‘एक भारत, एक चुनाव’ लोकतांत्रिक सिद्धांतों का उल्लंघन

भानु धमीजा

( भानु धमीजा सीएमडी, ‘दिव्य हिमाचल’ )

लेखक, चर्चित किताब ‘व्हाई इंडिया नीड्ज दि प्रेजिडेंशियल सिस्टम’ के रचनाकार हैं चुनावों पर आधारित एक देश में चुनावों की संख्या कम करना कुछ विचित्र है। क्या भारत के लोकतंत्र से भी अधिक महत्त्वपूर्ण कुछ और है? अकसर चुनाव होना हमारी ताकत होनी चाहिए। हमने केंद्र और राज्यों के चुनावों को अलग करने की एक अच्छी व्यवस्था के अभाव में इसे अपनी कमजोरी बना लिया है। अगर हर राज्य अपनी सरकार को निर्वाचित करे, और केंद्र अपने काम से काम रखे, तो दोनों सरकारें बेहतर होंगी। भारत को यही दिशा चुननी चाहिए…

प्रधानमंत्री मोदी 2019 में भारत की लोकसभा और विधानसभाओं के लिए एक साथ चुनाव करवाने पर पूरा जोर दे रहे हैं। सरकारी एजेंसियां भी एक मजबूत प्रधानमंत्री की सार्वजनिक रूप से व्यक्त की गई इच्छा पूरी करने के लिए एक-दूसरे से होड़ में हैं। परंतु लोगों ने इस विचार के दीर्घकालीन लाभों या हानियोें को न समझा है और न ही उन पर विचार-विमर्श किया है। यह विचार व्यावहारिक और देश के निकट भविष्य के लिए लाभदायक लगता है, परंतु यह मूलभूत लोकतांत्रिक सिद्धांतों को तोड़ता है। इसमें संदेह है कि यह दीर्घकाल में देश के लिए फायदेमंद होगा। समानांतर चुनाव करवाना कोई नई सोच नहीं है। भारत में पहले चार आम चुनाव इसी प्रकार हुए थे। इंदिरा गांधी ने 1971 में यह प्रथा बदल दी थी। वर्ष 1995 में तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी ने इस व्यवस्था को वापस लाने का प्रयास किया। उनका कहना था कि अलग-अलग चुनाव ‘‘न तो लोकतंत्र के स्वास्थ्य और न ही प्रशासन के लिए ठीक’’ साबित हुए हैं। वर्ष 2010 में उन्होंने एक और प्रयत्न किया। इस बार उन्होंने इस व्यवस्था में निश्चित अवधि की विधायिकाओं के लाभ पर जोर दिया। उन्होंने लिखा, ‘‘हमारे संविधान निर्माताओं ने ब्रिटिश प्रणाली अपनाई और ऐसी कार्यपालिका बनाई जिसे निर्वाचित विधायिका का कार्यकाल छोटा करने का अधिकार है।’’ इसलिए उनका विचार यह नहीं था कि ‘‘संसद से सरकार को हटाने का अधिकार छीन लिया जाए, बल्कि यह कि सरकार से संसद को भंग करने का हक हटा दिया जाए।’’

