चंडीगढ़ में राष्ट्रपति प्रणाली की धमक

लेखक भानु धमीजा की बहुचर्चित हिंदी पुस्तक पर पंजाब यूनिवर्सिटी  में मंथन, पंचनद गोष्ठी में उमड़े बुद्धिजीवी

newsnewsचंडीगढ़ —  चंडीगढ़ स्थित पंजाब यूनिवर्सिटी में रविवार को ‘भारत में राष्ट्रपति प्रणालीः कितनी जरूरी, कितनी बेहतर’ की गूंज सुनाई दी। बुद्धिजीवियों के एक समूह पंचनद शोध संस्थान की ओर से आयोजित गोष्ठी में लेखक भानु धमीजा की पुस्तक ‘भारत में राष्ट्रपति प्रणालीः कितनी जरूरी, कितनी बेहतर’ पर चर्चा की गई। इस अवसर पर ट्राइसिटी चंडीगढ़-पंचकूला व मोहाली के बुद्धिजीवी बड़ी संख्या में उपस्थित रहे। कार्यक्रम में मौजूद भानु धमीजा ने कहा कि किसी भी देश की शासन प्रणाली समाज के विकास और निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यदि शासन प्रणाली में जनता की भागीदारी हो और लोगों को उस पर विश्वास हो तो यह भ्रष्टाचार पर अंकुश का बड़ा साधन बनता है। उन्होंने कहा कि शासन व्यवस्था एक ऐसा मुद्दा है जो हर नागरिक को हर रोज प्रभावित करता है और इस पर खुली बहस की आवश्यकता है। हम एक जीवंत समाज का भाग हैं, जो संविधान का सम्मान तो करते हैं, पर उसे कुछ ऐसा विधान नहीं मानते, जिसमें संशोधन, परिवर्तन या सुधार की गुंजाइश हो। जीवंत समाज समय की मांग के अनुसार स्वयं को ढालता है और उसके लिए आवश्यक संसाधन जुटाता है। संविधान की भूमिका एक ऐसे संसाधन या उपकरण जैसी है, जो समाज को सामर्थ्यवान बनाता है। श्री धमीजा ने कहा कि अमरीकी संविधान की सबसे बड़ी खासियत सरकार के सभी अंगों की शक्तियों का पृथक्करण है। अमरीकी कांग्रेस अपना काम करती है, राष्ट्रपति अपना काम करते हैं और न्यायपालिका अपना काम करती है। कोई किसी पर निर्भर नहीं है, लेकिन सरकार का हर अंग अन्य दोनों अंगों की निगरानी करता है और उस पर सीमित नियंत्रण भी रखता है। शक्तियों के संतुलन के इस शानदार समीकरण के कारण ही अमरीकी समाज उन्नति कर रहा है, जबकि गलत शासन व्यवस्था के कारण भारतीय समाज में पतनकारी और विघटनकारी शक्तियां सक्रिय हैं। उन्होंने कहा कि अमरीका के 230 साल के इतिहास में एक भी अमरीकी राष्ट्रपति तानाशाह नहीं बन पाया, जबकि भारतीय संविधान के लागू होने के 25 साल के भीतर ही इसका अंगभंग हो गया। जो संविधान खुद को ही न बचा सका, वह देश को क्या बचाएगा। उन्होंने इस धारणा का विरोध किया कि गरीबी अथवा अशिक्षा के कारण भारतीय समाज एक बेहतर संविधान के योग्य नहीं है। उन्होंने कहा कि यह भारतीय समाज ही था, जिसने आपातकाल के बाद पहले ही चुनाव में इंदिरा गांधी को सत्ता से हटाकर अपने विवेक का परिचय दिया था। उन्होंने जोर देकर कहा कि सांसदों एवं विधायकों को अपनी इच्छा से मतदान का अधिकार नहीं है। यह न केवल अनैतिक, बल्कि पूरी तरह से अवैध एक परंपरा को कानूनी मान्यता दे दी गई है। यह लोकतंत्र के लिए खतरनाक है कि हमारे प्रतिनिधि अपनी मर्जी से वोट नहीं दे सकते और उन्हें पार्टी ह्विप का पालन करना पड़ता है। संसदीय प्रणाली को अकसर इसलिए बढि़या माना जाता है, क्योंकि इसमें सरकार तेजी से काम कर सकती है और चूंकि यह संसद के प्रति जवाबदेह है, इसलिए यह ज्यादा उत्तरदायी है। दूसरी ओर, अमरीकी शासन प्रणाली में यह खासियत है कि वहां सरकार मनमानी नहीं कर सकती और उसे कदम-कदम पर संसद की सहमति लेनी होती है, जिससे गलतियों से बचना संभव हो पाता है। इस अवसर पर भानु धमीजा, जो ‘दिव्य हिमाचल मीडिया ग्रुप’ के संस्थापक अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक भी हैं, ने उत्सुक श्रोताओं के सभी प्रश्नों के खुलकर उत्तर दिए और संवेदनशील प्रश्नों पर भी सलीके से अपना मत प्रकट किया। अंत में पंचनद स्टडी सेंटर के चंडीगढ़ चैप्टर के अध्यक्ष  राकेश शर्मा व सचिव अमरनाथ वशिष्ठ ने भानु धमीजा और श्रोताओं का धन्यवाद किया। इस मौके पर पंचनद के केंद्रीय कार्यकारी अध्यक्ष कृष्ण चंद आर्य, उपाध्यक्ष अशोक मलिक, सीनियर जर्नलिस्ट सौरभ मलिक व पीआईबी से सेवानिवृत्त चमन लाल समेत कई अन्य बुद्धिजीवी भी उपस्थित रहे।

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