हां . . . में शिक्षक हूं

चुनाव के मुहाने पर खड़े हिमाचल में शिक्षक एक बार फिर अहम भूमिका निभाने जा रहे हैं। प्रदेश में कर्मचारी वर्ग एक बड़ा वोट बैंक माना जाता है और हजारों गवर्नमेंट टीचर उसका महत्त्वपूर्र्ण घटक हैं। शिक्षकों के चुनाव से क्या हैं सरोकार, बता रही हैं…

भावना शर्मा

प्रारंभिक पाठशालाओं में शिक्षक             25083 

माध्यमिक पाठशालाओं में अध्यापक     17408

उच्च पाठशालाओं में टीचर                     9217

वरिष्ठ माध्यमिक पाठशालाओं में गुरु      14173

हिमाचल प्रदेश के समर्पित सरकारी शिक्षक केवल छात्रों का भविष्य ही नहीं संवारते, बल्कि सूबे की सियासत को नई दिशा भी दिखाते हैं। स्वर्गीय आईडी धीमान का व्यक्तित्व इसकी पराकाष्ठा कहा जा सकता है, जिन्होंने वर्षों बतौर अध्यापक दायित्व निभाने के बाद प्रदेश की राजनीति में अतुलनीय स्थान हासिल किया। सियासी हवाओं को बखूबी, समझने वाले और काफी हद तक दिशा भी दिखाने वाले अध्यापक इन चुनावों में भी एक नागरिक होने के नाते अपनी भूमिका निभाने को तैयार हैं। उल्लेखनीय है कि प्रदेश की भौगोलिक परिस्थितियों के बीच एक अबोध बालक को जिम्मेदार नागरिक बनाने का पूरा जिम्मा शिक्षक पर ही है। हिमाचल में शिक्षक ही बच्चों के भविष्य का निर्माण करते हैं। हिमाचल प्रदेश में 2011 की जनगणना के अनुसार 82.80 फीसदी साक्षरता दर है। इसमें पुरुषों की साक्षरता दर 89.53 प्रतिशत व महिला साक्षरता दर 75.93 फीसदी है। प्रदेश में करीब 15 हजार प्रारंभिक, माध्यमिक और उच्च पाठशालाएं हैं। इनमें प्रारंभिक पाठशालाओं में 25083 शिक्षक, माध्यमिक में 17408, उच्च पाठशालाओं में 9217, वरिष्ठ माध्यमिक पाठशालाओं में 14173, शिक्षक हैं। ये आंकड़े शिक्षा विभाग की ओर से दिसंबर 2016 तक यू डायस पर अपलोड डाटा से लिए गए हैं। जबकि पिछले 6 माह के दौरान विभिन्न श्रेणी में स्कूलों में शिक्षक रखे गए हैं। ऐसे में वर्तमान में करीब 75 हजार शिक्षक स्कूलों में छात्रों के भविष्य का निर्माण करने में लगे हैं, जबकि निजी स्कूलों में यह आंकड़ा 50 हजार के करीब है। शिक्षक वर्ग  ने ऐसी शख्सियत प्रदेश को दी है, जिन्होंने न केवल स्कूलों में रहकर बच्चों के भविष्य को संवारा बल्कि प्रदेश के निर्माण व विकास को एक नई दिशा दी। पूर्व शिक्षा मंत्री राधा रमण शास्त्री राजनीति में आने से पूर्व शिक्षक रहे। पूर्व शिक्षा मंत्री स्व. आईडी धीमान तथा पूर्व मुख्यमंत्री पे्रम कुमार धूमल भी इस वर्ग की देन हैं।

स्कूली शिक्षा की नींव ही कच्ची

प्रदेश में हालत ये हैं कि प्राथमिक स्तर की शिक्षा में गुणवत्ता का स्तर कम है। प्राथमिक शिक्षा में अचानक कोई गिरावट नहीं आई है, बल्कि पहली कक्षा से ही नींव का कमजोर होना इसका कारण है। सरकारी पाठशालाओं में पढ़ रहे बच्चों के शिक्षा स्तर को निम्न आंका जा रहा है। प्राथमिक स्तर पर ही जब छात्र की नींव मजबूत नहीं होगी, तो उच्च शिक्षा में बेहतर प्रदर्शन की बात करना ही संभव नहीं है।

