सियासत के साए में हिमाचली विकास

Dec 16th, 2016 12:03 am

प्रो. एनके सिंह

( लेखक, एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया के पूर्व चेयरमैन हैं )

बड़े मसलों को एक तरफ रख दें, तो भी ग्रामीण व कस्बों के स्तर पर हमारे नेताओं का संकीर्ण दृष्टिकोण ही देखने को मिला है। यहां विकास पर ध्यान देने के बजाय दो प्रमुख दल श्रेय लेने की होड़ में एक-दूसरे से लड़-भिड़ रहे हैं या फिर नेतागण अपनी ही पार्टी में खुद को दूसरों से बेहतर साबित करने में जुटे हैं। क्या हिमाचल विकास के मुद्दे पर केंद्रित होकर जन कल्याण को सुनिश्चित कर पाएगा या फिर यूं ही सियासी हितों को आगे बढ़ाने की परंपरा जारी रहेगी…

यह सच है कि राष्ट्रीय व सार्वजनिक हित में सर्वोच्च प्राथमिकता वाले एक मसले पर आज खुलकर सियासत हो रही है। हम देश में साफ तौर पर देख सकते हैं कि जनता के जनादेश के साथ किस तरह का व्यवहार हो रहा है। इस बात की अब कोई हैरानी नहीं होनी चाहिए कि ‘हिमाचल दिस वीक’ के एक सर्वेक्षण में प्रतिक्रिया दर्ज करवाने वाले 70 फीसदी लोगों ने निराशा दर्ज करवाई है कि देश में हो रही सियासी कुश्ती के आगे संसदीय हित हार रहे हैं। स्पष्ट बहुमत वाली सरकार संसद में खुद को लाचार पा रही है, तो संविधान में भी इस संकट का कोई समाधान नहीं दिखता। विपक्ष ने पूरी संसदीय कार्यवाही को बंधक बना रखा है और सत्ता पक्ष की बेबसी को तोड़ने का कोई रास्ता नजर नहीं आता। यहां तक कि सत्ता पक्ष के मुखिया यानी प्रधानमंत्री ने सार्वजनिक तौर पर शिकायत दर्ज करवाई है कि उन्हें सदन में बोलने नहीं दिया जा रहा है। देश के राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने भी सांसदों के इस व्यवहार की भर्त्सना की है और उन्हें बिना हंगामा किए अपना कार्य करने की नसीहत दी। इसे वास्तव में संविधान की केंद्रीय संस्था के प्रति सम्मान और तंत्र की कार्यशैली का निम्नतम बिंदु माना जाएगा और इसका कोई उपचार भी नजर नहीं आता।

कैनवास का एक बड़ा हिस्सा तब तक कलंकित ही रहेगा, जब तक राष्ट्रीय हित से जुड़े दायित्वों के प्रति सजगता नहीं दिखाई जाती। जनता ने अपने हितों की रक्षा की जो जिम्मेदारी सांसदों-विधायकों के कंधों पर डाली है, उसका बिना समय व संसाधन गंवाए निर्वहन करना होगा। देश में निचले स्तर यानी गांवों-कस्बों की बात करें, तो हालात बहुत दयनीय हैं, क्योंकि यहां राजनीतिक व्यवस्था की जड़ों को प्रभावित करने वाले एक बड़े खेल की शुरुआत हो चुकी है। मैं कुछ ऐसे लाक्षणिक मामलों का उल्लेख करने जा रहा हूं, जिनसे यह बात काफी हद तक स्पष्ट हो जाएगी कि विकास हर राजनीतिक दल का सरोकार नहीं रह गया है। 2015 में किसी पार्टी के विधायक ने ऊना जिला के गगरेट स्थित एक क्लीनिक में बड़ी धूमधाम के साथ एक अल्ट्रा साउंड मशीन की स्थापना की थी। उसके बाद चुनावों में वह विधायक और उसकी पार्टी चुनाव हार गए, लेकिन अगले पांच साल बाद फिर से उनकी पार्टी सत्ता में आ गई। उन्हीं की पार्टी के एक अन्य विधायक ने उसी मशीन का दौलतपुर में उद्घाटन किया। एक राजनीतिक कार्यकर्ता द्वारा आरटीआई दायर करने के बाद इसे ऊना जिला में स्थानांतरित कर दिया गया और तब से यह वहीं पर स्थापित है। यह सारा फेर एक ही पार्टी के भीतर एक-दूसरे से सियासी बढ़त के चक्कर में होता रहा। एक अन्य मामला मछली पालन के तालाब का है, जिसे कांग्रेस के कार्यकाल में दियोली गांव में शुरू किया गया था और जब भाजपा सत्ता में आई, तो उसने इसे पट्टे पर दे दिया।

