जनता को काम चाहिए चाहे जैसे मर्जी करवाओ

Oct 2nd, 2017 12:10 am

सत्ती के मुताबिक, राजनीतिक व्यवस्था में दोष

newsऊना— छात्र राजनीति से इलेक्ट्रोल पोलिटिक्स में प्रवेश करने वाले स्पष्टवादी नेता व ऊना सदर से लगातार तीन बार विधायक रहे सतपाल सत्ती के अनुसार मौजदू दौर की राजनीति में मुंह पर साफ बात बोलने वालों को दिक्कतें झेलनी पड़ती हैं। राजनीति का नया दौर सच की राजनीति करने वालों के लिए आसान नहीं है। मौजूदा दौर में राजनीति की डगर अत्यंत कठिन हो गई है। राजनीतिक जमीन पर मजबूती से टिके रहना एक चुनौतीपूर्ण कार्य है। मतदाता जहां शिक्षित व जागरूक हुआ है, वहीं अब राजनेताओं से लोगों की अपेक्षाएं भी बढ़ी हैं। बेशक इसके लिए राजनेता स्वयं ही कहीं न कहीं दोषी भी हैं। बेहतर गवर्नेंस, नियम व कानून की अनुपालना को सुनिश्चित बनाने के स्थान पर व्यक्तिगत मसलों को दलगत राजनीति के आधार पर सेटल करवाने की परिपाटी ऐसी पड़ी है कि अब यही कवायद राजनेताओं के लिए सिरदर्दी का आलम भी बन चुकी है। सतपाल सत्ती के अनुसार पहले नेता राजनीति में सेवा के लिए आते थे, लेकिन अब धन्नासेठ इस क्षेत्र में आ रहे हैं। धनबल से मतदाताओं, आम जनता को प्रभावित करने के प्रयास किए जाते हैं। ईमानदार राजनेताओं के लिए इस दौर में बिना पैसे व लालच दिए राजनीति में टिके रहना बड़ी चुनौती बन गई है, वहीं अपने कार्यकर्ताओं व आम जनता को धन्नासेठों के चंगुल से बचाए रखना भी एक कड़ी चुनौती है। अब लोगों की अपेक्षाएं भी राजनेताओं से बढ़ी हैं। जनता चाहती है कि राजनेता उसका हर कानूनी-गैरकानूनी कार्य करवाएं। चाहे फिर इसके लिए राजनेता को नियमों व कानून का गला ही क्यों न घोटना पड़े। इसके लिए सतपाल सत्ती राजनीतिक सिस्टम को ही दोषी ठहराते हैं। बकौल सत्ती देश की आजादी के 70 साल बाद भी अनेक समस्याएं विकराल रूप धारण किए खड़ी हैं।

देशप्रेम-राष्ट्रवाद हो चयन का आधार

जनप्रतिनिधियों के चयन के दौरान देश के प्रति उसके लगाव, राष्ट्रवाद की भावना व सच्चाई व धर्म के मार्ग पर टिके रहने की क्षमताओं का भी मूल्यांकन होना चाहिए। वोटर को ऐसे व्यक्तित्व को ही अपना जनप्रतिनिधि चुनना चाहिए, जो नेशन फर्स्ट की अवधारणा पर चलता हो।

जनता की दिक्कतें कायम

देश की आजादी के 70 साल बाद भी आम आदमी की समस्याएं समाप्त नहीं हुईं, बल्कि बढ़ गई हैं। जनता को तो विकास चाहिए। गलियां, सड़कें, स्कूल, अस्पताल, सामुदायिक भवन, सरकारी कार्यालय, पानी, बिजली की अपेक्षा सभी को रहती हैं। आलम यह है कि आजादी के 70 साल बाद भी देशवासियों की एक तिहाई जनता के बैंक खाते तक नहीं खुल पाए थे।

ईमानदार नेता चुनें प्रेदशवासी

मौजूदा राजनीति का स्वरूप बदल चुका है। धनबल के आधार पर धन्नासेठ राजनीति में पैठ बना रहे हैं। जनता को चाहिए कि ईमानदार छवि के नेताओं को चुनकर भेजे। साफ-सुथरा नेता ईमानदारी से काम करेगा, जबकि करोड़ों खर्च कर चुना गया नेता तो अपने पैसे ही पूरे करेगा।

स्पष्ट बोला तो मिलेगी नाराजगी

श्री सत्ती कहते हैं कि राजनीति में स्पष्टवादिता नहीं चलती। उन्हें खुद कई बार स्पष्ट बोलने की कीमत अदा करनी पड़ी है। साफ बोलने पर जनता की नाराजगी तो झेलनी ही पड़ती है। अपनी ही पार्टी के नेताओं के गुस्से का भी कोपभाजन बनना पड़ता है।

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