हिंदुत्व नहीं भारतीयता

Sep 28th, 2017 12:05 am

भानु धमीजा

सीएमडी, ‘दिव्य हिमाचल’

लेखक, चर्चित किताब ‘व्हाई इंडिया नीड्ज दि प्रेजिडेंशियल सिस्टम’ के रचनाकार हैं

अतः हिंदुत्व के पुनर्निर्माण में पहली चुनौती स्वयं इसका नाम है। यह उस सामान्य सिद्धांत को तोड़ता है कि एक नाम सर्वाधिक प्रभावशाली तभी होता है जब इसे व्याख्या की आवश्यकता नहीं होती। सावरकर ने इसका वर्णन करने को हजारों शब्द इस्तेमाल किए, मात्र यह कहने के लिए कि यह हिंदुवाद नहीं है। मौजूदा स्पष्टीकरण भी लगभग खेद व्यक्त करते हैं, कि हिंदुत्व हिंदुवाद नहीं भारतीयता या इंडियननैस (Indianness) का पर्याय है। हिंदुत्व को भारतीयता का नाम देना सर्वाधिक उपयुक्त होगा…

हिंदुत्व, वीडी सावरकर द्वारा प्रचारित एक सामान्य राष्ट्रीय सांस्कृतिक पहचान का उद्देश्य भारतीयों को एकीकृत करना और एक श्रेष्ठ भारत का निर्माण था। अब तक यह दोनों लक्ष्यों में असफल रहा है। इसके विपरीत यह भारत के लोगों में विभाजनों को और गहरा कर रहा है, धार्मिक अतिवाद भड़का रहा है, और उम्मीद समाप्त कर रहा है कि एक महान राष्ट्र के निर्माण को देश के सभी धर्म कभी एक हो पाएंगे। हालांकि इसमें सावरकर को कोसने की आवश्यकता नहीं है। भारत के लोगों को एकजुट करना नेक कार्य है। और भारत को एक नारे की आवश्यकता भी है जो बहुसंख्यक हिंदुओं को एकजुट करने में सहायक हो। सावरकर की गलती यह रही कि उन्होंने हिंदुओं को उदारता और उत्कृष्ट लक्ष्यों के बजाय संकीर्णता से सोचने को प्रेरित किया। वह सरकार की ऐसी व्यावहारिक प्रणाली प्रस्तुत करने में भी असफल रहे जो अल्पसंख्यक लोगों के साथ शक्तियां साझा करे और उन्हें राष्ट्र के निर्माण में सच्चे साझीदार बना पाए। यही नहीं, भारत के आकार व वैश्विक प्रभाव में विस्तार को उनकी योजना में एक दूरदर्शी खाके का अभाव रहा।  असल में हिंदुत्व बहुसंख्यकों के धर्म के साथ अत्यधिक गुंथा हुआ है। यह असफलता देश के विभाजन से पहले ही स्पष्ट थी। दोष मढ़ा जा सकता है, परंतु यह तथ्य है कि सावरकर की विशाल रणनीति कि ‘‘हिंदुस्तान सदैव एक और अविभाज्य रहना चाहिए’’ सफल नहीं रही। सांस्कृतिक रूप से विविध जनता को एकजुट रखने का साधन उपलब्ध करवाने के स्थान पर, हिंदुत्व ने हिंदुओं और मुस्लिमों को एक-दूसरे से दूर धकेल दिया। इसने गांधी, नेहरू, श्यामा प्रसाद मुखर्जी, दीनदयाल उपाध्याय और स्वयं सावरकर जैसे बुद्धिमान व सौम्य नेताओं के बीच दूरी पैदा कर दी।

इन मतभेदों ने हिंदुओं को लगभग सौ वर्षों से विभाजित रखा है।  सावरकर की योजना का प्रस्ताव इससे ठीक विपरीत था। उन्होंने विभिन्न हिंदू पंथों और जातियों के बीच मतभेद दूर करने का बीड़ा उठाया, ताकि वे अंग्रेजों के विरुद्ध एकजुट हों और स्वयं को एकल राष्ट्र मानें। उन्होंने एक संगठनात्मक सिद्धांत प्रस्तुत करने के लिए हिंदुवाद से अलग हिंदुत्व की परिभाषा दी। हिंदुवाद को वह ‘‘आवश्यक रूप से सांप्रदायिक’’ समझते थे। ‘‘हिंदुत्व केवल हिंदुओं के धार्मिक पहलू का हवाला नहीं देता जैसा हिंदुवाद शब्द करता है,’’ सावरकर ने कहा, ‘‘बल्कि उनके सांस्कृतिक, भाषायी, सामाजिक और राजनीतिक पहलुओं को भी समाविष्ट करता है।’’ उनका हिंदुत्व राजनीतिक लामबंदी का एक साधन था। परंतु क्योंकि सावरकर का हिंदुत्व हिंदुवाद से भिन्न नहीं दिखता था, और एक राजनीतिक आंदोलन था, इसे जल्द ही हिंदू आधिपत्य स्थापित करने के एक प्रयास के रूप में देखा जाने लगा। क्योंकि उनकी योजना के अंतर्गत अल्पसंख्यकों को समान अधिकार और सुरक्षा तो मिलनी थी, परंतु सत्ता में भागीदारी नहीं। अब प्रश्न यह है कि एक श्रेष्ठ भारत के निर्माण के सावरकर के सपने को पूरा करने को हिंदुत्व का पुनर्निर्माण कैसे किया जा सकता है? हिंदुओं को एकजुट करना कठिन कार्य है। यह धर्म एकल विश्वास, या एक व्यवस्थित चर्च, या एक पुस्तक पर आधारित नहीं है। इसलिए जब भी हिंदुओं पर एक तरीका थोपने का प्रयास होता है, हिंदू विद्रोह पर उतर आते हैं।

