पुष्पा ठाकुर ने पहली बार वरिष्ठ राष्ट्रीय एथलेटिक्स में पदक जीतकर 2004 ओलंपिक के लिए लगे राष्ट्रीय प्रशिक्षण शिविर में जगह पाई थी।

पुष्पा ठाकुर को खेल मैदान में खड़ा रहने के लिए उनकी माता का योगदान काबिले तारीफ है। 2014 एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक विजेता कबड्डी टीम की सदस्य पूजा ठाकुर तथा बबीता ठाकुर के अभिभावकों ने भी बेटों की तरह अपनी बेटियों को खेल मैदान में भेजा है। आज हिमाचल में कई अभिभावक अपनी बेटियों को बेटों की तरह हर क्षेत्र में मौका देकर बेटा-बेटी के भेद को भूलते जा रहे हैं। साई होस्टल में प्रशिक्षण ले रही होनहार बेटियों को देखकर सहज ही अंदाजा हो सकता है कि बेटा-बेटी में अंतर अब कितना सिमटता जा रहा है। विद्यालयों-महाविद्यालयों में होने वाली खेलों में बेटियां खुद को साबित करती रही हैं। कुछ समय पहले सुविधाओं के अभाव भरी स्थिति को चुनौती देते हुए बख्शो देवी मैदान में उतरी, तो इस नन्ही परी के पहाड़ जैसे हौसलों ने हर किसी को अपना मुरीद बना लिया। ‘बेटा-बेटी एक समान’ का नारा आज सच साबित हो रहा है। खेल जैसा क्षेत्र जहां दमखम की जरूरत होती है, हजारों-लाखों की भीड़ में जब भरे स्टेडियम में प्रदर्शन करना होता है, ऐसी जगह पर आज का अभिभावक अपनी बेटियों को भेज रहा है। ऐसा कोई क्षेत्र नहीं बचा है, जहां बेटी की पहुंच न हो, इसलिए अब यह जरूरी नहीं रह गया है कि संतान बेटा ही हो। कमोबेश ‘दंगल’ फिल्म में भी इसी हकीकत को उजागर करने की एक सार्थक कोशिश की गई है। इस समय भी प्रदेश में विभिन्न खेलों में कई अभिभावक अपनी बेटियों को खेल प्रशिक्षण में ला चुके हैं। देखते हैं कौन-कौन मां-बाप महावीर पहलवान की तरह अपनी बेटियों को इतनी ऊंचाई पर ले जाता है, जहां से तिरंगे को और अधिक, सबसे ऊंचा उठाकर जन-गण-मन की राष्ट्रीय धुन पूरे विश्व को सुनाएगा।

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हिमाचली लेखकों के लिए

लेखकों से आग्रह है कि इस स्तंभ के लिए सीमित आकार के लेख अपने परिचय, ई-मेल आईडी तथा चित्र सहित भेजें। हिमाचल से संबंधित उन्हीं विषयों पर गौर होगा, जो तथ्यपुष्ट, अनुसंधान व अनुभव के आधार पर लिखे गए होंगे।                               -संपादक

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