फिर एक बार व्यवस्था ने जनता को पछाड़ा

भानु धमीजा

( सीएमडी, ‘दिव्य हिमाचल’ लेखक, चर्चित किताब ‘व्हाई इंडिया नीड्ज दि प्रेजिडेंशियल सिस्टम’ के रचनाकार हैं )

नौकरशाही को दोष देना तर्कसंगत भी नहीं है, क्योंकि अधिकतर अफसर हमारे मंत्रियों की पसंद से रखे जाते हैं। मोदी की भी निस्संदेह अपनी टीम है। अधिकतर गुजरात से। असल में, तो यहां तक कहा जा सकता है कि आरबीआई गवर्नर भी उनके अपने आदमी हैं। सच्चाई यह है कि लोगों, अफसरों, या यहां तक कि राजनेताओं पर दोष लगाना या उनको भाषण देना, व्यवस्थागत कमजोरियां दूर नहीं कर सकता। यह भारतीय सरकार की प्रणाली है जिसे दोष दिया जाना चाहिए…

एक और आशा से भरा प्रशासन भारत की त्रुटिपूर्ण शासन प्रणाली का शिकार हो रहा है। मोदी अच्छा काम कर रहे थे, लेकिन उनके विमुद्रीकरण के निर्णय और इस पर अमल करने के गलत तरीके ने उनकी सरकार की चमक फीकी कर दी है। आज एक बार फिर भारत की संसद गैर-कार्यशील, कार्यपालिका नियंत्रण से बाहर, और न्यायपालिका गैर जवाबदेह दिख रही हैं। भारतीय व्यवस्था पहले भी कई सरकारों को विफल कर चुकी है। वह इसलिए क्योंकि संसदीय प्रणाली का हमारा ढांचा बुनियादी तौर पर टूट चुका है। पहले यह स्पष्ट कर लें कि दोष भारतीय लोगों का नहीं है। वे बार-बार आशा जगाने वाले नए प्रशासनों के प्रति विश्वास जताकर अपनी बुद्धिमता दिखा चुके हैं। वर्ष 1971 और 1980 में इंदिरा गांधी, 1977 में जनता सरकार, 1984 में राजीव गांधी व वर्ष 1996 और 1999 में वाजपेयी, कुछ ऐसे उदाहरण हैं। मोदी निश्चित रूप से यह शिकायत नहीं कर सकते कि उन्हें जनता का समर्थन नहीं मिला। दरअसल, उनकी विमुद्रीकरण की योजना के प्रति लोगों का धैर्य अत्यंत असाधारण है। दोष नौकरशाहों का भी नहीं है। अफसरों पर दोषारोपण संसदीय लोकतंत्र के मूल सिद्धांत के विपरीत है कि जिम्मेदारी हमेशा जनता के प्रतिनिधियों की रहती है। नौकरशाही को दोष देना तर्कसंगत भी नहीं है, क्योंकि अधिकतर अफसर हमारे मंत्रियों की पसंद से रखे जाते हैं।

