जनसेवा करने वालों के लिए सियासत आसान

स्टोक्स के मुताबिक, उसूलों और नियमों पर हो राजनीति

NEWSशिमला-  बदलते समाज में राजनीति भी बदल गई है। वोटर जहां शिक्षित व जागरूक हुआ है, वहीं अब राजनेताओं से लोगों की अपेक्षाएं भी बढ़ गई हैं। सिस्टम को सुधारने व व्यक्तिगत मसलों को दलगत राजनीति के आधार पर सेटल करवाने की परिपाटी ऐसी पड़ी है कि अब यह कवायद नेताओं या नेत्रियों के लिए सिरदर्दी का आलम भी बन चुकी है।   प्रदेश की राजनीति में अलग रसूख रखने वाली सबसे वरिष्ठ नेत्री विद्या स्टोक्स मानती हैं कि जो लोग जनसेवा के लिए राजनीति करते हैं, उनके लिए राजनीति कभी मुश्किल नहीं होती। एक राजनेता के लिए जनसेवा पहला काम है। ऐसे में अगर कोई यह अपेक्षा करता है कि नेता उसके सुख-दुख में शामिल हो तो इसमें कोई बुराई नहीं है। श्रीमती स्टोक्स कहती हैं कि राजनीति में परेशानी अकसर वही लोग झेलते हैं, जो जनसेवा के लिए नहीं, बल्कि अपने निजी स्वार्थों की पूर्ति को महत्त्व देते हैं। राजनीति जनसेवा की नीति बनी रहे तभी विकास और विश्वास बना रहता है।  वोट बैंक को लेकर आज के दौर में काफी कुछ बदल गया है। पहले निष्ठा के आधार पर भी लोग मतदान करते थे, लेकिन आज के दौर में मतदाता जागरूक हो गया है। किसे वोट देना है किसे नहीं, इसका निर्णय वह जांच परख कर करता है। हालांकि अभी भी कुछ लोग दूसरों के कहे पर चलते हैं, लेकिन मतदान अपने विवेक के आधार पर जांच परख कर ही किया जाना चाहिए। मतदाताओं को अपने संदेश में विद्या स्टोक्स कहती हैं कि आज का मतदाता समझदार हो गया है, जागरूक हो गया है। वह विकास को प्राथमिकता देता है। होना भी यही चाहिए मतदान हमेशा अपने विवेक के आधार पर ही करें।

स्वार्थ की राजनीति से परेशानी

विद्या स्टोक्स कहती हैं कि आज हर कोई यह सोचता है कि वह सबसे समझदार और बेहतर इनसान है। बात नेता की हो या आम आदमी की। यह समस्या दोनों के साथ है।  दूसरों की सुनने को कोई तैयार नहीं है। राजनीति में भी ऐसा ही कुछ हो रहा है। हर कोई अपने हिसाब से नियम बनाकर चाहता है कि दूसरे भी उसके पीछे चलें, लेकिन राजनीति उसूलों और नियमों पर होनी चाहिए। हां ऐसा कई बार होता है, जब कुछ मामलों में दबाव होता है कि नियमों में ढील देनी पड़ता है, लेकिन ऐसा जनहित में हो तो ही उचित है। निजी स्वार्थ के लिए की गई राजनीति हमेशा परेशानी देती है।

कान भरने वालों की कमी नहीं

आईपीएच मंत्री विद्या स्टोक्स कहती हैं कि राजनेता हो या मतदाता, दोनों को ही अपने पूरे विवेक से काम लेना चाहिए। सही है कि राजनीति में कान भरने वालों की कमी नहीं होती। हर कोई अपना उल्लू सीधा कराने की कोशिश में लगा रहता है, लेकिन जनप्रतिनिधि होने के नाते सही और गलत में फर्क करना आना चाहिए। दूसरों के कहे अनुसार बिना सोचे समझे लिए गए निर्णय जनता के साथ-साथ अपने लिए भी परेशानी पैदा करते हैं।

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