इस मौजूदा प्रयास में मोदी व अन्यों ने कई और तर्क भी पेश किए हैं। प्रधानमंत्री कहते हैं, ‘‘भारत के मतदाता अब बहुत परिपक्व हैं और लोकसभा व विधानसभा चुनावों के लिए अलग निर्णय लेने में सक्षम हैं।’’ ये चुनाव एक साथ करवाने में ‘‘खर्च कम हो सकते हैं, काले धन के जंजाल से मुक्ति मिल सकती है, और सरकार को देश को आगे बढ़ाने के लिए पूरे पांच साल मिल सकते हैं।’’ राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने ताल मिलाते हुए कहा है कि ‘‘समूचे वर्ष कोई न कोई चुनाव होने से चुनाव आचार संहिता के चलते सरकार के सामान्य कार्यकलाप ठप हो जाते हैं।’’ नीति आयोग की 36 पृष्ठों की एक ताजा रिपोर्ट ने इन तर्कों को सहारा दिया है। साथ ही इसने कुछ और भी दलीलें दी हैं ः लगातार होने वाले चुनाव सामान्य सार्वजनिक जीवन को बाधित करते हैं; इनमें बड़ी मात्रा में सरकारी व सुरक्षा कर्मियों की आवश्यकता होती है; और ये ‘‘जाति, धर्म व सांप्रदायिक मुद्दों को लगातार उछालते रहते हैं।’’ नीति आयोग सहमति देने वाली ताजातरीन सरकारी एजेंसी है। एक संसदीय स्थायी समिति — आश्चर्यजनक रूप से जो ‘कार्मिक, लोक शिकायत, कानून एवं न्याय’ संबंधी है — यह पिछले साल ही कर चुकी है। इसने सामानांतर चुनावों के पक्ष में विधि आयोग की 1999 की एक अनुशंसा को मात्र आगे बढ़ाने का काम किया। जुलाई, 2016 में भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त ने भी हरी झंडी दिखाई। हालांकि यह चेतावनियों से भरपूर विशुद्ध नौकरशाही ही थी। उन्होंने कहा, ‘‘हम इसके पक्ष में हैं, बशर्ते इस पर आम सहमति हो, राजनीतिक दलों में एकराय हो, और साथ ही संविधान में संशोधन किया जाए।’’

नीति आयोग तो समानांतर चुनाव मोदी की समय सीमा में करवाने का पूरा प्रयास कर रहा है। इसकी रिपोर्ट में दो चरणों के चुनावों का खाका पेश किया गया हैः लोकसभा व लगभग आधे राज्यों के विधानसभा चुनाव एक साथ 2019 में, और शेष राज्यों के 2021 में। जबकि कई विपक्षी पार्टियां — कांग्रेस, त्रिणमूल, एनसीपी, सीपीआई, आदि — पहले ही समूचे विचार के प्रति संदेह व्यक्त कर चुकी हैं। स्पष्टतया मोदी समानांतर चुनाव लागू करने की जल्दी में हैं, क्योंकि उन्हें 2019 में जीत की उम्मीद है। आडवाणी की भी 1995 और 2010 में दिलचस्पी इसी कारण थी। वह जानते थे कि आगामी चुनावों में भाजपा अच्छा प्रदर्शन करेगी। विडंबना यह है कि चुनाव पृथक करवाने के इंदिरा गांधी के 1971 के निर्णय का भी यही उद्देश्य था। उन्हें पता था कि उनका सितारा बुलंदी पर था और वह लोकसभा चुनावों का विधानसभाओं संग होने का इंतजार नहीं करना चाहती थीं। उन्हें लगा कि राज्यों के कुछ नेता लोकप्रिय हो रहे थे और वह उनसे पार नहीं पा सकती थीं। ऐसी सियासी मुनाफाखोरी देश के लिए सही नहीं है। इंदिरा गांधी ने क्यों महसूस किया कि लोकसभा चुनाव राज्य चुनावों से अलग होने चाहिए इसकी एक बहुत अच्छी वजह थी। भारत के आकार और विविधता के चलते यह स्वाभाविक था कि राज्यों के मसलों, नेताओं और पार्टियों की लोकप्रियता बढ़े। यह तथ्य लगातार प्रमाणित हो चुका है। एक के बाद एक राज्यों में, स्थानीय उत्तरदायित्व लोगों की सबसे दृढ़ मांग बन चुकी है। राज्य चुनावों का महत्त्व घटना — जो राष्ट्रीय पार्टियों और मुद्दों को राज्यों के साथ इकट्ठा करने से अवश्य होगा — भारत के संघवाद के लिए अच्छा नहीं हो सकता।