आर्थिक स्थिति बेहतर

हिमाचल राजकीय अध्यापकसंघ के  प्रदेशाध्यक्ष वीरेंद्र चौहान ने कहा कि शिक्षक देश के भविष्य का निर्माणकर्ता होता है। देश में जो भी ब्यूरोक्रेट, नेता, अधिकारी हुए हैं, वे किसी न किसी शिक्षक के शिष्य रहे हैं। ऐसे में शिक्षकों को अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी कि वे महज बच्चों को नहीं पढ़ाते, बल्कि देश के निर्माण की नींव रखते हैं। आज शिक्षकों और छात्रों पर दबाव बहुत अधिक है।  शिक्षकों आर्थिक स्थिति बेहतर ही नहीं बल्कि काफी बेहतर हैं। सरकारी सुविधाएं भी हैं, लेकिन उसी क्रम में दबाव भी है। इन सब के बीच भी शिक्षक को अपना कर्त्तव्य निभाना होता है। पहले सुविधाएं कम थीं, लेकिन शिक्षकों में डेडीकेशन थी ,जो आज के इस दौर में कहीं न कहीं गुम हो चुकी है। आज की नीतियों में कुछ चीजें अच्छी हैं, तो कुछ खामियां भी हैं। ऐसा कई बार होता है , जब किसी छोटे से हक को पाने के लिए शिक्षकों को सड़कों पर उतरना पड़ता है।

वेतन में जमीन-आसमान का अंतर

निजी स्कूलों में  वरिष्ठ माध्यमिक स्कूलों में शिक्षकों को आठ हजार से 15 हजार तक वेतन मिलता है। हालांकि गिनती के कुछ बड़े स्कूलों में स्थिति बेहतर है, लेकिन अधिकतर निजी स्कूलों में 8 से 15 हजार में ही निजी शिक्षक काम करते हैं। जबकि सरकारी स्कूलों में जेबीटी को अनुबंध पर शुरुआत में 13 हजार 500 वेतन मिलता है, जबकि तीन साल बाद नियमितीकरण जो पहले पांच साल था उस पर करीब 25 हजार रूपए मासिक वेतन मिलते हैं, जबकि बाकी अन्य लाभ सो अलग। वहीं प्रवक्ताओं और पीजीटी को 60 से 70 हजार रुपए मासिक वेतन मिलता है, जबकि निजी स्कूलों में मुश्किल से इस श्रेणी के शिक्षक को 20 से 25 हजार वेतन मिलता है।

हर साल बढ़ रही जेबीटी-बीएड की फौज

एक समय था जब  जेबीटी और बीएड करने वालों की नौकरी बतौर शिक्षक पक्की मानी जाती थी, लेकिन आज जेबीटी और बीएड की लंबी   फौज खड़ी हो गई है। आज सरकारी और निजी दोनों ही तरह से बीएड और जेबीटी होती है। निजी क्षेत्र में जेबीटी कोर्स करीब एक लाख रुपए में होता है, जबकि सरकारी खर्च महज 20 हजार है। इसके लिए डाइट में ट्रेनिंग होती है। वहीं टीजीटी और सीएंडवी बनने का सरकारी खर्च 20 से 25 हजार है, जबकि निजी क्षेत्र में यह खर्चा करीब डेढ़ लाख के आसपास बैठता है। बीएड का सरकारी खर्च 50 हजार  है , जबकि निजी क्षेत्र में बीएड करीब एक लाख में होती है।

नरेश बस्तियों में जला रहे शिक्षा की लौ

मंडी के स्कूल में बतौर शास्त्री तैनात  नरेश कुमार उन शिक्षकों के लिए मिसाल हैं जो स्कूल में छुट्टी की घंटी बजने के इंतजार में अकसर घड़ी की सूइयां ताकते रहते हैं। नरेश स्कूल में आने वाले छात्रों के अलावा उन छात्रों को भी विशेष कक्षाएं लगाकर शिक्षा प्रदान करते हैं,जो स्कूल नहीं आ सकते हैं। इसके लिए नरेश शास्त्री बस्तियों में जाकर छात्रों की कक्षाएं लगाते हैं। साथ ही साथ जो बच्चे फीस नहीं दे सकते हैं,उनकी फीस भी नरेश शास्त्री खुद भरते हैं। इनकी इसी खासियत को देखते हुए उन्हें इस बार राज्य शिक्षक सम्मान व बीते वर्ष राष्ट्रीय पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया है।

आज शिक्षकों को बेशक अधिक सुविधाएं हैं, लेकिन जिस तरह से शिक्षा प्रणाली में बदलाव आया है, उससे अधिक प्रशिक्षित शिक्षक स्कूलों में पढ़ा रहे हैं। हां , यह बात माननी होगी कि आज के शिक्षकों के मुकाबले पहले शिक्षकों में अधिक प्रोफेशनलिज्म था