साथ ही, हिंदुवाद का मूलभूत दर्शन, कि दूसरों पर चोट या हिंसा नहीं होनी चाहिए, उन्हें अन्यों का धार्मिक आधार पर विरोध करने की किसी भी योजना के खिलाफ बना देता है। यही कारण है कि सावरकर का हिंदुत्व अधिकतर हिंदुओं द्वारा नकारा जाता रहा है। आज भी जब यह संभवतः अपने शिखर पर है, हिंदुत्व अपनी ध्वजवाहक पार्टी बीजेपी को संपूर्ण हिंदू समर्थन नहीं दिलवाता। मोदी 2014 में प्रधानमंत्री बने परंतु भाजपा को मात्र 32 प्रतिशत वोट मिले जबकि देश में लगभग 80 प्रतिशत हिंदू हैं। इसी प्रकार 2017 में योगी आदित्यनाथ उत्तर प्रदेश में इतिहास की सबसे विशाल हिंदुत्व लहर पर सवार हुए परंतु 80 प्रतिशत हिंदुओं वाले राज्य में 40 प्रतिशत से भी कम वोट जुटा पाए। हिंदू एकजुट होना चाहते हैं, परंतु इसके लिए हिंदुत्व से भी अधिक उत्थान की अवधारणा आवश्यक है। इसके लिए एक ऐसा विचार चाहिए जो हिंदू धर्म को एक आम संगठित धर्म दिखाने के बजाय हिंदुवाद की सर्वव्यापी सार्वभौमिकता को दिखाए। हिंदू विशाल हृदय हैं। वे एकता के उस आह्वान का प्रसन्नता से अनुसरण करेंगे जो धार्मिक मतभेदों के बावजूद संपूर्ण मानवता की सेवा के उनके दर्शन के अनुरूप हो।  अतः हिंदुत्व के पुनर्निर्माण में पहली चुनौती स्वयं इसका नाम है। यह उस सामान्य सिद्धांत को तोड़ता है कि एक नाम सर्वाधिक प्रभावशाली तभी होता है जब इसे व्याख्या की आवश्यकता नहीं होती। सावरकर ने इसका वर्णन करने को हजारों शब्द इस्तेमाल किए, मात्र यह कहने के लिए कि यह हिंदुवाद नहीं है।

मौजूदा स्पष्टीकरण भी लगभग खेद व्यक्त करते हैं, कि हिंदुत्व हिंदुवाद नहीं भारतीयता या इंडियननैस (Indianness) का पर्याय है। हिंदुत्व को भारतीयता का नाम देना सर्वाधिक उपयुक्त होगा, बशर्ते संकल्पना यहां वर्णित अन्य सिद्धांतों को भी अपनाए। दूसरा, हिंदुत्व के विपरीत, भारतीयता इस सिद्धांत पर आधारित हो कि अल्पसंख्यक सत्ता में उचित हिस्सा पा सकते हैं। इसके लिए शासन की ऐसी प्रणाली चाहिए जो उन्हें स्थानीय, राज्य और केंद्र सरकारों में अवसर दे। सबसे अच्छा रास्ता राष्ट्रपति प्रणाली अपनाना है, जिसे बहुसंख्यकों को अकेले शासन करने से रोकने के लिए विशेष रूप से तैयार किया गया था।  तीसरा, भारतीयता के तहत स्थानीय सरकारों को स्थानीय मसले निपटाने के लिए अधिक स्वायत्तता दी जानी चाहिए। जहां मुस्लिम बहुसंख्यक हैं, उदारणार्थ कश्मीर में, भारतीयता को उन्हें अन्य सभी राज्य सरकारों के अनुरूप समान अधिकार और जिम्मेदारियां देनी चाहिएं।

चौथा, भारतीयता को ऐसे कानून भी अवश्य चाहिएं जो वास्तविक धर्मनिरपेक्षता कायम करें। ये धार्मिक स्वतंत्रता, कानून के समक्ष समानता, और धर्म व सरकार के पृथक्करण पर आधारित होने चाहिएं। एक महान भारत के निर्माण को हमें समान नागरिक संहिता, और सरकारों को किसी भी धर्म के साथ लिप्त होने से रोकने के लिए संवैधानिक संशोधन पास करने होंगे। अंतिम, भारतीयता को एक उभरते भारत का दृष्टिकोण प्रस्तुत करना चाहिए। राज्यों को स्व-शासन की स्वयत्तता देकर भारतीयता देश की क्षेत्रीय अखंडता सुरक्षित करती है। पड़ोसी देशों को ‘भारतीय संघ’ का प्रस्ताव देकर इसे और भी आगे बढ़ाना चाहिए। समान विचारों वाले पड़ोसी देश जो भारत के आकार और शक्ति से लाभ उठाना चाहें, उन्हें ‘भारतीय संघ’ में शामिल होने के लिए निमंत्रित किया जाना चाहिए। हम सभी एक महान भारत का स्वप्न देखते हैं। सावरकर ने भी ऐसा ही सपना देखा था। आइए उनके हिंदुत्व के विचार को और भी उत्कृष्ट व व्यावहारिक बनाएं, ताकि हम सब साथ मिलकर अपने सपनों का भारत बना पाएं।

साभार : टाइम्स ऑफ इंडिया

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