हम भारतीयों ने एक सच्चे संघवाद का महत्त्व असल में कभी समझा ही नहीं है। हम राज्य सरकारों को उस राज्य के लोगों और उनके निर्वाचित प्रतिनिधियों के बीच के मुद्दे के रूप में नहीं देखते। हम राज्य के लोगों पर यह विश्वास नहीं करते कि वे स्वयं जानते हैं कि उनके लिए बेहतर क्या है। और हम उनके नुमाइंदों पर भी भरोसा नहीं करते। इसके बजाय हम बाहर से गवर्नरों को उन पर नजर रखने के लिए भेजते हैं, और राज्य सरकारों को तथाकथित मजबूत केंद्र के जरिए नियंत्रित करते हैं। परंतु केंद्र सरकार — या देश के प्रधानमंत्री — द्वारा राज्य के चुनाव में लिप्त होने का औचित्य ही क्या है? सच्चाई यह है कि राज्य चुनावों को अधिक महत्त्व देकर, और राज्य सरकारों को ज्यादा स्वतंत्रता प्रदान कर, हम धरातल पर शासन में और सुधार लाएंगे। इसके अलावा, इस मूलभूत संवैधानिक सिद्धांत कि सरकारें किसी भी समय गिराई जा सकती हैं को तोड़े बिना चुनाव साथ-साथ कैसे संभव हैं? यही सिद्धांत संसदीय सरकारों को उत्तरदायी बनाता है। संविधान सभा में ‘उत्तरदायी’ बनाम ‘स्थायी’ सरकारें चुनने के विषय में अंबेडकर के तर्क को याद कीजिए। उन्होंने कहा था कि दोनों का एक साथ होना असंभव है। चुनावों का कार्यकाल निश्चित करने से भारत में पांच वर्ष टिकने वाली सरकारें तो होंगी, लेकिन उत्तरदायित्व के नाम पर ज्यादा नहीं बचेगा। लचर प्रशासन व भ्रष्टाचार और विकराल हो जाएगा।

नीति आयोग और अन्यों ने इस मूलभूत सिद्धांत को बाइपास करने के रास्ते सुझाए हैं। एक सुझाव यह है कि अविश्वास प्रस्ताव में अगले प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री का नाम अवश्य दिया जाना चाहिए। परंतु सरकारें गिराने की जिन शरारतों को हम देख चुके हैं उनसे नहीं लगता कि कोई गारंटी होगी कि अगली सरकार पर भी कोई समझौता होगा। ऐसे में या तो कोई सरकार ही नहीं होगी या अल्पमत की गवर्नमेंट बनेगी। एक अन्य प्रस्ताव 2011 के एक ब्रिटिश एक्ट की नकल का है जिसके तहत सरकार गिराने के लिए दो तिहाई बहुमत आवश्यक है। यह भी अलोकतांत्रिक है, और यह भी सौदेबाजी व भ्रष्टाचार को बढ़ावा देगा। ये प्रस्ताव चुनाव साथ करवाने की एक अन्य मुख्य समस्या की तरफ इशारा करते हैं: यह व्यवस्था स्थायी नहीं हो सकती। एक बार का यह तालमेल केवल कुछ चुनावों का बार-बार होना ही कम करेगा वह भी कुछ समय के लिए। अन्य सभी चुनाव — स्थानीय, पंचायत, म्यूनिसिपल, राज्यसभा, राष्ट्रपति, आदि — पहले ही की तरह होते रहेंगे। निष्कर्ष यह है कि चुनावों पर आधारित एक देश में चुनावों की संख्या कम करना कुछ विचित्र है। क्या भारत के लोकतंत्र से भी अधिक महत्त्वपूर्ण कुछ और है? अकसर चुनाव होना हमारी ताकत होनी चाहिए। हमने केंद्र और राज्यों के चुनावों को अलग करने की एक अच्छी व्यवस्था के अभाव में इसे अपनी कमजोरी बना लिया है। अगर हर राज्य अपनी सरकार को निर्वाचित करे, और केंद्र अपने काम से काम रखे, तो दोनों सरकारें बेहतर होंगी। भारत को यही दिशा चुननी चाहिए।

साभार : हफिंग्टन पोस्ट/टाइम्स ऑफ इंडिया

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