जब कांग्रेस दोबारा सत्ता में आई, तो इसका पुराना स्वरूप फिर से बहाल हो गया। हिमाचल में अधिकतर सड़कें खस्ताहाल हैं और उनकी दशा सुधारने के बजाय ऊना में एक सड़क का शिलान्यास पहले भाजपा के एक सांसद ने किया और फिर उसी सड़क का शिलान्यास एक कांग्रेसी नेता ने कर डाला। इस तरह से श्रेय लेने की होड़ के बजाय नेताओं को सड़कों की प्रगति और समय-समय पर समीक्षा की ओर ध्यान देना चाहिए, ताकि वे समय से बन सकें और उनकी गुणवत्ता भी बरकरार रहे। मैं सूहीं नाम के एक छोटे से गांव में रहता हूं, जहां करीब 200 जनजातीय परिवार रहते हैं। यहां के किसानों को सिंचाई की सुविधा देने के उद्देश्य से भाजपा द्वारा 2014 में एक परियोजना की शुरुआत की गई थी। कुछ समय बाद उपमंडल अधिकारी ने कह दिया कि परियोजना के लिए मिले 80 लाख की रकम में से कुछ भी शेष नहीं बचा है और उसका कार्य वहीं पर थम गया। कुछ समय बाद कांग्रेस द्वारा पेयजल आपूर्ति के लिए एक परियोजना शुरू की गई, जबकि उस क्षेत्र में पहले से ही पांच बोरवेल काम कर रहे थे और वहां पीने के पानी की कोई किल्लत भी नहीं थी। इस परियोजना का उद्घाटन स्वयं मुख्यमंत्री ने किया था और करोड़ों रुपए खर्च करने के बावजूद यह परियोजना आज तक सही ढंग से काम नहीं कर पा रही है, जबकि इसमें कई स्थानीय नेताओं ने वित्तीय गड़बडि़यों का आरोप भी लगाया है। जरूरत से कम बारिश होने के कारण

आज हमारे किसान सिंचाई की कोई अदद व्यवस्था न होने से बुरी तरह से परेशान हैं। सिंचाई के लिए उचित व्यवस्था न होने के कारण उनकी कई फसलें बर्बाद हो चुकी हैं। लेकिन भाजपा द्वारा शुरू की गई सिंचाई परियोजना में शिलान्यास के कई वर्ष बीत जाने के बाद भी कोई खास प्रगति नहीं हो पाई है और दूसरी तरफ कांग्रेस के सत्ता में आने के बाद शुरू की गई पेयजल परियोजना कोई खास लाभ नहीं दे पा रही है। मैं गगरेट, अंब और बद्दी के कई उद्यमियों से मिला, जिन्होंने इन क्षेत्रों में अपना व्यवसाय स्थापित किया हुआ है। उन्होंने बताया कि यहां के कई उद्यमी कामकाज में अत्यधिक राजनीतिक दखल के कारण अपना व्यवसाय बंद कर चुके हैं। भाजपा शासन के दौरान शोघी स्थिति सुपर मैक्स को गहरे संकट का सामना करना पड़ा था और लंबे समय के लिए इसने अपने व्यवसाय पर ताला लटका दिया। हालांकि इसकी गगरेट स्थित इकाई आज भी कार्यशील है। बद्दी स्थिति उद्योग के प्रबंधकों ने पूरे विश्वास के साथ मुझे बताया कि यहां हद से भी ज्यादा सियासी दखल हो रहा है। यहां तक कि एक चपरासी की बदली को लेकर भी प्रधान, स्थानीय विधायक या कई बार तो मंत्रियों द्वारा दबाव बनाया जाता है। इस सब के चलते वे स्वतंत्र रूप से अपना कार्य नहीं कर पा रहे हैं।

जब मैंने उन्हें बताया कि यह परंपरा तो पूरे देश में सामान्य रूप से प्रचलन में है, तो उन्होंने उत्तराखंड का उदाहरण देते हुए बताया कि वहां सियासी हस्तक्षेप की मात्रा हिमाचल की अपेक्षा काफी कम है और कामकाज का माहौल भी बेहतर है। जहां तक व्यवसाय के लिए सुविधा की सवाल है, मैंने व्यक्तिगत तौर पर भी इस बात को महसूस किया है कि हमारे राज्य की अपेक्षा दूसरे राज्यों में व्यवासाय के लिए माहौल कहीं अनुकूल है। अब तक के विश्लेषण में मैंने केवल जड़ों में समाई सियासत की ही व्याख्या की है। केंद्रीय विश्वविद्यालय या अन्य केंद्रीय संस्थानों की स्थापना के विषय को तो अभी छुआ तक नहीं है, जहां सियासत और भी मुखर रूप में संघर्षरत है। इन बड़े मसलों को एक तरफ रख दें, तो भी ग्रामीण व कस्बों के स्तर पर हमारे नेताओं का ऐसा ही संकीर्ण दृष्टिकोण देखने को मिला है। यहां विकास पर ध्यान देने के बजाय दो प्रमुख दल श्रेय लेने की होड़ में एक-दूसरे से लड़-भिड़ रहे हैं या फिर नेतागण अपनी ही पार्टी में खुद को दूसरों से बेहतर साबित करने में जुटे हैं। क्या हिमाचल विकास के मुद्दे पर केंद्रित होकर जन कल्याण को सुनिश्चित कर पाएगा या फिर यूं ही सियासी हितों को आगे बढ़ाने की परंपरा जारी रहेगी?

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