हां… मैं कर्मचारी हूं

Oct 23rd, 2017 12:05 am

सरकार बनाने या गिराने में अहम भूमिका निभाने वाले हिमाचल प्रदेश के करीब पांच लाख मुलाजिम राज्य के विकास का रथ हांक रहे हैं। यही वह वर्ग है, जिसके दम पर सियासी दल सत्ता की नींव रखते हैं। कर्मचारियों के योगदान को बता रहे हैं…

शकील कुरैशी

कर्मचारी हिमाचल प्रदेश की रीढ़ हैं। न केवल सरकारी कर्मचारी, बल्कि निजी क्षेत्र के कर्मचारी भी हिमाचल की पृष्ठभूमि से जुड़े हुए हैं। हिमाचल के निर्माण में कर्मचारी वर्ग का बेहद बड़ा सहयोग रहा है, जो सालों से यहां की राजनीति पर भी अपना पूरा दबदबा रखते हैं। इनके बूते सरकारें बनती हैं और उजड़ जाती हैं। किसी भी राजनीतिक दल की सरकार हो, कर्मचारियों को खुश करने के लिए वह हमेशा तोहफे देती रही है। पंजाब में जिस तरह से कर्मचारियों को खुश करके  अकाली-भाजपा की सरकार लगातार दूसरी दफा जीत दर्ज करने में सफल रही थी, उसी तरह यहां पर भी इसके प्रयास होते रहे हैं, जिस पर मौजूदा प्रदेश कांगे्रस सरकार ने भी कुछ प्रयास किए, परंतु यहां सरकारों के बदलने का क्रम रहता है।

धड़ों में बंटे मुलाजिम

पहले कर्मचारियों की जो एकता यहां थी, वह आज के दौर में नहीं है। वर्तमान में कर्मचारी राजनीति पूरी तरह से बंट चुकी है और इसका पूरा श्रेय राजनीतिक दलों को जाता है, जिन्होंने कर्मचारी नेताओं पर अपने ठप्पे लगा दिए। ठप्पा लगने के बाद आज के दौर में कर्मचारी एक नहीं हैं, जबकि  पहले इनकी एकता के चलते यहां सरकारें दबाव में रहती थीं। वर्तमान में कर्मचारी राजनीति कई पासों में बंटी हुई है। कोई कर्मचारी नेता कांग्रेस का है तो कोई भाजपा का है। वहीं, कई कामरेड है,ं तो कई भारतीय मजदूर संघ से जुड़े हुए हैं। पूरी तरह से कर्मचारी राजनीति धडे़बाजी में फंस चुकी है, जिसका लाभ यहां के राजनीतिक दल उठाते हैं।

1978 में एक हुए थे कर्मचारी

कर्मचारियों के इतिहास की बात करें तो वर्ष 1978 में प्रदेश के सरकारी क्षेत्र के कर्मचारी एकजुट हुए थे। उस समय कर्मचारी महासंघ के बैनर तले कर्मचारियों को एकजुट किया गया था। तत्कालीन कर्मचारी नेता रमेश चंद्रा, रणजीत सिंह, मधुकर आदि ने कर्मचारियों को एकजुट करने में अहम रोल अदा किया था। उस दौरान प्रदेश में कर्मचारियों  के आंदोलन शुरू हुए, जब एक कर्मचारी की जान भी गई, जिसके बाद वर्ष 1980 में एक बड़ा आंदोलन हुआ। इस संघर्ष के दौरान यहां पुलिस के साथ सेना के जवानों की भी मदद लेनी पड़ी। कई लोग बगावत करने पर जेल में गए, वहीं पांच लोगों को गोलियों का शिकार भी होना पड़ा। आज तक उनको याद किया जाता है, जिनकी याद में सुंदरनगर में एक शहीद स्मारक भी कर्मचारियों ने बना रखा है।

