राज्यसभा की ओवरहॉलिंग आवश्यक

Aug 30th, 2017 12:05 am

भानु धमीजा

सीएमडी, ‘दिव्य हिमाचल’

लेखक, चर्चित किताब ‘व्हाई इंडिया नीड्ज दि प्रेजिडेंशियल सिस्टम’ के रचनाकार हैं

जहां तक राज्यसभा की भूमिका में बदलावों की बात है, इसे सरकार पर विशिष्ट निरीक्षण का अधिकार देकर, सामान्य उत्तरदायित्व लोकसभा के लिए छोड़ देना चाहिए। उदाहरणार्थ, अमरीकी सेनेट की भांति, भारत की राज्यसभा सभी विदेशी संधियों, प्रमुख कैबिनेट नियुक्तियों, और सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के अनुमोदन का प्राधिकरण हो सकती है। न्यायाधीशों की नियुक्तियों पर सरकार व न्यायपालिका के बीच वर्तमान में जारी संघर्ष से निपटने का यह सही तरीका हो सकता है। आइए उम्मीद करें कि मोदी जब दोनों सदनों पर पूर्ण नियंत्रण पा लेते हैं, तो इन सुझावों पर विचार होगा। क्योंकि केवल ऐसे बदलावों से ही हम भारत के लोकतंत्र को सुरक्षित रख सकते हैं…

हमारी संसद के द्वितीय प्रकोष्ठ राज्यसभा (राज्यों की परिषद) का आविष्कार राज्यों का प्रतिनिधित्व करने और बिना सोचे-विचारे, गलत कानून बनाने से रोकने के लिए किया गया था। हालांकि अब तक हम देख चुके हैं कि इसका प्रदर्शन दोनों ही मामलों में कमजोर रहा है। आज की राज्यसभा केवल राजनीतिक दलों के आकाओं का प्रतिनिधित्व करती है, और दलगत राजनीति का माध्यम बन गई है। दोष इसकी मूल रचना में है। द्विसदनीय विधायिका संसदीय प्रणाली में सही तरीके से फिट नहीं बैठ सकती। और इसकी सदस्यता की शर्तों में कुछ समय पहले किए गए परिवर्तनों ने दरअसल स्थिति और बिगाड़ दी है। अगर हम राज्यसभा के ढांचे और भूमिका में जल्द ही संशोधन नहीं करते हैं, तो भारतीय लोकतंत्र में इसके बचे-खुचे मूल्य भी हम खो बैठेंगे।

भारत के लोकतंत्र को नुकसान

आज की राजनीति में राज्यसभा की दोषपूर्ण भूमिका ही कारण है कि प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह इस निकाय का नियंत्रण हासिल करने के लिए पूरा जोर लगा रहे हैं। हमने गुजरात में एक सीट के लिए कटु संघर्ष देखा है। मोदी सरकार ने इसे जीतने की खातिर विपक्ष को धमकाने के लिए हमारे टैक्स प्राधिकारियों का इस्तेमाल करने से भी परहेज नहीं किया। एक अन्य सीट सुरक्षित करने के लिए शाह ने खुद तक को नामित कर दिया। और एक विश्वासपात्र भाजपा क्षत्रप, वेंकैया नायडू को महत्त्वपूर्ण मंत्रालय से हटाकर उपराष्ट्रपति और राज्यसभा सभापति बनाया। अगर यही व्यवहार जारी रहा तो वह दिन दूर नहीं जब भाजपा का लोकसभा और राज्यसभा दोनों पर पूर्ण नियंत्रण होगा। इससे निश्चित तौर पर मोदी का एजेंडा तेजी से आगे बढ़ेगा। पर यह भारत के लोकतंत्र के लिए अच्छी दिशा नहीं है। क्योंकि राज्यसभा की ढांचागत दुर्बलताओं को सुधारने के बजाय भाजपा निःसंदेह इसे एक दलगत साधन के रूप में इस्तेमाल करेगी, ठीक उसी प्रकार जैसे इतिहास में कांग्रेस पार्टी ने किया है। यह भारतीय जनमानस के लिए एक बड़ा झटका होगा क्योंकि इससे जनप्रतिनिधित्व कम होगा, हमारे कानूनों की गुणवत्ता घटेगी, सरकार के ऊपर निरीक्षण में कमी आएगी, और भारत के संघवाद को क्षति पहुंचेगी।

