‘राष्ट्रपति’ मोदी सुधार सकते हैं भारतीय संविधान

Jul 14th, 2017 12:05 am

भानु धमीजा

सीएमडी, ‘दिव्य हिमाचल’

लेखक, चर्चित किताब ‘व्हाई इंडिया नीड्ज दि प्रेजिडेंशियल सिस्टम’ के रचनाकार हैं

मोदी के राष्ट्रपति बनने से हमारे देश के शासन को बड़े लाभ होंगे। लगातार राजनीति करने के बजाय वह अपना सारा ध्यान नीतियां लागू करने पर लगा पाएंगे। वह राष्ट्रपति पद की संरचना के अनुसार हमेशा अपनी पार्टी के पक्ष में बोलने से मुक्त होकर समस्त भारतीयों की आवाज बन पाएंगे। वह स्वयं द्वारा चुने गए प्रधानमंत्री के साथ कार्य करने की स्थिति में होंगे, जिसके ऊपर संसद में मोदी के विधायी एजेंडा पर काम करने का जिम्मा होगा…

भारत की जनता आज मोदी पर अत्यधिक विश्वास रखती है। उसने प्रधानमंत्री को अपना निर्विवाद नेता मान लिया है। उन्हें केंद्र व अधिकतर राज्य सरकारों पर ही नहीं, बल्कि भारत के सबसे बड़े राजनीतिक दल भाजपा पर भी संपूर्ण शक्ति प्राप्त हैं। इतनी शक्ति कि आगामी चुनाव में पूरे आसार हैं कि वह भारत के अगले राष्ट्रपति को भी अपनी मर्जी से चुनने की स्थिति में होंगे। शायद मोदी को स्वयं उस पद पर बैठना चाहिए। यह कदम न केवल भारत को एक प्रभावी सरकार-प्रमुख देगा, बल्कि भारतीय संविधान की एक विकृति को दूर करने का मौका भी उपलब्ध करवाएगा। हमारे मौजूदा संविधान के तहत भारत की सरकार का प्रमुख प्रधानमंत्री नहीं अपितु राष्ट्रपति है। इसका अनुच्छेद 53 सभी कार्यकारी शक्तियां व हमारे सशस्त्र बलों की सुप्रीम कमान राष्ट्रपति को देता है। दूसरी ओर, प्रधानमंत्री केवल ‘‘सहायता एवं सलाह’’ देने के लिए है (अनुच्छेद 74)। और जहां तक संसद का सवाल है, इसके पास मात्र विधायी शक्तियां हैं। परंतु क्योंकि सभी कानून सरकार द्वारा पास किए जाते हैं – वर्ष 1970 से एक भी प्राइवेट मेंबर बिल पास नहीं हुआ है – संसद भी राष्ट्रपति के ही अप्रत्यक्ष नियंत्रण में है। अधिक अधिकार राष्ट्रपति का है या प्रधानमंत्री का, यह प्रश्न गणतंत्र के आरंभ से ही संवैधानिक संघर्षों का स्रोत रहा है। हमारे पहले राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद इस मसले पर प्रधानमंत्री नेहरू से दशक भर गुप्त रूप से लड़ते रहे, परंतु हल नहीं निकला।

पहले ही वर्ष एक बड़ा संवैधानिक संकट टल गया, जब इस मनमुटाव के कारण नेहरू ने इस्तीफे की धमकी दी और प्रसाद पीछे हट गए। वर्ष 1957 में प्रसाद इस मुद्दे को जनता के बीच ले आए और एक संबोधन में तर्क दिया कि संविधान राष्ट्रपति को प्रधानमंत्री की सलाह अस्वीकार करने की शक्ति देता है। प्रसाद के दावे को 1963 में कुछ समर्थन भी मिला। भारत की संविधान सभा के एक वरिष्ठ सदस्य केएम मुंशी ने इस बात पर जोर दिया कि संविधान निर्माताओं का इरादा महज नाम ही का राष्ट्रपति बनाना नहीं था। अपनी पुस्तक ‘‘भारतीय संविधान के तहत राष्ट्रपति’’ में मुंशी ने स्पष्ट कहाः ‘‘संविधान सभा की यह सोच नहीं थी कि वह एक शक्तिहीन राष्ट्रपति तैयार कर रही थी।’’ एक शक्ति संपन्न राष्ट्रपति मुहैया करवाने की संविधान सभा की यह भावना हालांकि इंदिरा गांधी द्वारा 1976 में पूरी तरह ध्वस्त कर दी गई। उनके 42वेें संशोधन ने राष्ट्रपति पद को संपूर्णतया शक्तिहीन बना डाला। अनुच्छेद 74 बदल दिया गया कि राष्ट्रपति को प्रधानमंत्री की सलाह के अनुसार ‘‘कार्य करना होगा’’। बाद में आने वाली जनता सरकार ने भी यह निंदनीय प्रावधान नहीं हटाया। इसने राष्ट्रपति को केवल यह अधिकार दिया कि वह प्रधानमंत्री को पुनर्विचार के लिए कहे, जिसके बाद उसे ‘सलाह’ माननी ही होगी।

