राष्ट्रपति प्रणाली के पक्ष में खुलकर उतरे थरूर प्रशंसा के पात्र

भानु धमीजा

सीएमडी, ‘दिव्य हिमाचल’ लेखक, चर्चित किताब ‘व्हाई इंडिया नीड्ज दि प्रेजिडेंशियल सिस्टम’ के रचनाकार हैं

वर्ष 1963 में निष्ठावान कांग्रेसी और संविधान सभा के सदस्य केएम मुंशी ने लिखा कि ‘‘अगर मैं फिर से चुन पाऊं तो मैं राष्ट्रपति प्रणाली के पक्ष में वोट दूंगा।’’ पूर्व राष्ट्रपति आर वेंकटरमण ने 1965 में लिखा, ‘‘राष्ट्रपति प्रणाली बेहतरीन हल प्रस्तुत करती है।’’ वसंत साठे ने वर्षों प्रयास किया कि इंदिरा गांधी वह प्रणाली अपना लें। बाबूभाई पटेल, चिमनभाई मेहता और बीके नेहरू आदि कुछ और कांग्रेसजन हैं जो ध्यान में आते हैं। डा. थरूर की राष्ट्रपति प्रणाली की वकालत सच्चे अर्थों में अपने देश, और अपनी पार्टी, की सेवा है। हमें उनकी इस देशभक्ति की सराहना करनी चाहिए और उनकी मदद को जो कुछ हमारे वश में हो वह करना चाहिए…

आम राह चलता आदमी भी आपको बता देगा कि भारत की राजनीतिक व्यवस्था बहुत खराब है। यहां तक कि राहुल गांधी तो इसे ‘‘सड़ी हुई’’ तक कह चुके हैं। फिर भी लगभग सभी भारतीय राजनेता और विचारक हमारी व्यवस्था के मूलभूत विकारों से अनजान हैं, किसी विकल्प के बारे में जानकारी की तो बात ही छोडि़ए। डा. शशि थरूर, तिरुवनंतपुरम से लोकसभा सांसद, एक ऐसे प्रमुख राजनीतिज्ञ हैं जिन्होंने इस मसले पर गंभीर चिंतन किया है। वह भारत की मौजूदा संसदीय शासन व्यवस्था के स्थान पर राष्ट्रपति प्रणाली अपनाने के पक्ष में खुलकर सामने आए हैं। थरूर अब इस मुद्दे पर राष्ट्रीय बहस शुरू करने पर कार्य कर रहे हैं, जो हमारे देश के भविष्य के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण है। इसके लिए थरूर हमारी प्रशंसा और समर्थन के पात्र हैं। इस बहस को पार्टीबाजी में नहीं फंसने देना चाहिए। भारत के लोकतंत्र से अधिक महत्त्वपूर्ण और कुछ भी नहीं है। इसका स्वास्थ्य, प्रदर्शन और भविष्य समूची राजनीति से ऊपर होना चाहिए। कमजोर शासन प्रणाली वाला कोई भी देश उभर नहीं सकता। भारत को एक महान राष्ट्र के रूप में उचित स्थान पर पहुंचाने के लिए हमें अपनी प्रणाली की मूलभूत कमजोरियों पर बहुत सावधानी से विचार करना चाहिए और उन्हें समय रहते दूर कर लेना चाहिए। यह मानना कि एक राजनेता राष्ट्रपति प्रणाली के पक्ष में केवल स्वयं या अपनी पार्टी के लाभ के लिए ही बोलता है, तो यह उस प्रणाली के बारे में समझ की कमी है। राष्ट्रपति बनना अत्यधिक कठिन है, क्योंकि इसकेलिए व्यक्ति को संपूर्ण देश से जीत कर आना होता है। दूसरा, उस प्रणाली में शक्ति हड़पना भी आसान नहीं है। दरअसल, भारत की मौजूदा व्यवस्था इसके लिए अधिक अनुकूल है।