ब्रिटेन में हाउस ऑफ लार्ड्स की यही दुविधा

राज्यसभा को हमारे लोकतंत्र के लिए प्रभावी रूप से प्रयोग करना वैसे ही कठिन है, क्योंकि इसका संसदीय सेटअप के साथ तालमेल नहीं बैठता। दो अलग-अलग निर्वाचित सदन उस मूल संसदीय सिद्धांत के विरुद्ध हैं कि विधायिका एकल सरकार को नियुक्त व नियंत्रित करती है। इसी कारणवश भारत की संविधान सभा में कुछ सदस्यों ने एकसदनी विधायिका का सुझाव दिया था। लोकनाथ मिश्रा ने तो संविधान के प्रारूप से राज्यों की परिषद को हटाने का संशोधन तक पेश किया था। उन्होंने कहा कि जब तक इस परिषद का प्रारूप ऐसा है कि ‘‘जनता के सदन (लोकसभा) पर इसका कोई प्रभाव नहीं’’ तब तक यह ‘‘जनमानस के धन और समय’’ की बर्बादी ही होगी। अंबेडकर ने उनका संशोधन बिना टिप्पणी किए अस्वीकार कर दिया था। संसदीय प्रणाली के जनक ब्रिटेन में भी द्विसदनीय विधायिका दुविधा में रही है। जब तक हाउस ऑफ लार्ड्स सम्राट की चारदीवारी की तरह कायम रहा और हाउस ऑफ कॉमन्स को वीटो कर सकता था, इसने एक महत्त्वपूर्ण उद्देश्य की पूर्ति की। परंतु जब 1832 में गणतांत्रिक सुधार कॉमन्स को सशक्त बनाने लगे, लार्ड्स की संतुलन बनाने की भूमिका घटने लगी। वर्ष 1911 में ब्रिटिश संसद ने हाउस ऑफ लार्ड्स की वीटो की शक्ति छीन ली। वर्ष 1949 में विधेयक रोके रखने के इसके अधिकारों को और कम कर दिया गया। वर्ष 2005 में एक स्वतंत्र सर्वोच्च न्यायालय की स्थापना के साथ ही हाउस ऑफ लार्ड्स से इसके न्यायिक कार्य भी पूरी तरह छीन लिए गए। और 2011 में, उस निकाय का आकार काफी कम करने को विधेयक लाया गया जिसमें कहा गया कि इसके सदस्यों को नियुक्त करने के बजाय 80 प्रतिशत लार्ड्स को निर्वाचित किया जाए। ब्रिटिश संवैधानिक विद्वान सर सिडनी लो ने 1904 में स्वीकार किया था कि ‘‘अगर ‘नियंत्रण और संतुलन’ की व्यवस्था एक देश के लोकतंत्र को बचाने के लिए है, तो हाउस ऑफ लॉर्ड्स अपना उद्देश्य बिल्कुल पूरा नहीं करता।’’

राजनीतिक आकाओं के तले राज्यसभा

भारतीय और ब्रिटिश, दोनों अनुभव सिद्ध करते हैं कि एक संसदीय सरकार पर दो विधायी प्रकोष्ठों को नियंत्रण सौंपना संभव नहीं है। परंतु हमारी भारत की राज्यसभा एक और विसंगति का सामना करती है। राज्यों के प्रतिनिधि के तौर पर इसकी भूमिका एक संसदीय प्रणाली के खाके के अनुरूप नहीं है, जो कि स्वाभाविक तौर पर एकात्मक है, संघीय नहीं। जब केंद्र सरकार राज्य सरकारों और उनके कार्यों में दखल दे सके, तो राज्यसभा राज्यों के अधिकारों की आवाज होने का अपना स्थान खो देती है। इसलिए आश्चर्य नहीं कि भारत ने 2003 में एक संविधान संशोधन के माध्यम से यह आवश्यकता हटा दी कि इसके सदस्य  उस राज्य के रहने वाले हों जहां से वे चुने जाते हैं। इस बदलाव ने पार्टी आकाओं को खुली छूट दे दी। अब वे बिना चुनाव करवाए पार्टी के विश्वासपात्रों को संसद भेज सकते हैं। राजनीतिक टिप्पणीकार कुलदीप नैयर, जो स्वयं राज्यसभा के पूर्व सांसद हैं, ने लिखा है कि ‘‘अब समूची राज्यसभा राजनीतिक आकाओं द्वारा नामित की जाती है।’’

‘पुनर्निरीक्षण प्राथमिक उद्देश्य’