मूल संविधान की यह विकृति अभी भी कायम है। नानी पालकीवाला, भारत के एक सर्वाधिक प्रतिष्ठित संवैधानिक विद्वान ने लिखा कि इंदिरा गांधी के संशोधन ने ‘‘संविधान के आधारभूत ढांचे को नष्ट कर दिया है।’’ इसी प्रकार संविधान के विख्यात इतिहासकार ग्रैनविल ऑस्टिन ने दर्ज किया कि ‘‘नए संविधान में शक्तियों के संतुलन में बदलाव से यह पहचान के काबिल ही नहीं रहा।’’ राष्ट्रपति पद पर मोदी की तरक्की भारतीय संविधान में शक्तियों का संतुलन बहाल करने में सहायक होगी। जनमानस का उनमें विश्वास हमारे देश को एक बार फिर वही संविधान दे पाएगा जैसा हमारे संविधान निर्माता चाहते थे। बेशक, इसके लिए इंदिरा गांधी के आपातकाल की उपहासजनक रचना को निरस्त करना, और राष्ट्रपति को वास्तविक शक्तियां देना, आवश्यक होगा।

शायद यह उस ‘‘निर्देश प्रपत्र’’ को आखिरकार लागू करने का उचित समय होगा जो राष्ट्रपति की शक्तियों का विस्तृत विवरण देता है। ऐसा एक प्रपत्र संविधान प्रारूप में शामिल करने का बीआर अंबेडकर ने कभी वचन दिया था, परंतु बाद में मुकर गए। मोदी के राष्ट्रपति बनने से हमारे देश के शासन को बड़े लाभ होंगे। लगातार राजनीति करने के बजाय वह अपना सारा ध्यान नीतियां लागू करने पर लगा पाएंगे। वह राष्ट्रपति पद की संरचना के अनुसार हमेशा अपनी पार्टी के पक्ष में बोलने से मुक्त होकर समस्त भारतीयों की आवाज बन पाएंगे। वह स्वयं द्वारा चुने गए प्रधानमंत्री के साथ कार्य करने की स्थिति में होंगे, जिसके ऊपर संसद में मोदी के विधायी एजेंडा पर काम करने का जिम्मा होगा। इसी प्रकार उनके पास विपक्षी दलों द्वारा शासित राज्यों सहित भारतीय राज्य सरकारों का अधिक नियंत्रण होगा। और एक गैर दलगत कार्यकारी पदाधिकारी के तौर पर वे आखिरकार न्यायपालिका की न्यायाधीश चुनने को बनाई गई कालेजियम प्रणाली में भी भूमिका

निभा पाएंगे। इससे भारत की सरकार में शक्तियां का पृथ्थकरण बेहतर होगा। सरकार की हर शाखा – कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका – अधिक प्रभावशाली होगी। प्रत्येक अपने कार्यों के प्रति अधिक केंद्रित होगी, स्वतंत्रता से कार्य करने को ज्यादा सशक्त होगी, अपनी जिम्मेदारियों के प्रति अधिक स्पष्ट होगी, और इस प्रकार जनता के प्रति ज्यादा जवाबदेह होगी। इसके साथ ही, हर शाखा दूसरों को नियंत्रित व संतुलित कर पाएगी, जो सरकार की किसी अच्छी प्रणाली की मूलभूत आवश्यकता की पूर्ति होगी। राष्ट्रपति बनने से मोदी को व्यक्तिगत लाभ भी होंगे। वह सरकार-प्रमुख और राष्ट्र-प्रमुख दोनों होंगे। इससे विश्व राजनीति में वह भारतीय इतिहास के किसी भी अन्य नेता से अधिक बड़ा कद पाने की स्थिति में होंगे। वह भारत के महान राजनेता के तौर पर अंतरराष्ट्रीय मुद्दों में अपने दूरदर्शी नए विचारों पर ध्यान केंद्रित कर पाएंगे। राष्ट्रपति मोदी देश की प्रादेशिक राजनीति में फंसे बिना एक बेहतर राष्ट्रीय एजेंडा तय कर पाएंगे। वह भारत की संस्कृति में बड़े सुधारों – उदाहरणार्थ महिलाओं और सफाई के प्रति गहराई तक जड़ें जमाए बैठी विचारधाराओं – को कार्यान्वित कर पाएंगे।

और सबसे बढ़कर, राष्ट्रपति मोदी अपना भाजपा का लेवल उतारकर भारत के सांप्रदायिक सौहार्द में ऐतिहासिक भूमिका निभा पाएंगे। मोदी और देश के लिए शुभ समाचार यह है कि भारत का मौजूदा संविधान उनकी इस ऐतिहासिक भूमिका के लिए अनुकूलनशील है। हमारी प्रणाली में पहले ही एक निर्वाचित राष्ट्रपति है, और यह उसे सभी आवश्यक शक्तियां भी देता है। देश को मात्र वे बेडि़यां हटानी होंगी जो इस पद पर इंदिरा गांधी के आपातकाल के दौरान गलत रूप से डाल दी गई थीं। मोदी एक ऐसे भारतीय नेता बन सकते हैं जो भारतीय संविधान निर्माताओं की मिश्रित संसदीय-राष्ट्रपति प्रणाली की परिकल्पना को आखिरकार मूर्तरूप दे पाएं। विख्यात संवैधानिक विद्वान पद्मभूषण डा. सुभाष कश्यप ने अकसर कहा है, ‘‘अगर नेहरू भारत के पहले राष्ट्रपति और प्रसाद पहले प्रधानमंत्री होते, तो संविधान में बिना कोई बदलाव किए हमारी प्रणाली संसदीय के बजाय अधिक प्रेजिडेंशियल होती।’’ शायद मोदी हमारे संविधान में यह सुधार लाएं और प्रेजिडेंशियल व पार्लियामेंटरी दोनों सरकार की प्रणालियों के सर्वश्रेष्ठ गुण होने का इसका सपना साकार करें।

साभार : हफिंग्टन पोस्ट/टाइम्स ऑफ इंडिया

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