अगर भारत राष्ट्रपति प्रणाली अपनाए तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सबसे अधिक लाभ मिलेगा। वह देश में सर्वाधिक लोकप्रिय राजनेता हैं। परंतु जैसा मैंने अपनी किताब ‘व्हाई इंडिया नीड्स दि प्रेजिडेंशियल सिस्टम’ में 2015 में लिखा जब मोदी सत्ता में आए ही थे कि वे शायद उस प्रणाली को छुएं भी नहीं। कारण दो हैं ः पहला, मौजूदा संसदीय प्रणाली केंद्रीकृत नियंत्रण के लिए अधिक अनुकूल है। और दूसरा, अगर वह भारत के संविधान में बड़े पैमाने पर बदलाव करने की ओर बढ़े तो जनता का समर्थन खो बैठेंगे। परंतु यह पहला कारण है जिसके चलते मैं समझता हूं कि वह अपने अगले कार्यकाल में भी राष्ट्रपति प्रणाली के पक्ष में नहीं होंगे। यही कारण था कि आपातकाल के दौरान इंदिरा गांधी ने भी राष्ट्रपति प्रणाली न अपनाने का निर्णय लिया था। स्वर्ण सिंह और एआर अंतुले आदि अंदर के आदमियों ने उन्हें ऐसा कदम न उठाने की सलाह दी, क्योंकि राष्ट्रपति प्रणाली से असल में उनका निरंकुश शासन करना मुश्किल हो जाता। वर्ष 1994 में अंतुले ने स्वीकार किया, ‘‘इंदिरा गांधी तानाशाह बनना चाहती थीं… परंतु राष्ट्रपति प्रणाली में आप तानाशाह नहीं बन सकते।’’ फिर भी कई भारतीय अभी भी यह मानते हैं कि राष्ट्रपति प्रणाली एकल व्यक्ति का शासन है। और यह शर्मनाक है कि हमारे कई अग्रणी विचारक यह गलतफहमी फैलाना जारी रखे हुए हैं। सच्चाई इससे एकदम उलट है। यह संसदीय प्रणाली है जिसे केंद्रीकृत एकात्मक नियंत्रण के लिए ईजाद किया गया था। अमरीका द्वारा राष्ट्रपति प्रणाली के आविष्कार का मुख्य कारण एक वास्तविक संघीय ढांचे में शक्तियों को सरकारों के बीच बांटना और हस्तांतरित करना था। उस देश का 230 वर्षों का इतिहास दिखाता है कि संसदीय प्रणाली के बजाय राष्ट्रपति प्रणाली की सरकार तानाशाह रवैये से कहीं अधिक सुरक्षा उपलब्ध करवाती है। थरूर ने राष्ट्रपति प्रणाली की वकालत सोच-समझ कर की है। अपनी पुस्तक ‘इंडिया : फ्रॉम मिडनाइट टू दि मिलेनियम’ से शुरुआत कर उन्होंने इस विषय पर दो दशक तक बड़े पैमाने पर लिखा है। अपनी ताजा बेस्टसेलर पुस्तक ‘ऐन इरा ऑफ डार्कनेस’ में थरूर इस दावे की धज्जियां उड़ाते हैं कि संसदीय प्रणाली भारतीय लोकतंत्र के लिए एक लाभदायक ब्रिटिश उपहार रही है। ‘‘ब्रिटेन में तैयार संसदीय प्रणाली,’’ उन्होंने लिखा, ‘‘कई ऐसी परिस्थितियों की मांग रखती है जो भारत में मौजूद ही नहीं हैं।’’