भारत के लिए आवश्यक है कि राज्यसभा को खुल्लमखुल्ला पार्टी प्लेटफॉर्म से बदलकर एक गवर्निंग संस्था बनाया जाए। यह इसकी संरचना के प्राथमिक उद्देश्य, यानी पुनर्निरीक्षण प्रकोष्ठ होने के अनुरूप बनाकर किया जा सकता है। राज्यसभा के मुख्य लक्ष्य का वर्णन इसके प्रथम सभापति एस राधाकृष्णन ने सटीक रूप से किया था : ‘‘उतावले कानूनों से बचने के लिए एक द्वितीय प्रकोष्ठ आवश्यक है।’’ वर्ष 1928 में मोतीलाल नेहरू रिपोर्ट में सिफारिश की गई थी कि भारत में एक उच्च सदन हो, ताकि कानून पर पुनर्विचार ‘‘कुछ शांत माहौल’’ में हो सके। संविधान सभा ने बुद्धिमता से इस सलाह को स्वीकार किया। इसी प्रकार की सलाह दुनिया के दूसरी ओर 150 साल पूर्व अमरीका के निर्माताओं की रही। जार्ज वाशिंगटन ने अपनी सरकार के दूसरे प्रकोष्ठ सेनेट की भूमिका का वर्णन करते हुए कहा कि ‘‘हम कानून को ठंडा करने के लिए इसे सेनेट के दायरे में डालते हैं।’’

उच्च सदन में उपयुक्त प्रतिनिधित्व

राज्यसभा को इसके उद्देश्य अनुसार ‘शांत माहौल’ देने के लिए इसे भावात्मक लोकसभा से अलग रूप देना चाहिए। राज्यसभा सदस्यों को बड़े चुनाव क्षेत्रों और व्यापक हितों का प्रतिनिधित्व करना चाहिए। वे उनके राजनीतिक दल के उतार-चढ़ाव और आकाओं की सनक से प्रभावित नहीं होने चाहिएं। वे अधिक परिपक्व और अनुभवी होने चाहिएं। और उन्हें अपने पद पर अधिक स्थिरता महसूस होनी चाहिए। इसके अतिरिक्त राज्यसभा का ढांचा और भूमिका भी लोकसभा से स्पष्ट रूप से भिन्न होनी चाहिए। इन संरचनात्मक तत्त्वों में से कुछ पहले ही मौजूद हैं। राज्यसभा सदस्यों की न्यूनतम आयु (25 के मुकाबले 30 वर्ष) पहले ही अधिक और कार्यकाल (पांच के मुकाबले छह वर्ष) लंबा है। साथ ही राज्यसभा एक स्थायी सदन है, इसके केवल एक-तिहाई सदस्य हर दो वर्ष बाद चुनाव का सामना करते हैं। गौरतलब है कि ये विशेषताएं अमरीकी सेनेट के समान हैं। परंतु समानताएं यहीं समाप्त हो जाती हैं।

राज्यसभा की पूर्ण लोकतांत्रिक उपयोगिता के लिए भारत को तीन प्रमुख बदलावों पर विचार करना चाहिए…

* राज्यसभा सदस्य जनता द्वारा प्रत्यक्ष निर्वाचित किए जाने चाहिएं। चुनाव प्रक्रिया से पार्टी आकाओं का वर्चस्व और भ्रष्टाचार हटाने का यही एकमात्र रास्ता है।

* सदस्य पूरे राज्य से निर्वाचित किए जाने चाहिएं। यह लोकसभा सदस्यों से अधिक बड़ा चुनाव क्षेत्र होगा।

* राज्यसभा में हर राज्य से समान प्रतिनिधित्व होना चाहिए। भारत जैसे विविध संघीय राष्ट्र के लिए राज्यों को समान प्रतिनिधित्व देने का एक मजबूत आधार है, क्योंकि लोकसभा का प्रतिनिधित्व जनसंख्या पर आधारित है। उस लाभ के विषय में सोचिए जब संसद के एक प्रकोष्ठ में समूचे भारत की विविधता समान संख्या में प्रतिबिंबित होगी। यह भारत के भाईचारे व समानता की भावना के लिए चमत्कार कर देगा। हालांकि देश को लोकसभा सदस्यों की संख्या बढ़ानी और राज्यसभा सदस्यों की तादाद घटानी होगी।

कैबिनेट और न्यायिक नियुक्तियों का निरीक्षण

जहां तक राज्यसभा की भूमिका में बदलावों की बात है, इसे सरकार पर विशिष्ट निरीक्षण का अधिकार देकर, सामान्य उत्तरदायित्व लोकसभा के लिए छोड़ देना चाहिए। उदाहरणार्थ, अमरीकी सेनेट की भांति, भारत की राज्यसभा सभी विदेशी संधियों, प्रमुख कैबिनेट नियुक्तियों, और सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के अनुमोदन का प्राधिकरण हो सकती है। न्यायाधीशों की नियुक्तियों पर सरकार व न्यायपालिका के बीच वर्तमान में जारी संघर्ष से निपटने का यह सही तरीका हो सकता है। आइए उम्मीद करें कि मोदी जब दोनों सदनों पर पूर्ण नियंत्रण पा लेते हैं, तो इन सुझावों पर विचार होगा। क्योंकि केवल ऐसे बदलावों से ही हम भारत के लोकतंत्र को सुरक्षित रख सकते हैं।

साभार : दि क्विंट

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