नीतीश फिर एनडीए मुख्यमंत्री!

By: Jul 28th, 2017 12:02 am

अंततः बिहार में नीतीश कुमार ‘लालूमुक्त’ होने में कामयाब रहे। मुख्यमंत्री पद से उनके अचानक इस्तीफे ने बिहार का राजनीतिक परिदृश्य ही बदल दिया। जब मुख्यमंत्री नहीं रहे, तो कैबिनेट भी भंग हो गई, लिहाजा सरकार ध्वस्त हुई और अंततः 20 माह पुराना महागठबंधन भी टूट गया, लेकिन सरकार गिरने के कुछ ही घंटों के बाद नीतीश कुमार की नए सिरे से ताजपोशी भी तय हो गई। भाजपा के साथ पुराना गठबंधन था, जो अब नए रूप में सामने आएगा। जब आप यह संपादकीय पढ़ रहे होंगे, तब तक नीतीश एक बार फिर एनडीए सरकार के मुख्यमंत्री बन चुके होंगे। लालू और उनके दोनों भ्रष्ट छोकरों समेत पूरा राजद जमीन पर धड़ाम से गिरा है। राजद को अब बिखराव से बचना है। हालांकि लालू यादव ने असहाय होने के बजाय आक्रामक रुख अख्तियार किया है और 1991 का हत्या और आर्म्स एक्ट का एक केस सार्वजनिक किया है, क्योंकि नीतीश कुमार अपने चुनावी हलफनामे में इस केस का उल्लेख कर चुके हैं, लिहाजा केस तो पहले से ही सार्वजनिक था। अब अदालत ने उसका संज्ञान लिया है या नहीं, आरोप तय किए गए हैं या नहीं, मौजूदा स्थिति क्या है? ये तमाम बिलकुल अलग मुद्दे हैं। यदि धारा 302, 307 के तहत नीतीश दोषी करार दिए जाते हैं, तो वह सजायाफ्ता होंगे। फिर मुख्यमंत्री बनने या न बने रहने की नैतिकता और संवैधानिक स्थिति भी भिन्न होगी। फिलहाल मुद्दा महागठबंधन टूटने और बिहार की सत्ता में भाजपा की वापसी और विपक्षी एकता को पलीता लगने का है। भाजपा ने रात भर भी प्रतीक्षा नहीं की। पासे बदले, कमेटी बनाई, कमेटी के नेताओं ने नीतीश कुमार से बात की और भाजपा के राष्ट्रीय नेतृत्व ने घोषणा कर दी कि भाजपा सरकार बनाने में जदयू का समर्थन करेगी और पार्टी साझा सरकार में शामिल भी होगी। देर रात समर्थन पत्र राज्यपाल केसरीनाथ त्रिपाठी को सौंपने का काम भी कर दिया गया। नतीजतन नीतीश और नरेंद्र मोदी के ‘सांप्रदायिक’ मतभेद, प्रधानमंत्री मोदी द्वारा नीतीश के डीएनए पर की गई टिप्पणी आदि सभी मुद्दे नेपथ्य में फेंक दिए गए। अब जदयू के राष्ट्रीय प्रवक्ता डा. अजय आलोक सार्वजनिक बयान दे रहे हैं कि पीएम मोदी अपने तीन साल के कार्यकाल में ‘सांप्रदायिक’ नहीं हुए। भाजपा के साथ पहले गठबंधन 17 साल तक चला, अब 170 सालों तक साथ बना रहेगा, सभी ऐसी दुआ करते हैं। यह है हमारी राजनीति का यथार्थ…। सवाल है कि बिहार के महागठबंधन का ‘खलनायक’ कौन था और यह किसके कारण बिखर गया? राज्यपाल को इस्तीफा सौंपने के बाद नीतीश ने खुलासा किया कि उन्होंने महागठबंधन का एक तिहाई रास्ता तो गवर्नेंस के साथ पूरा किया। शराबबंदी सफल साबित हुई। बुनियादी ढांचे और सामाजिक परिवर्तन, विकास के काम अच्छी तरह निपटाए गए। योजनाओं के काम कैसे चल रहे हैं, इसका जिलेवार मूल्यांकन किया जाता रहा। उन्होंने हर कदम पर गठबंधन का धर्म निभाया। उन्होंने उपमुख्यमंत्री पद से तेजस्वी यादव का कभी भी इस्तीफा नहीं मांगा, लेकिन यह अपेक्षा लगातार बनी रही कि तेजस्वी अपने ऊपर लगे गंभीर आरोपों की सार्वजनिक तौर पर सफाई जरूर दें। सरकार में बैठे एक व्यक्ति के खिलाफ केस दर्ज हुए हैं, सरकारी जांच एजेंसियों की छापामारी होती रही है, बेनामी संपत्ति सामने आई है, जिसे जब्त भी किया गया है। आखिर इन घटनाओं को कब तक बर्दाश्त किया जाता। जब आग्रहों  के बावजूद लालू परिवार की ओर से कोई सफाई नहीं दी गई और तेजस्वी इस्तीफा नहीं देंगे, इसी जिद पर वे अड़े रहे, तो सरकार के तौर पर काम करना संभव नहीं था। नतीजतन अंतरात्मा की आवाज पर मुझे ही अलग होना पड़ा। बेशक नीतीश कुमार ने एक बार फिर अपनी छवि और प्रतिष्ठा से कोई समझौता नहीं किया है। सरकार और महागठबंधन टूटने के बाद कोई भी पक्ष मध्यावधि चुनाव नहीं चाहता था। पीएम मोदी ने नीतीश के इस्तीफे के तुरंत बाद ही ट्वीट कर भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में शामिल होने पर उन्हें बधाई और शुभकामनाएं दी थीं। ऐसा लगता है मानो इस घटनाक्रम की पटकथा पहले ही दिल्ली में लिख ली गई थी। नीतीश भी एनडीए के साथ जाने के पक्ष में थे। इस बिखराव का सबसे ज्यादा नुकसान कांग्रेस की राजनीति को होगा, जो 2019 के लोकसभा चुनावों के मद्देनजर विपक्षी एकता की लगातार कोशिशें करती रही है। नीतीश को ऐसी प्रस्तावित एकता का चेहरा माना जाता रहा था, लेकिन नीतीश और जदयू के अब एनडीए में आने से एकता का एक ताकतवर सिरा कांग्रेस से छिन गया है। बिहार में भी सत्ताहीन होने के बाद राजद और कांग्रेस के विधायक दल कितना एकजुट रह पाएंगे, यह सवाल भी आशंकाएं पैदा करता है, क्योंकि वे किसी विचारधारा से बंधे नहीं हैं।

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