भारत में द्वि-दलीय राजनीति क्यों नहीं

Mar 1st, 2017 12:07 am

भानु धमीजा

सीएमडी, ‘दिव्य हिमाचल’ (लेखक, चर्चित किताब ‘व्हाई इंडिया नीड्ज दि प्रेजिडेंशियल सिस्टम’ के रचनाकार हैं)

किसी भी देश में एक स्वस्थ राजतंत्र के निर्माण के लिए द्वि-दलीय व्यवस्था आवश्यक है। मुद्दों पर बहुमत का नजरिया जानने की जनता की मूल लोकतांत्रिक इच्छा को संतुष्ट करने का यही एकमात्र रास्ता है। इससे लोग चुनावी व विधायी निर्णयों को ज्यादा स्वीकृति देते हैं, और एक निर्णायक व सहभागी लोकतंत्र का निर्माण होता है। दो अतिवादी विचारों के सामने आने से मध्यमार्गी नीतियां बनाने की राह भी खुलती है, जिन्हें और भी ज्यादा व्यापक आम सहमति मिल सकती है। दो पार्टियों पर आधारित व्यवस्था सरकारों को भी अधिक उत्तरदायी बनाती है, क्योंकि सत्तापक्ष या विपक्ष के पास बहानेबाजी का कोई तरीका नहीं बचता…

भारत के राजनीतिक दल एक बार फिर वोट बैंक की निर्लज्ज सियासत में व्यस्त हैं। वे लोगों का धर्म, जाति और आर्थिक वर्ग के आधार पर शोषण कर रहे हैं। दर्जनों दल प्रतिस्पर्धा में हैं और वे हमारे समाज को गहराई तक विभक्त कर रहे हैं। सबसे बुरा यह कि विजेता जनता के सिर्फ अल्पमत से ही जीतकर हमारे शासक बन जाएंगे। इसी कारण भारत में असैद्धांतिक गठबंधन और अस्थायी सरकारें बनती रही हैं।

परंतु सालों से चली आ रही इन बुराइयों के बाद भी, भारत दो राजनीतिक दलों पर आधारित व्यवस्था विकसित करने में असफल रहा है। ऐसा इसलिए क्योंकि भारत के राजनीतिक विखंडन की वजहें ढांचागत हैं। उनका कारण हमारी सरकार की दोषपूर्ण प्रणाली है।

किसी भी देश में एक स्वस्थ राजतंत्र के निर्माण के लिए द्वि-दलीय व्यवस्था आवश्यक है। मुद्दों पर बहुमत का नजरिया जानने की जनता की मूल लोकतांत्रिक इच्छा को संतुष्ट करने का यही एकमात्र रास्ता है। इससे लोग चुनावी व विधायी निर्णयों को ज्यादा स्वीकृति देते हैं, और एक निर्णायक व सहभागी लोकतंत्र का निर्माण होता है। दो अतिवादी विचारों के सामने आने से मध्यमार्गी नीतियां बनाने की राह भी खुलती है, जिन्हें और भी ज्यादा व्यापक आम सहमति मिल सकती है। दो पार्टियों पर आधारित व्यवस्था सरकारों को भी अधिक उत्तरदायी बनाती है, क्योंकि सत्तापक्ष या विपक्ष के पास बहानेबाजी का कोई तरीका नहीं बचता। और सबसे बढ़कर, द्वि-दलीय व्यवस्था पार्टियों में सत्ता झपटने के लिए होने वाले सियासी खेल खत्म कर देती है। वैसे भी, द्वि-दलीय व्यवस्था का विकल्प ही क्या है? एक पार्टी पर आधारित प्रणाली लोकतंत्र नहीं है। और बहु-दलीय व्यवस्था बहुत फिसलन भरी डगर है, जिसके विषय में हम पहले ही बात कर चुके हैं।

हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि द्वि-दलीय व्यवस्था थोप देनी चाहिए। ऐसा फरमान लोकतांत्रिक सिद्धांतों के विपरीत होगा, और इसे व्यवहारिक रूप से लागू भी नहीं करवाया जा सकता। इसलिए आदर्श स्थिति एक ऐसी प्रणाली अपनाना है, जिसका रूझान दो पार्टियां लाने की ओर हो, परंतु जो दो से अधिक दलों के होने पर भी कारगर हो।