नारायण सिंह हिमराल, अध्यक्ष प्राथमिक सहायक अध्यापक संघ 

शिक्षक का मुख्य मकसद बच्चों को शिक्षा प्रदान करना है। ऐसा नहीं कि आज के दौर का शिक्षक इस मकसद में कामयाब नहीं हो रहा। शिक्षक को आज भी गुरु का दर्जा प्राप्त है । ऐसे में जरूरी है कि किताबी शिक्षा के साथ-साथ गुरु का फर्ज भी शिक्षक निष्ठा से निभाएं

भूपिंद्र गुप्ता, प्रधानाचार्य आदर्श स्कूल भूमति (सोलन)  राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित

आज की शिक्षा पद्धति और पहले की शिक्षा में काफी अंतर है। पहले शिक्षकों का मुख्य मकसद गुरु के तौर पर बच्चों में शिक्षा के साथ-साथ संस्कार का निर्माण करना होता था, लेकिन आज के दौर में शिक्षकों पर छात्रों को प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए तैयार करने का दबाव अधिक रहता है। ऐसे में आज शिक्षकों और छात्रों पर भविष्य निर्माण से ज्यादा सफलता प्राप्त करने का दबाव है, जिससे शिक्षा और संस्कारों के बीच का संतुलन कहीं डगमगाने लगा है

पे्रम राज शर्मा, योग शिक्षक व राज्य पुरस्कार से सम्मानित

ये हैं मांगें

विभिन्न वर्गों के शिक्षक आज भी कई मांगों को लेकर हक की लड़ाई लड़ रहे हैं। इसमें 4-9-14 से संबंधित जुलाई 2014 और सितंबर 14 की अधिसूचना को वापस लेना, संशोधित गे्रड पे लागू करना, शिक्षकों की जेसीसी बुलाना, पुरानी पेंशन योजना बहाल करना, शिक्षकों के लिए स्थानांतरण नीति लाना, प्रवक्ता पदनाम बहाल करना, पहली से आठवीं तक प्रारंभिक शिक्षा लागू करना, सेवानिवृत्ति आयु बढ़ाना समेत अन्य मांगें शामिल हैं।  पैट, पैरा, पीटीए, एमएमसी लंबे समय से नियमितिकरण की मांग कर रहे हैं।

पढ़ाई से ज्यादा सियासत…

हिमाचल प्रदेश में शिक्षक छात्रों को पढ़ाने की जगह ज्यादातर समय राजनीति में लगा रहे हैं। शिक्षक अपनी मांगों को लेकर आए दिन किसी न किसी राजनीतिक नेता को मांगपत्र सौंपते नजर आते हैं। मात्र अपने हितों के लिए शिक्षक राजनीति में संलिप्त होते जा रहे हैं। प्रदेश में 60 हजार के करीब शिक्षक हैं और  चुनावों के समय इन शिक्षकों की अहमियत भी बढ़ जाती है। सभी राजनीतिक दल शिक्षक संघों को अपनी तरफ खींचने के लिए इनकी मांगों को प्रमुखता से पूरा करने का आश्वासन देते रहते हैं।  शिक्षकों पर राजनीति का हावी होना इस लिए भी जायज है, क्योंकि अधिकतर शिक्षक तो अपने ही इलाकों में ही नियुक्तियां पाना चाहते हैं। ऐसे में किसी न किसी राजनीतिक दल से जुड़ कर अपनी सेटलमेंट इन स्कूलों में करवाने में लगे रहते हैं। प्रदेश में शिक्षक संघ अपनी मांगों को लेकर साल भर संघर्षरत रहते हैं। आए दिन धरना-प्रदर्शन कर अपनी मांगों को मनवाने के लिए सरकार और शिक्षा विभाग पर दबाव बनाते रहते हैं। अभी हाल ही में होने वाले विधानसभा चुनावों के लिए भी शिक्षक संघ ने अपनी मांगों का मांग पत्र कांग्रेस और भाजपा को अपने चुनावी घोषणा पत्र में शामिल करने के लिए थमा दिया है। इसके साथ ही संघों ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि वे अपना समर्थन उसी दल को देंगे, जो उनकी मांगों को घोषणा पत्र में स्थान देगा। यह बात स्पष्ट है कि शिक्षक स्कूलों में पढ़ाई में कम अपने हित साधने के लिए राजनीति में ज्यादा सक्रिय रहते हैं। बात चाहे किसी भी राजनीतिक दल की हो, शिक्षक हर जगह अपनी पैठ बनाए हुए हैं।