हिमाचल में दो लाख 68 हजार सरकारी कर्मचारी

पहाड़ी प्रदेश के निर्माण से लेकर आज तक कर्मचारी अहम भूमिका निभा रहे हैं। राज्य में सरकारी क्षेत्र में दो लाख 68 हजार कर्मचारी हैं, जबकि 1.70 लाख बोर्ड और निगमों में सेवाएं दे रहे हैं। इसके अलावा 1.43 लाख पेंशनर और बोर्ड एवं निगमों के लगभग दो लाख पेंशनर हैं। यही नहीं निजी क्षेत्र में भी दो लाख 95 हजार कर्मचारी तैनात हैं। प्रदेश में सबसे अधिक कर्मचारी शिक्षा विभाग में हैं, वहीं लोक निर्माण विभाग, आईपीएच, बिजली बोर्ड में भी कर्मचारियों की संख्या कम नहीं है।

कर्मचारी परिसंघ का अपना रोल

कर्मचारी राजनीति में कर्मचारी परिसंघ एक अलग संगठन है, जिसने महासंघ से जुदा होकर कर्मचारियों को एकजुट करने की कोशिश की। हालांकि इसे उतनी अधिक सफलता नहीं मिली, क्योंकि इसके पुराने नेता इससे छिटक गए, परंतु अभी भी यह संगठन कर्मचारी राजनीति में विनोद कुमार के दम पर खड़ा है।

रिटायरमेंट के बाद समाजसेवा

सरकारी सेवा से निवृत्त होने के बाद कर्मचारी सामाजिक क्षेत्र को भी अपनाते हैं और ऐसे बड़ी संख्या में कर्मचारी हैं जोकि समाजसेवा का जज्बा लिए काम कर रहे हैं। सेवानिवृत्त कर्मचारी न केवल पेंशनर संघों के साथ जुड़कर काम कर रहे हैं, जबकि कई विभिन्न सामाजिक संस्थाओं से भी जुड़े हुए हैं। शिक्षा विभाग से जुड़े जीवन शर्मा रिटायरमेंट के बाद बच्चों को पढ़ाने के लिए एक निजी स्कूल में सेवाएं दे रहे हैं, वहीं हरिचंद गुप्ता प्रदेश के पेंशनरों के सबसे बड़े संगठन से जुड़कर अपनी सेवाएं दे रहे हैं, तो धार्मिक व सामाजिक संस्थाओं से भी जुड़े हैं। सचिवालय की कर्मचारी राजनीति पर नजर दौड़ाएं तो यहां से मनमोहन जस्सल ने 18 साल कर्मचारी राजनीति करने के बाद अब समाजसेवा को अपनाने की बात कही है,वहीं उनसे पहले भगत राम ठाकुर समाजसेवा में जुटे हैं।

आर्थिक रूप से मजबूत कर्मचारी

प्रदेश के सरकारी कर्मचारी आर्थिक रूप से मजबूत हैं। यहां कर्मचारियों को प्रदेश सरकार ने वे सभी वित्तीय लाभ प्रदान किए हैं, जो कि दूसरे राज्यों में मिलते हैं। पंजाब का पे-कमीशन यहां पर लागू होता है और जो लाभ वहां कर्मियों को मिलते हैं, वे सभी यहां भी मिलते हैं। हालांकि यहां के कर्मचारी अब केंद्र सरकार के पे-कमीशन की मांग करने लगे हैं, क्योंकि पंजाब के वेतन आयोग में कुछ विसंगतियां हैं।

4-9-14 का लाभ नहीं

हिमाचल के कर्मचारियों को 4-9-14 का वित्तीय लाभ अभी तक नहीं मिल पाया है, जिसका वादा कांग्रेस ने किया था। इस पर अफसरशाही हावी रही है, जिस कारण यह अहम मुद्दा सुलझ नहीं पाया है। इस वित्तीय लाभ से यहां के कमचारी अछूते हैं, जबकि पेंशनरों की 5-10-15 फीसदी की पेंशन वृद्धि नहीं मिल सकी। दोनों वर्गों के ये दो बड़े मुद्दे हैं, जो चुनाव में भी प्रभाव डाल सकते हैं। इससे अलग यहां कर्मियों की आर्थिक स्थिति बेहतर है।

प्राइवेट सेक्टर में महंगाई की मार

निजी क्षेत्र की बात करें तो निजी क्षेत्र में भी कर्मचारियों को तय नियमों के मुताबिक पैसा मिल रहा है। यहां उद्योगों पर सरकार ने सभी नियमों को लागू करने की पाबंदी लगा रखी है, जिससे इस क्षेत्र में भी कर्मचारी काफी हद तक खुद को सुरक्षित महसूस करते हैं। वैसे बढ़ती हुई महंगाई की ज्यादा मार निजी क्षेत्र पर ही है। हालांकि दिहाड़ी को देखा जाए तो दूसरे राज्यों से यहां पर दिहाड़ी कम है, और दूसरे राज्यों के समान दिहाड़ी बढ़ाने की मांग यहां के मजदूर लगातार कर रहे हैं।