भारत की मौजूदा शासन प्रणाली को प्रभावपूर्वक कार्य करने के लिए दो, और मात्र दो ही पार्टियों की आवश्यकता है। जबकि विडंबना यह कि यही प्रणाली पार्टियों के विखंडन और गुणन को बढ़ावा देती है। भारत का विशिष्ट संघीय ढांचा राज्यों में अधिक से अधिक पार्टियों के निर्माण की प्रेरणा देता है। परिणामस्वरूप आज देश में 1800 से अधिक रजिस्टर्ड पार्टियां हैं।

भारतीय संसदीय प्रणाली केवल दो पार्टियों के साथ ही सही रूप से कार्य कर सकती है, इसका उल्लेख वाल्टर बैगेहोट की 1867 की बुनियादी कृति ‘दि इंग्लिश कांस्टीट्यूशन’ से मिलता है। उन्होंने व्याख्या की कि ‘‘संसदीय प्रणाली की निर्धारक विशेषता विधायिका द्वारा कार्यकारी शासक को चुना जाना है, परंतु जब तीन पार्टियां होती हैं तो संतोषजक चुनाव होना असंभव है।’’ यानी, जब दो से अधिक पार्टियां हों तो शासन प्रभावित होता है। हम सब जानते हैं कि गठबंधन कैसे प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री, और उनके कैबिनेट सदस्यों संबंधी चयन को प्रभावित करते हैं।

विडंबना है कि संसदीय प्रणाली की इसी मूल विशेषता से कि शक्ति पार्टियों को सौंपी जाती है, व्यक्तिगत रूप से जनता के प्रतिनिधियों को नहीं, नई पार्टियां बनाने को बढ़ावा मिलता है। संसद में प्रभाव पाने के लिए हर नेता अपना अलग संगठन बनाना चाहता है। इससे विखंडन की एक अंतहीन प्रक्रिया आरंभ हो जाती है। नेता अपनी पार्टियों को जागीर की तरह चलाते हैं, क्योंकि वे विनियमित नहीं होतीं, और नेता पार्टी प्रत्याशियों का चयन मनमर्जी से करते हैं। जो पार्टी बॉस द्वारा नहीं चुने जाते वे अपनी अलग पार्टी बना लेते हैं।

इसके अतिरिक्त भारत की एक अन्य ढांचागत समस्या भी है कि जनसंख्या के अनुरूप प्रतिनिधियों की संख्या कम है। एक भारतीय सांसद लगभग 22 लाख लोगों का प्रतिनिधित्व करता है, जबकि अमरीकी हाउस में यह आंकड़ा सात लाख है। इसलिए जो चुनाव लड़ना चाहते हैं पर मौजूदा पार्टियों द्वारा नहीं चुने जाते, वे अलग पार्टियां बना अपना प्रबंध स्वयं करने पर उतारू हो जाते हैं।

विखंडन पैदा करने वाला सबसे बुरा संरचनात्मक कारक चुनाव क्षेत्रों का छोटा होना है। प्रत्याशियों को राज्य स्तरीय या राष्ट्र स्तरीय चुनाव जीतने के बजाय मात्र विधानसभा या लोकसभा की सीट जीतनी होती है। छोटे चुनाव क्षेत्रों के कारण कुछ वोट खरीदकर या जाति अथवा धर्म के आधार पर एक समूह की भावनाएं भड़का कर चुनाव जीतना संभव होता है। इससे व्यक्तियों के लिए नई पार्टियां बनाना और वोट-बैंक को प्रभावित करने का प्रयास आसान हो जाता है।

वर्ष 1971 में राष्ट्रीय व राज्यों के चुनाव अलग करने से भी पार्टियों के बंटवारे को बड़ा बढ़ावा मिला। एक स्थानीय मसले के समर्थक या एक सीमित जाति के लोग एक छुटपुटिया नेता को सत्ता में ला सकते हैं। एक बार ऐसी पार्टी को राज्य चुनावों में थोड़ा भी बढ़ावा मिल जाए, तो वह कुछ संसदीय सीटें जीतने का भी प्रयास करती है। भारत में कुकरमुत्तों की तरह कई पार्टियां पैदा होने का यह भी बहुत बड़ा कारण है।