मोदी की भी निस्संदेह अपनी टीम है। अधिकतर गुजरात से। असल में, तो यहां तक कहा जा सकता है कि आरबीआई गवर्नर भी उनके अपने आदमी हैं। सच्चाई यह है कि लोगों, अफसरों, या यहां तक कि राजनेताओं पर दोष लगाना या उनको भाषण देना, व्यवस्थागत कमजोरियां दूर नहीं कर सकता। यह भारतीय सरकार की प्रणाली है जिसे दोष दिया जाना चाहिए। विचार करें कि क्यों संसद का शीतकालीन सत्र पूरी तरह हंगामे की भेंट चढ़ गया। किसी भी संसदीय प्रणाली में विधानमंडल सर्वोच्च माना जाता है। ‘संसदीय संप्रभुता’ एक आधारभूत सिद्धांत है। परंतु भारत में नहीं। यहां सरकार विधान मंडल को नियंत्रित करती है, न कि उल्टे। कोई भी शक्ति – यहां तक कि राष्ट्रपति भी-कार्यपालिका को मनमानी करने से नहीं रोक सकती। संसद में विपक्ष अशक्त है। इसलिए यह मात्र हंगामा या वाकआउट ही कर सकता है। और वह ठीक यही करता है। सरकार की मात्र रबड़स्टैंप बना दी गई भारतीय संसद लगातार उपद्रवी होती रही है। स्तंभकार व सांसद, कुलदीप नैयर, ने 2004 में खुलासा किया था कि राज्यसभा में अपने छह वर्षों के दौरान उन्होंने पाया कि ‘‘सांसद सदन में विघ्न डालने को निर्देशों की प्रतीक्षा करते थे। व्हिप और राजनीतिक दलों के अन्य पदाधिकारी उन्हें बताते थे कि कार्यवाही कैसे बाधित करनी है।’’ भारतीय विधानमंडल सदस्य केवल वेल की ओर ही नहीं भागते रहे हैं, वे मुक्कों का आदान-प्रदान कर चुके हैं, मंत्रियों पर हमला कर चुके हैं, फर्नीचर और जूते फेंक चुके हैं, मेजों पर चढ़ चुके हैं, यहां तक कि अपने अधोवस्त्र दिखा चुके हैं। वर्ष 1989 में लोकसभा एक ही दिन में रिकार्ड आठ बार स्थगित हुई थी। वर्ष 2007 में भारत-अमरीका परमाणु संधि पर अनिश्चितकाल के लिए स्थगित होने से पूर्व, संसद एक सप्ताह से अधिक समय तक चल ही नहीं पाई। कई विधानमंडल अध्यक्ष भारतीय सांसदों व विधायकों को निरंतर धिक्कार चुके हैं – ‘यह चिडि़याघर नहीं है,’ ‘आपको स्वयं पर शर्म आनी चाहिए,’ ‘बच्चे अधिक अनुशासित हैं,’ आदि – पर कोई फायदा नहीं हुआ।

संसद या राष्ट्रपति द्वारा कोई कंट्रोल न होने से भारत की व्यवस्था में दूसरी मूलभूत समस्या जन्म लेती है। भारत की कार्यपालिका आपे से बाहर हो जाती है। एक प्रधानमंत्री गुप्त रूप से काम कर सकता है। या बिना अनुमोदन कोई भी निर्णय ले सकता है, या लागू कर सकता है। विमुद्रीकरण के निर्णय पर विचार-विमर्श न करने के पीछे मोदी का तर्क गोपनीयता था। परंतु बंद दरवाजों में काम करने वाली कोई भी व्यवस्था गलतियां करती ही है। आखिरकार, संसद निगरानी करे या अनुमति दे, इसके पीछे विचार यही है कि सरकार मनमाने या मूर्खतापूर्ण निर्णय न ले सके। जब तक बात किसी गुप्त सैन्य अभियान की न हो, सरकार को  गोपनीयता के बजाय खुली बहस से कहीं अधिक लाभ मिलता है। विमुद्रीकरण के निर्णय पर खुली समीक्षा ने इसे प्रसिद्धि पाने की प्रतियोगिता या नैतिक युद्ध बनाने के बजाय कालेधन का पक्का इलाज बना दिया होता। भारतीयों ने कालाधन पैदा करना या उसे स्टोर करना केवल पूर्ववर्ती सरकारों की नीतियों से ही सीखा। स्वयं सरकारी भ्रष्टाचार ही इसके लिए सबसे अधिक जिम्मेदार था। कालाधन बनने के कारण जाने-पहचाने हैंः अनुचित और दमनकारी टैक्स व्यवस्था, कानूनों की बहुतायत, नौकरशाही संबंधी भ्रष्टाचार, और राजनेताओं का लेन-देन। अब समस्त भारतीयों से चोरों की तरह व्यवहार, और जनता को नरक में धकेलना गलत है। इस व्यवस्था को-मुख्यतः सरकारों और स्वयं राजनीतिक दलों को-ठीक करने की आवश्यकता है, भारतीय लोगों को नहीं। सोच-समझकर लिए गए निर्णय ने वास्तविक सुधारों पर प्रकाश डाला होता, और निर्णय के पीछे ज्यादा एकता होती। इससे राष्ट्र की प्रतिष्ठा और मोदी की साख को भी चोट नहीं पहुंचती। और सबसे बढ़कर, इससे गरीब की आर्थिकी को हुआ नुकसान बच जाता। क्या हो जाता अगर चंद लोग अपने बेईमानी से कमाए लाभ कुछ देर और दबाए रहते?

