प्रशिक्षकों की कमी से पिछड़ती हाकी

newsभूपिंदर सिंह

लेखक, पेनल्टी कार्नर पत्रिका के संपादक हैं

हिमाचल प्रदेश खेल विभाग अपने प्रशिक्षकों को खेल मैदान में प्रशिक्षण के लिए क्यों नहीं भेज रहा है? राज्य हाकी संघ के पास वर्तमान में हिमाचल हाकी के उत्थान के लिए क्या योजना है? इन सब प्रश्नों के उत्तर हर हिमाचल खेल प्रेमी चाहता है…

हिमाचल प्रदेश में खेलों के लिए वह वातावरण ही नहीं बन पा रहा है, जिससे अंतरराष्ट्रीय खेल प्रतियोगिताओं में हिमाचली नजर आएं। यह अलग बात है कि हिमाचल की संतानें राज्य के बाहर अपने हुनर को पोषित कर ओलंपिक तथा विश्व स्तरीय प्रतियोगिताओं में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा चुकी हैं। अन्य खेलों की ही तरह हिमाचल प्रदेश में हाकी की भी कमोबेश यही कहानी है। हालांकि हिमाचल में हाकी खेल का एक अच्छा-खासा इतिहास रहा है। वर्ष 1964 में टोकियो में आयोजित हुए ओलंपिक खेलों में हाकी स्पर्धा की स्वर्ण पदक विजेता टीम के कप्तान ऊना के चरणजीत सिंह ही थे। पद्मश्री सम्मान से नवाजे गए इस ओलंपियन की तैयारी में पंजाब का ही योगदान रहा। यह बात अलग है कि बाद में हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय में खेल एवं युवा गतिविधियां विभाग का निदेशक बनाकर राज्य सरकार ने जरूर अपना लिया था। हिमाचल में हाकी विकास के लिए पद्मश्री चरणजीत सिंह स्वयं भी कुछ नहीं कर सके।

1981 में खेले गए कनिष्ठ जूनियर विश्व कप में सर्वाधिक गोल दाग कर भारत को विजय दिलाने वाला तेजतर्रार भी ऊना जिला का ही दीपक कुमार था, जो  ओलंपियन तक का सफर प्रदेश के बाहर रहकर ही पूरा कर पाया। इस सितारे को तराशने में भी हिमाचल का कोई भी योगदान नहीं रहा है। महिला हाकी में सिरमौर जिला की सीता गोसाईं जरूर कनिष्ठ स्तर पर हिमाचल प्रदेश स्कूली हाकी की खोज रही है, मगर उसे भी परवान चढ़ने के लिए राज्य से पलायन करना पड़ा था। रेलवे द्वारा सहायता प्राप्त कर इस भारतीय कप्तान ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपना सिक्का बहुत देर तक चलाया। विश्व एकादश टीम में भी इस चमकते सितारे को जगह मिली थी, मगर इसकी तैयारी में भी हिमाचल प्रदेश का कोई भी योगदान नहीं रहा है। सीता गोसाईं की बड़ी बहन गीता गोसाईं भी भारत का प्रतिनिधित्व करने में कामयाब रही, मगर राज्य से बाहर चंडीगढ़ जाकर ही यह काम पूरा हो पाया था। इसी समय में हमीरपुर की वीना ठाकुर को राष्ट्रीय प्रशिक्षण शिविर में जाने का आधा-अधूरा न्योता भी मिला, मगर हिमाचल में रहकर अभ्यास करने की सजा में यह तेजतर्रार सेंटर फारवर्ड कभी भी राष्ट्रीय टीम का हिस्सा नहीं बन पाई। यह अलग बात है कि एक समय राष्ट्रीय महिला व पुरुष हाकी महासंघों के प्रमुख हिमाचल से ही थे।

ऐसा भी नहीं है कि प्रशासनिक सहयोग न मिलना ही हाकी की इस दयनीय स्थिति का एकमात्र कारण रहा है। कई दशकों तक विद्या स्टोक्स भारतीय महिला हाकी की प्रधान रही हैं तथा भारतीय पुरुष हाकी महासंघ के प्रधान रहे केपीएस गिल भी हिमाचल प्रदेश हाकी संघ के प्रदेश अध्यक्ष रह चुके हैं। जब इनकी नियुक्तियां हुईं, तो सहज ही इनसे कई अपेक्षाएं प्रदेश ने कर ली थीं। ये अपेक्षाएं गलत भी नहीं थीं। दुखद यह कि इनसे जो भी अपेक्षाएं प्रदेश ने हाकी खेल के विकास-प्रसार के लिए की थीं, वे धरी की धरी ही रह गईं। हिमाचल में हाकी के उत्थान के लिए ये प्रमुख पदाधिकारी राज्य में कुछ भी नहीं कर पाए। पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल ने अपने कार्यकाल में कई खेलों के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्ले फील्ड का निर्माण करवाया और हाकी के लिए भी ऊना में एस्ट्रोटर्फ बिछवाया है। एक एस्ट्रोटर्फ शिलारू में भारतीय खेल प्राधिकरण ने बिछाया है, जो राष्ट्रीय प्रशिक्षण शिविर के लिए उपयोग में लाया जाता है। एक एस्ट्रोटर्फ बिछाने पर बड़ी रकम खर्च करनी पड़ती है। हैरानी यह कि इन एस्ट्रोटर्फ को बिछाने के आगे इसके सदुपयोग के लिए जमीनी स्तर पर कुछ भी खास नहीं हो पाया। यहां हालत यह कि ऊना में आज तक लगातार हाकी एस्ट्रोटर्फ पर कोई भी प्रशिक्षक प्रशिक्षण करवाता नजर नहीं आया है। हिमाचल प्रदेश युवा सेवाएं एवं खेल विभाग के पास आधा दर्जन हाकी प्रशिक्षक नियुक्त हैं, मगर हिमाचल में हाकी का लगातार प्रशिक्षण कहीं भी नहीं हो पा रहा है। साई के धर्मशाला खेल छात्रावास में हाकी खेल है, मगर वहां भी खेल प्रशिक्षण के नाम पर शून्य ही है। राज्य में स्कूली स्तर पर माजरा का खेल छात्रावास जरूर हिमाचल हाकी की पहचान बनाए हुए है। क्या ऊना में हाकी का खेल छात्रावास नहीं खोला जा सकता है, जहां विश्व स्तरीय खेल सुविधा उपलब्ध है।

हिमाचल प्रदेश खेल विभाग अपने प्रशिक्षकों को खेल मैदान में प्रशिक्षण के लिए क्यों नहीं भेज रहा है? राज्य हाकी संघ के पास वर्तमान में हिमाचल हाकी के उत्थान के लिए क्या योजना है? इन सब प्रश्नों के उत्तर हर हिमाचल खेल प्रेमी चाहता है।

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-संपादक

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