डूवर्गर का सिद्धांत ‘मृत तोता’ नहीं

सच्चाई यह है कि सभी संसदीय प्रणाली पर चल रहे देशों में झुकाव राजनीतिक दलों के विखंडन की ओर होता है। लंदन स्कूल ऑफ इकॉनोमिक्स के एक ताजा अध्ययन का निष्कर्ष है कि ‘‘ब्रिटिश प्रणाली अपनाने वाले सभी प्रमुख देशों ने बहु-दलीय व्यवस्था के प्रति तीव्र झुकाव दिखाया है।’’ संस्थान के शोधकर्ताओं ने कई लोकतंत्रों में डूवर्गर के सिद्धांत की असफलता का अध्ययन किया। फ्रांसीसी राजनीतिक विज्ञानी मॉरिस डूवर्गर ने 1951 में अभिधारणा प्रस्तुत की थी कि ‘‘सामान्य-बहुमत एकल-मतदान वाली प्रणाली (First past the post-FPTP) द्वि-दलीय व्यवस्था को स्थापित करती है।’’ क्योंकि भारत, ब्रिटेन और अमरीका में सबसे ज्यादा वोट पाने वाला विजेता होता है यानि एक चुनाव क्षेत्र से केवल एक प्रतिनिधि निर्वाचित होता है, इन सभी देशों में मात्र दो ही पार्टियां होनी चाहिए। परंतु अध्ययन में पाया गया कि यह सिद्धांत ब्रिटेन व भारत में असफल रहा है। मुख्य शोधकर्ता पैट्रिक डनलेवी ने निष्कर्ष निकाला कि ‘‘अमरीका से बाहर स्नक्कञ्जक्क प्रणाली की प्रवृत्ति द्वि-दलीय राजनीति पैदा करने में हरगिज कामयाब नहीं।’’ उन्हांेने सिद्धांत को ‘‘एक मृत तोता’’ करार दिया।

परंतु डूवर्गर का सिद्धांत खत्म नहीं हुआ है। यह भारत पर लागू होता है। सिर्फ अंतर यह है कि यह भारत के हर चुनाव पर अलग-अलग लागू होता है। हर चुनाव में मात्र दो ही पार्टियों के उम्मीदवारों के जीतने की वास्तविक संभावना होती है। परंतु क्योंकि भारत में विधायक व सांसद चुनने के लिए केवल छोटे-छोटे चुनाव क्षेत्र हैं, इसलिए दो पार्टियां केवल उन्हीं चुनावों में उभरती हैं, राष्ट्रीय स्तर पर नहीं। राजनीतिक विज्ञानी योगेंद्र यादव भी वर्ष 1999 में इसी निष्कर्ष पर पहुंचे थे। उन्होंने लिखा, ‘‘डूवर्गर का सिद्धांत भारत में भी प्रभावी है, सिवाय इसके कि यह राज्य स्तर पर काम करता है।’’

इस सबका अर्थ है कि अगर भारत दो पार्टियों पर आधारित व्यवस्था अपनाना चाहता है, तो कम से कम एक चुनाव राष्ट्रव्यापी होना चाहिए। यह राष्ट्रीय स्तर पर होने वाला अमरीकी राष्ट्रपति का चुनाव है, जो विभिन्न पार्टियों को एक साथ मध्यमार्गी मंचों पर आने को मजबूर करता है, ताकि दो पार्टियां उभर सकें। ऐसा नहीं है कि अमरीका में अन्य पार्टियां न हों, परंतु देश हमेशा दो सबसे बड़ी पार्टियों के पीछे संगठित होता है।

भारत ने भी द्वि-दलीय व्यवस्था का लाभ देखा है। दो बृहद बहु-पार्टी गठबंधनों — एनडीए और यूपीए — ने देश को अस्थिरता के अंतरालों से बहुत आवश्यक विराम दिलवाया है। परंतु ये गठबंधन केवल राजनीतिक मौकापरस्ती ही दर्शाते हैं। इसीलिए राष्ट्रपति अब्दुल कलाम ने वर्ष 2007 में देश से ‘‘शीघ्र एक स्थायी, द्वि-दलीय प्रणाली के तौर पर’’ उभरने की याचना की थी। आइए पूर्व राष्ट्रपति कलाम का सपना पूरा करें, और स्वयं को वोट-बैंक की राजनीति से मुक्त करें।

साभार – दि ट्रिब्यून

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