भानु धमीजा की ‘राष्ट्रपति प्रणाली’ ने छेड़ी बहस

नई दिल्ली— लेखक, चिंतक एवं विचारक भानु धमीजा की नई पुस्तक ‘भारत में राष्ट्रपति प्रणाली-कितनी जरूरी, कितनी बेहतर’ से देश में व्यवस्था परिवर्तन को बहस छिड़ गई है। पूर्व केंद्रीय मंत्री एवं लोकसभा सांसद शांता कुमार

Apr 30th, 2017 12:05 am

नई दिल्ली में पुस्तक के लोकार्पण पर विद्वानों ने व्यवस्था बदलने के लिए उठाई आवाज

NEWSनई दिल्ली— लेखक, चिंतक एवं विचारक भानु धमीजा की नई पुस्तक ‘भारत में राष्ट्रपति प्रणाली-कितनी जरूरी, कितनी बेहतर’ से देश में व्यवस्था परिवर्तन को बहस छिड़ गई है। पूर्व केंद्रीय मंत्री एवं लोकसभा सांसद शांता कुमार ने इच्छा जताई है कि देश में प्रणाली बदलाव के मद्देनजर एक आयोग गठित किया जाए, उसमें विद्वान और विशेषज्ञ विमर्श करेंगे कि भारत के लिए कौन सी शासन प्रणाली उचित होगी। वहीं, दूसरी ओर सांसद व पूर्व मंत्री डा. शशि थरूर ने राष्ट्रपति प्रणाली के बहाने प्रधानमंत्री पर सीधा हमला किया है। उधर, संविधान विशेषज्ञ एवं लोकसभा के पूर्व महासचिव डा. सुभाष कश्यप ने कहा है कि भारत में न तो संसदीय और न ही राष्ट्रपति प्रणाली है। इस तरह एक किताब के जरिए ऐतिहासिक और गर्मा गर्म बहस छिड़ गई है। लेखक, चिंतक एवं विचारक एवं ‘दिव्य हिमाचल’ मीडिया गु्रप के सीएमडी भानु धमीजा की पुस्तक ‘भारत में राष्ट्रपति प्रणालीः कितनी जरूरी, कितनी बेहतर’ का शुक्रवार को नई दिल्ली में लोकार्पण हुआ। इस समारोह की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ नेता व सांसद शांता कुमार ने संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट का जिक्र किया और कहा कि देश में 60 करोड़ लोग ऐसे हैं, जिनकी मासिक आय 1000 रुपए या उससे कम है। दुनिया में सबसे अधिक भूखे, निर्धन और कुपोषित लोग भारत में हैं। झोपड़ी का दर्द व्यवस्था की प्रणाली ने महसूस करने की कोशिश नहीं की है तो क्या ऐसी प्रणाली बदलनी नहीं चाहिए। मौजूदा प्रणाली विफल और ठीक नहीं है। इसके मद्देनजर एक आयोग का गठन किया जाएं, उसमें विद्वान और विशेषज्ञ रहें, जो विमर्श करें कि भारत के लिए कौन सी प्रणाली अनुकूल और उचित रहेगी। शांता कुमार ने कुछ सवाल भी उठाए कि हमने संविधान बनाया, आजादी ली, लेकिन मौजूदा प्रणाली में 70 साल बाद भी हम कहां खड़े हैं? हम कहां तक पहुंचे हैं? रोजगार नहीं दे पा रहे हैं, तो एक बूढ़ा बाप कहता है कि ‘आप मुझे गोली तो मार सकते हो’। क्या अब यह प्रणाली बदलनी नहीं चाहिए? यह व्यवस्था उच्छृंखल है। लोकतंत्र चुनाव तंत्र बन गया है। गरीबी दूर करने की कोई कोशिश नहीं कि गई, लेकिन यह देश हर समय चुनाव के मूड में रहता है। पूर्व केंद्रीय राज्य मंत्री एवं लोकसभा सांसद डा. शशि थरूर बीते 30 सालों से राष्ट्रपति प्रणाली पर अभियान के तौर पर सक्रिय हैं। उन्होंने लोकसभा में इस मुद्दे पर एक निजी बिल भी पेश किया हुआ है। इस मुद्दे पर उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी पर सीधे हमले किए कि जिस तरह एक ही व्यक्ति फैसले ले रहा है, उन्हें लागू करवा रहा है, मंत्रियों को कुछ भी जानकारी नहीं है, लिहाजा हम परोक्ष रूप से राष्ट्रपति प्रणाली में ही रह रहे हैं। यह संकेत खतरनाक है। डा. थरूर का मानना है कि भारत में विकेंद्रीकरण के लिए राज्य सरकारों और स्थानीय निकायों पर भी राष्ट्रपति प्रणाली व्यवस्था लागू की जानी चाहिए। मसलन-जिला परिषद अध्यक्ष और नगरपालिकाओं में मेयर के चुनाव प्रत्यक्ष तौर पर होने चाहिए। डा. थरूर का यह भी कहना था कि प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था कि राज्यों और नगर निगमों के चुनावों में उतरना भी एक तमाशा बन गया है, लेकिन पीएम मोदी को अपनी ताकत के मद्देनजर यह करना पड़ रहा है। डा. थरूर का मानना है कि संसद में प्रधानमंत्री मोदी के पक्ष में इतनी ताकत है कि वह मौजूदा व्यवस्था को बदल सकते हैं। संविधान विशेषज्ञ एवं लोकसभा के पूर्व महासचिव सुभाष कश्यप का मानना है कि भारत में न तो संसदीय और न ही राष्ट्रपति प्रणाली है। प्रणाली बदलने से ही तमाम समस्याएं सुलझ जाएंगी, ऐसा संभव नहीं है। हमें शिक्षा, राजनीतिक, आर्थिक और निर्वाचन व्यवस्था में अनिवार्य सुधार करने होंगे। राजनीतिक दलों के लिए कानून भी बनाने होंगे, लेकिन किसी भी बदलाव लाने में दलों की दिलचस्पी नहीं है। गौरतलब है कि डा. कश्यप ने 1967 में राष्ट्रपति प्रणाली पर एक लेख लिखा था। उन्होंने अमरीकी व्यवस्था को पढ़ा और समझा। राष्ट्रपति प्रणाली के लिए कम से कम 12 तत्त्व अनिवार्य हैं, लेकिन भारत में एक भी नहीं है। उन्होंने ब्रिटेन की संसदीय प्रणाली का भी उल्लेख किया है, लेकिन भारत के संदर्भ में उनका मानना है कि इस मुद्दे पर राष्ट्रहित में एक अभियान चलाने की कोशिश की जानी चाहिए। पुस्तक के लेखक भानु धमीजा ने अपने लेखकीय वक्तव्य में स्पष्ट किया कि संविधान सभा के दौरान संसदीय और राष्ट्रपति प्रणाली को लेकर कितने विरोधाभास थे। उन्होंने पंडित नेहरू, पटेल, अंबेडकर, पंत, केएम मुंशी, श्यामा प्रसाद मुखर्जी, कृपलानी व जगजीवन राम आदि की सोच का भी उल्लेख किया। उन्होंने पुस्तक प्रकाशन के लिए प्रभात प्रकाशन का आभार व्यक्त किया और बार-बार यह इच्छा जताई कि शासन व्यवस्था प्रणाली बदलने से और भारत में राष्ट्रपति प्रणाली के प्रयोग से कई बुनियादी समस्याएं दूर की जा सकती हैं। इनमें भ्रष्टाचार भी एक है।

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