हिमाचल में 40 संघ एक्टिव

रजिस्टर्ड टीचर्ज एसोसिएशन-14

हिमाचल प्रदेश में शिक्षा के क्षेत्र में  वर्तमान में 40 से अधिक शिक्षक संघ सक्रिय हैं। विभिन्न पदनामों के शिक्षकों ने अपना एक अलग ही संगठन बना लिया है।  जानकारी के अनुसार प्रदेश में शिक्षकों के 14 के करीब संगठन पंजीकृत हैं। इनमें से सबसे बड़ा संगठन प्रदेश राजकीय शिक्षक संघ है।  इस संगठन का गठन 14 अक्तूबर, 1957 को किया गया था और इस संगठन को कानूनी रूप से मान्यता प्रदान की गई है। इसके अलावा इक्का-दुक्का संगठन ही हैं, जिन्हें रजिस्टर्ड करवाया गया है। इसके अलावा भी बाकी संगठन जो चल रहे हैं, वे मात्र कागजों तक ही सीमित हैं। ये संगठन अपनी-अपनी मांगों को लेकर वर्ष भर सक्रिय रहते हैं। वर्तमान में जेबीटी, टीजीटी, पैरा टीचर, सी एंड वी, डीपीई, एसएमसी, पीटीए, हैडमास्टर एवं प्रिंसीपल सहित कई अनेक संगठनों की फौज वर्तमान में प्रदेश में खड़ी हो गई है। हर संघ अपनी मांगों को लेकर सरकार के समक्ष गुहार लगाता रहता है। नियुक्तियों से लेकर नियमितीकरण, वेतनमान जैसी अन्य मांगों को लेकर संगठन आए दिन संघर्ष करते रहते हैं। शिक्षक मांगों को मनवाने के लिए धरना-प्रदर्शन के अलावा भूख हड़ताल तक करते आए हैं।

सबसे बड़ा राजकीय शिक्षक संघ

अपने हकों के लिए संघर्षरत

प्रदेश में प्राथमिक स्कूलों में तैनात संघों की संख्या छह से अधिक है, जबकि जमा दो तक के स्कूलों में पढ़ाने वाले शिक्षकों के 30 से अधिक शिक्षक संघ हैं। संघ केवल अपने ही हितों और समस्या की बात  हमेशा अपने मंचों से उठाते आए हैं, लेकिन शिक्षा के स्तर और स्कूलों में बेहतर शिक्षा किस तरह से दी जा सकती है, इसके लिए मात्र इक्का-दुक्का संघ ही आवाज उठाते हैं। हालात ये हैं कि प्रदेश में शिक्षक संघों के आंकड़ों को जोड़ कर देखें, तो राज्य के स्कूलों में तैनात शिक्षकों से भी कहीं अधिक संख्या सामने आती हैं।

विभिन्न संगठनों से जुड़ रहे टीचर

प्रदेश राजकीय शिक्षक संघ के प्रदेश अध्यक्ष वीरेंद्र चौहान का कहना  है कि प्रदेश में शिक्षकों के संघों की संख्या तो 40 से अधिक है, लेकिन मात्र कुछ ही संगठन ऐसे हैं, जो पंजीकृत हैं। उनका कहना है कि आज के समय में हर एक वर्ग के शिक्षकों ने अपना एक संघ बना लिया है और अन्य शिक्षक भी अन्य संघों की सदस्यता लेते रहते हैं, जबकि यह मांग भी उठाई जा चुकी है कि एक शिक्षक मात्र एक संघ की सदस्यता ले सकता है, लेकिन यह मांग पूरी नहीं हो रही है।

… तो निजी स्कूल बेहतर

शिक्षकोें की आर्थिक और सामाजिक यहां तक कि काम करने की परिस्थितियों में काफी अंतर है।  प्रदेश में सरकारी स्कूल में शिक्षक स्कूल शुरू होने से करीब आधा घंटा या 15 मिनट पहले ही स्कूल पहुंचते हैं, जबकि निजी स्कूल सुबह 8 बजे खुल जाते हैं । निजी स्कूलों में बच्चों को घर पर दिए जाने वाले काम को डायरी पर लिखा जाता है, जबकि सरकारी स्कूलों में ऐसी व्यवस्था नहीं है। सरकारी स्कूलों में लापरवाही पर अधिक से अधिक तबादला हो जाता है, लेकिन निजी स्कूलों में शिक्षक को नौकरी से हाथ धोना पड़ता है। यही कारण है कि निजी स्कूलों में पढ़ाई का स्तर ऊंचा हो रहा है। प्रदेश में सरकारी स्कूल में शिक्षक बनने के लिए बीएड, टीईटी, जेबीटी जैसी शर्तें हैं। इसके अलावा जो  शिक्षक लोक सेवा आयोग के माध्यम से नियुक्त हुए हैं,उनकी आर्थिक स्थिति निजी स्कूलों में काम करने वाले शिक्षकों से कहीं बेहतर है।  पैट, पीटीए व पैरा और एसएमसी वर्ग के शिक्षक आज भी अपने हक की लड़ाई लड़ रहे हैं।