हालिया राज्य चुनावों के दौरान एक समाचारपत्र में थरूर ने लिखा, ‘‘अगर भारत में राष्ट्रपति प्रणाली के लिए एक और जोरदार तर्क की आवश्यकता थी, तो हर कुछ माह बाद भारत सरकार प्रमुख द्वारा अपने पद के उत्तरदायित्व को छोड़कर अपनी पार्टी के लिए मैदान में उतरने का नजारा देखिए।’’ इससे पूर्व उन्होंने इसी वर्ष जयपुर में ‘दि केस फॉर दि प्रेजिडेंशियल सिस्टम’ शीर्षक से एक प्रेरक व्याख्यान दिया। थरूर ने स्पष्ट कहा कि ‘‘एक कार्यशील लोकतंत्र सुनिश्चित करने का सबसे अच्छा रास्ता राष्ट्रपति प्रणाली अपनाना है।’’ थरूर उन भारतीय विचारकों की लंबी सूची में सम्मिलित हो गए हैं जो राष्ट्रपति प्रणाली के पक्ष में बोले हैं। भीमराव अंबेडकर अमरीका की कार्यपालिका को आदर्श मानकर ‘संयुक्त राज्य भारत’ का प्रस्ताव लाने वाले पहले व्यक्ति थे। ‘‘संसदीय प्रणाली भारत में काम नहीं कर पाएगी,’’ उन्होंने लिखा था। संवैधानिक विद्वान नानी पालकीवाला ने 1981 में लिखा कि ‘‘राष्ट्रपति प्रणाली के कहीं अधिक लाभ हैं जिन्हें इसके विरोधी स्वीकार नहीं करते हैं।’’ वर्ष 1983 में एक भाषण के दौरान जेआरडी टाटा ने कहा, ‘‘मैं कई वर्षों से राष्ट्रपति प्रणाली अपनाने की वकालत करता रहा हूं।’’ प्रधानमंत्री वाजपेयी ने 1998 में कहा कि ‘‘हमें राष्ट्रपति प्रणाली के गुणों पर चर्चा करनी चाहिए। हाल ही में, वर्ष 2013 में भाजपा के तत्कालीन महासचिव राजीव प्रताप रूडी ने राष्ट्रपति प्रणाली के कई फीचर्स अपनाने का सुझाव देते हुए राज्यसभा में एक प्रस्ताव प्रस्तुत किया था। वर्ष 2015 में मेरी पुस्तक के लांचिंग अवसर पर भाजपा मार्गदर्शक मंडल के सदस्य शांता कुमार ने स्पष्ट कहा: ‘‘अब देश में राष्ट्रपति प्रणाली होनी चाहिए।’’ एक ताजा लेख में थरूर की आलोचना की गई कि वह पार्टी विचारधारा के खिलाफ बोल रहे हैं। किसी पार्टी पदाधिकारी का हवाला दिए बिना लेखक ने दावा किया कि राष्ट्रपति प्रणाली अपनाना कांग्रेस पार्टी की नीति नहीं।

लेख में यह कहने की कोशिश की गई कि राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी अभी भी कांग्रेस के वक्ता हैं। और उनकी हालिया टिप्पणी, कि ‘‘भारत जैसे जटिल और विविध देश को केवल शक्तियों के विकेंद्रीकरण द्वारा ही शासित किया जा सकता है,’’ यह दिखाती है कि मुखर्जी राष्ट्रपति प्रणाली के विरुद्ध हैं। लेखक यह समझने में नाकाम रहा है कि अगर भारत को सबसे अधिक आवश्यकता शक्तियों के विकेंद्रीकरण की है, तो स्वतंत्र राज्य सरकारों वाला अमरीकी मॉडल विश्व की सर्वाधिक विकेंद्रीकृत व्यवस्था है।’’ मैं कुछ कांग्रेसजनों का उल्लेख करना चाहूंगा जो राष्ट्रपति प्रणाली के फीचर्स के पक्ष में रहे हैं। वल्लभभाई पटेल, नेहरू से भारतीय संविधान में प्रत्यक्ष निर्वाचित कार्यकारी – राष्ट्रपति और गवर्नर – की व्यवस्था लाने को खूब भिड़ते रहे। वर्ष 1963 में निष्ठावान कांग्रेसी और संविधान सभा के सदस्य केएम मुंशी ने लिखा कि ‘‘अगर मैं फिर से चुन पाऊं तो मैं राष्ट्रपति प्रणाली के पक्ष में वोट दूंगा।’’ पूर्व राष्ट्रपति आर वेंकटरमण ने 1965 में लिखा, ‘‘राष्ट्रपति प्रणाली बेहतरीन हल प्रस्तुत करती है।’’ वसंत साठे ने वर्षों प्रयास किया कि इंदिरा गांधी वह प्रणाली अपना लें। बाबूभाई पटेल, चिमनभाई मेहता और बीके नेहरू आदि कुछ और कांग्रेसजन हैं जो ध्यान में आते हैं। डा. थरूर की राष्ट्रपति प्रणाली की वकालत सच्चे अर्थों में अपने देश, और अपनी पार्टी, की सेवा है। हमें उनकी इस देशभक्ति की सराहना करनी चाहिए और उनकी मदद को जो कुछ हमारे वश में हो वह करना चाहिए।

साभार : हफिंग्टन पोस्ट/टाइम्स ऑफ इंडिया

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