लेकिन भारत में कार्यपालिका कई बार नियंत्रण से बाहर हुई है। अपने पिछले लेख में मैंने इंदिरा गांधी द्वारा 1969 में बैंक राष्ट्रीयकरण पर लिए गए उस गोपनीय निर्णय के विषय में लिखा था जिसे रातोंरात घोषित किया गया था। यह एमर्जेंसी से पहले का वक्त था। जैसा हम जानते हैं, इंदिरा गांधी की मनमानी ने आपातकाल के समय में तो भारत के लोकतंत्र का ही अंत कर दिया। ऐसी प्रथाएं नेहरू के समय से चलती आ रही हैं। उनका संसद पर पूर्ण नियंत्रण था, और वह राष्ट्रपति के पद को हाशिए पर रखने में कामयाब रहे। उनका वर्ष 1951 में पंजाब सरकार को भंग करना, चीन या कश्मीर के प्रति उनकी नीतियां, बिना सोचे-विचारे लिए निर्णयों के उदाहरण हैं। ऐसे ही 1980 के दशक में राजीव गांधी ने दलबदल विरोधी कानून पास करवाए जिन्होंने सांसदों को शक्तिहीन बना दिया। संपूर्ण इतिहास में, लगभग समस्त प्रधानमंत्रियों ने सीबीआई का दुरुपयोग किया, या राज्यों के अधिकारों का अतिक्रमण किया। उन्होंने अपनी मर्जी से – योजना आयोग से लेकर नीति आयोग तक – सरकारी संस्थाएं बनाईं या फिर बिगाड़ीं। इस प्रकार की मनमानियों की सूची बहुत लंबी है। कार्यपालिका की इस मनमानी ने भारत की प्रणाली में तीसरी मूलभूत समस्या पैदा कर दी है। न्यायपालिका जनता के प्रति गैर जवाबदेह हो गई है। न्यायाधीश भारत के प्रधानमंत्रियों की मनमानी से तबदील या पदोन्नत किए जाते रहे। इंदिरा गांधी द्वारा 1973 में तीन जजों का अधिक्रमण एक प्रसिद्ध उदाहरण है। इस प्रथा पर न्यायपालिका के विद्रोह से वर्तमान कालेजियम व्यवस्था बनी। एक ऐसी व्यवस्था जो जनप्रतिनिधियों की सहभागिता के बिना न्यायाधीश नियुक्त करती है। अब न्यायालय अनुत्तरदायी हैं क्योंकि जन असंतोष उनका कुछ बिगाड़ नहीं सकता, और कार्यपालिका उदासीन है। इसलिए कोर्ट अब कार्यपालिका के कामों में हस्तक्षेप कर रहे हैं। वे कार्यकारी निर्णयों को बाधित करने या उनकी आलोचना करने का कोई अवसर नहीं छोड़ते। मोदी का विमुद्रीकरण अभियान भारतीय शासन प्रणाली की इन्हीं मूलभूत दुर्बलताओं से पीडि़त है। उनका यह अभियान अभी बच सकता है-यह उनके अन्य सुधारों की तेजी पर निर्भर है-परंतु आशंका है कि यह दोषपूर्ण प्रणाली फिर भारत को नुकसान पहुंचाएगी। एक महान देश के लिए ऐसी ढांचागत समस्या को नजरअंदाज करना समझदारी नहीं है।

-साभार

हफिंगटन पोस्ट/टाइम्स ऑफ इंडिया

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