सरकारी स्कूलों में स्टाफ कम

प्रदेशभर में लगभग 70 प्रतिशत सरकारी पाठशालाएं एक या दो अध्यापकों की देखरेख में चल रही हैं। इस व्यवस्था से छात्रों को बेहतर शिक्षा नहीं मिल पा रही है। अधिकतर प्राथमिक पाठशालाओं में यही हालात देखने को मिल रहे हैं कि एक या दो शिक्षक ही पांचवीं कक्षा तक के छात्रों को पढ़ा रहे हैं, इसके अलावा शिक्षकों पर कागजी काम का बोझ अधिक है। इसके साथ ही  शैक्षणिक सुधारों के अभाव तथा सरकारी स्कूलों में लागू आठवीं तक  छात्रों को फेल न करने की नीति  की वजह से गुणवत्ता में सुधार नहीं हो रहा है।

दक्षता लाने के लिए होती है ट्रेनिंग

शिक्षकों में नई तकनीक और दक्षता लाने के लिए शिक्षा विभाग समय-समय शिक्षकों के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम चला रहा है। इन कार्यक्रमों के तहत शिक्षकों को शिक्षा की नई तकनीकों और छात्रों को पढ़ाने के नए तरीकों के बारे में अवगत करवाया जाता है। सर्वशिक्षा अभियान और राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान के तहत स्कूल शिक्षकों के प्रशिक्षण के लिए तय समय अवधि के प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाए जाते हैं। इसके अलावा शिक्षक और गैर शिक्षक वर्ग के लिए हिप्पा शिमला, जीसीटीई धर्मशाला, सीसीआरटी, आरआईई से विभिन्न प्रकार की ट्रेनिंग करवाई  जाती है ।

शिक्षा में सुधार के प्रयास नाकाफी

सरकार की तरफ से अब शिक्षा के स्तर को सुधारने के लिए कुछ कार्यक्रम शुरू किए गए हैं, लेकिन वे भी नाकाफी है। बात की जाए सुधारों की तो इसमें  निचली कक्षाओं में पहली से पांचवीं तक के बच्चों के लिए एक साल पहले तक प्रेरणा कार्यक्रम शुरू किया गया। अब प्रेरणा प्लस कार्यक्रम है। पांचवीं से आठवीं कक्षा तक के बच्चों के लिए प्रयास प्लस और नौवीं व दसवीं के लिए प्रयास प्लस-प्लस कार्यक्रम चलाया गया है। शिक्षा में गुणात्मक सुधार लाने के लिए भी शिक्षकों की जवाबदेही सुनिश्चित की गई है। इसके साथ ही स्कूलों में प्री-नर्सरी कक्षाएं शुरू करने की पहल शुरू कर दी है, लेकिन शिक्षा में सुधार के लिए जरूरी है कि सरकार अपनी शिक्षा की नीति में आवश्यक बदलाव करे।

सुधार के लिए नहीं बनी पालिसी

शिक्षा के क्षेत्र में भले ही देश भर में हिमाचल को दूसरा स्थान मिला है, लेकिन वास्तविकता यही है कि प्रदेश में शिक्षा का स्तर गिरता जा रहा है। बीते वर्ष का परीक्षा परिणाम ही प्रदेश में शिक्षा के आकलन के लिए काफी है, जिसकी गाज शिक्षकों पर गिरी है। प्रदेश में शिक्षा के लिए अभी तक कोई सुदृढ़ नीति सरकार द्वारा नहीं बनाई गई है। हालांकि अब शिक्षा के स्तर को उठाने के लिए सरकार कदम उठा रही है। प्रदेश में सरकारी स्कूलों में शिक्षा मुफ्त है। छात्रों को स्कूलों में मुफ्त किताबें भी दी जा रही हैं, वर्दी मुहैया करवाई जा रही है, यहां तक कि सरकारी स्कूलों में छात्रों को दिन का भोजन भी दिया जा रहा है। यही नहीं, छात्रों को बस में यात्रा की निःशुल्क सुविधा दी जा रही है। इसके बावजूद शिक्षा के स्तर में सुधार नहीं आ पाया है। सरकारी स्कूलों की जगह अभिभावक निजी स्कूलों की तरफ जा रहे हैं।

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