तालमेल से ही होगी खेल की तरक्की

Dec 23rd, 2016 12:02 am

भूपिंदर सिंह

( लेखक, पेनल्टी कार्नर पत्रिका के संपादक हैं )

हिमाचल में खेलों को ऊपर उठाना है तो खेल विभाग, शिक्षा विभाग, खेल संघ तथा खिलाड़ी के अभिभावकों को आपस में तालमेल रखना होगा। राज्य के प्रशिक्षक ईमानदारी से लगातार प्रयास करेंगे, को कुछ  वर्षों बाद परिणाम सामने होंगे…

इसी माह असम की राजधानी गुवाहटी में आयोजित राष्ट्रीय मुक्केबाजी प्रतियोगिता में हिमाचल की झोली में दो पदक आए हैं। वीरेंद्र ने रजत तथा गीतानंद ने कांस्य पदक जीकर हिमाचल का गौरव बढ़ाया है। गीतानंद हिमाचल पुलिस में नौकरी कर रहे हैं, तो वीरेंद्र भारतीय सेना में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। ये दोनों मुक्केबाज सुंदरनगर के महाराजा लक्ष्मण सेन स्मारक महाविद्यालय परिसर में चल रहे प्रशिक्षण केंद्र की देन हैं। इस प्रशिक्षण केंद्र का उदय आज से ठीक दो दशक पूर्व उस दशक के शुरुआती दौर में मुक्केबाजी प्रशिक्षक नरेश कुमार ने  महाविद्यालय में मानदेय पर प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाकर किया था। तत्कालीन प्राचार्य डा. सूरज पाठक तथा प्राध्यापक शारीरिक शिक्षा डा. पदम सिंह गुलेरिया ने इस प्रशिक्षण कार्यक्रम को, जो बन पड़ा, वह सब सहयोग दिया था। दोनों ही प्रशासक खेल प्रेमी हैं। इनके कार्यक्रम में महाविद्यालय ने खेलों में काफी प्रगति की है। 1995 में हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय शिमला द्वारा आयोजित अखिल भारतीय अंतर विश्वविद्यालय मुक्केबाजी प्रतियोगिता में इस महाविद्यालय के मुक्केबाजों ने उम्दा प्रदर्शन कर हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय को उपविजेता ट्रॉफी दिला दी थी।

शिव चौधरी, मान सिंह, सोहन सिंह व सुरेश आदि मुक्केबाजों ने प्रदेश विश्वविद्यालय को स्वर्ण पदकों सहित कई पदक दिलाए थे। शिव चौधरी ने अगले कई वर्षों तक राष्ट्रीय स्तर पर राज्य के लिए पदक जीते और खेल कोटे में ही पुलिस विभाग में भर्ती होकर यह स्टार मुक्केबाज आज एएसपी के पद पर कार्यरत है। नरेश कुमार के इस शिष्य को हिमाचल सरकार ने सबसे बड़ा राज्य खेल सम्मान परशुराम अवार्ड भी दिया है। शिव के चचेरे भाई आशीष व मनीष चौधरी भी प्रशिक्षक नरेश की देखरेख में राष्ट्रीय स्तर पर पदक विजेता बने। आशीष तो पिछले राष्ट्रीय खेलों, जो केरल में आयोजित हुई थीं, प्रदेश को स्वर्ण पदक दिलाने में कामयाब रहे थे। हर वर्ष नरेश के शिष्य कहीं न कहीं राष्ट्रीय स्तर पर प्रदेश को पदक दिलाते देखे गए हैं। 1998 में तत्कालीन मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल ने जब राज्य में प्रशिक्षकों के डाइंग पड़े कैडर को राज्य खेल परिषद के माध्यम से जब दोबारा भर्ती शुरू की, तो नरेश कुमार को एक बार फिर एमएलएसएम महाविद्यालय परिषद में ही नियुक्त किया। आज युवा सेवाएं एवं खेल विभाग में नरेश नियमित प्रशिक्षक होकर एक बार फिर इसी प्रशिक्षण केंद्र में राज्य के मुक्केबाजों को तराश रहे हैं। मंडी जिला के वर्तमान उपायुक्त ने इस प्रशिक्षण केंद्र को लाखों रुपए की आर्थिक सहायता देकर यहां नया रिंग तथा उस पर छत भी डलवा दी है, ताकि हर मौसम में पूरा वर्ष यहां प्रशिक्षण कार्यक्रम चलता रहे।

प्रदेश के अन्य जिलों में भी वहां के उपायुक्तों को चाहिए कि वे खेलों के लिए भी थोड़ा समय निकाल कर यहां पर प्रशिक्षण दे रहे अच्छे प्रशिक्षकों को आवश्यक सुविधाएं जुटाएं। प्रदेश में कई महाविद्यालयों के पास अच्छे प्रतिभावान खिलाड़ी हैं तथा वहां पर खेल सुविधा भी है। वहां के प्राचार्य तथा प्राध्यापक शारीरिक शिक्षकों को भी चाहिए कि वे सुंदरनगर की तरह कम से कम एक खेल को अपनाकर उस खेल के खिलाडि़यों को राष्ट्रीय स्तर तक ले जाने की सोचें। अगर खेलों के कल्याण में इस तरह से किसी एक खेल पर केंद्रित होकर प्रयास किए जाएं, तो आने वाले समय में प्रदेश का खेलों में प्रदर्शन सुधरना लाजिमी है। हिमाचल प्रदेश युवा सेवाएं एवं खेल विभाग को चाहिए कि वह अपने यहां साठ से अधिक नियुक्त प्रशिक्षकों को लगातार प्रशिक्षण कार्यक्रम के लिए प्रेरित करे तथा समय-समय पर उनका निरीक्षण भी करे। क्या हिमाचल का खेल विभाग कभी अपने प्रशिक्षकों को उनके खेल परिणामों के बारे में पूछता है? हिमाचल के पास ऐसे कितने प्रशिक्षक हैं, जो हर वर्ष किसी न किसी राष्ट्रीय खेल प्रतियोगिता में राज्य को अपने ट्रेनी द्वारा पदक दिला रहे हैं। अच्छा प्रदर्शन करवाने वाले प्रशिक्षकों को हिमाचल ने क्या अवार्ड रखा है?

नहीं रखा है तो कब तक अवार्ड रखकर अच्छा कार्य करने वाले प्रशिक्षकों को सम्मानित कर अन्य को प्रेरणा दिलाने का कार्य किया जा रहा है। हिमाचल में मौजूदा समय में कार्यरत सभी प्रशिक्षकों को प्रोत्साहित किया जाता है और वे भी अपने कार्य को पूरी प्रतिबद्धता के साथ अंजाम देते हैं, तो निश्चित तौर पर प्रदेश में खेलों का स्तर सुधरेगा।  हिमाचल में खेलों को ऊपर उठाना है तो खेल विभाग, शिक्षा विभाग, खेल संघ तथा खिलाड़ी के अभिभावकों को आपस में तालमेल रखना होगा। इनमें से यदि एक भी कड़ी ढीली रही, तो इससे खेलों का भावी प्रदर्शन बिगड़ना लगभग तय ही है। खेल विभाग में तैनात प्रशिक्षकों को प्रशिक्षक नरेश से प्रेरणा लेनी चाहिए कि हिमाचल की संतानें भी राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अच्छा प्रदर्शन कर प्रदेश व राष्ट्र को गौरव दे सकती हैं। राज्य के प्रशिक्षक ईमानदारी से लगातार प्रयास करेंगे, को कुछ वर्षों बाद परिणाम सामने होंगे।

ई-मेलः penaltycorner007@rediffmail.com

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