राजनीति में कर्मचारियों का रोल

जिस तरह से कर्मचारियों को राजनीतिज्ञों ने बांट रखा है, उसका असर राजनीति पर भी पड़ता है। यहां कर्मचारी भी राजनीति में बंटे हुए हैं। कर्मचारी अपने लाभ देखते हुए भी फैसला लेते हैं कि उनको किस दल का साथ देना है। यही कारण है कि सरकार कर्मचारियों को खुश करने की कोई कसर नहीं छोड़ती। मौजूदा सरकार ने ऐसे कई काम किए हैं, जो सीधे कर्मचारियों को प्रभावित करते हैं। कर्मचारियों के कई ऐसे वर्ग हैं, जिनके द्वारा जो मांगें उठाई गईं, उनको पूरा किया गया है। ऐसे में उन कर्मचारियों का साथ सरकार को मिलेगा या नहीं, यह चुनाव में तय होगा।

नहीं हो पाई जेसीसी की बैठक

मौजूदा सरकार में भी कर्मचारियों की धड़ेबाजी किसी से छिपी नहीं है। इस कारण से यहां जेसीसी की एक ही बैठक हो सकी और कई जिलों में तो ये बैठकें ही नहीं हुईं, जिससे वहां के कर्मचारियों के स्थानीय मुद्दे प्रशासन के समक्ष नहीं उठ सके। इसका मलाल खुद महासंघ के बड़े नेताआें को भी है, जो कि दो गुटों में बंटे रहे हैं। अब स्थानीय स्तर की राजनीति पर इसका असर जरूर दिखाई देगा।

घोषणा पत्र में विशेष स्थान

यही नहीं, कर्मचारियों के लिए राजनीतिक दल विशेष रूप से अपने घोषणा पत्र में कई वादे करते हैं। जो कुछ काम सरकार नहीं कर पाई, उन वादों को घोषणा पत्रों में जगह देकर कर्मचारी वर्गों को लुभाने की कोशिशें की जाती हैं। इस तरह कहा जा सकता है कि कर्मचारियों का चुनाव या उसकी राजनीति पर पूरा दखल रहता है। राज्य में बिजली बोर्ड की भी अलग राजनीति है, जहां पर 18 हजार से अधिक कर्मचारी तैनात हैं।  हरेक वर्ग की संख्या को देखते हुए राजनीतिक दलों को उनकी मांगों के अनुरूप घोषणाएं करनी पड़ती हैं।

50 से ज्यादा कर्मचारी-मजदूर संघ

सरकार या प्रशासन पर दबाव बनाने के लिए कर्मचारी या मजदूर अपने संगठन खड़े करते हैं। इन संगठनों को खड़ा करने के पीछे राजनीतिक कारण भी काफी हद तक रहते हैं। कोई न कोई संगठन किसी न किसी राजनीतिक दल से जुड़ा हुआ है, जिसमें खासकर मजदूर संगठन शामिल हैं और उनसे जुड़े लोग राजनीतिक आकाओं के इशारे पर एक-दूसरे की सरकार पर दबाव बनाने के लिए रणनीति बनाते हैं, संघर्ष करते हैं और अपनी मांगों को सामने रख देते हैं। राजनीति से जुड़े बड़े संगठनों की बात करें तो अर्द्धसरकारी क्षेत्र यानी निगमों या बोर्डों में इंटक, भारतीय मजदूर संघ, एटक बड़े संगठन हैं। इंटक सीधे रूप से कांग्रेस से जुड़ा हुआ संगठन है, जिसे यदि कांग्रेस की सरकार बने तो मान्यता मिलती है। इसी तरह से यदि भाजपा की सरकार बने तो भारतीय मजदूर संघ को मान्यता दी जाती है, जो कि उससे जुड़ा हुआ है। इन्होंने आगे निगमों व बोर्डों में अपनी इकाइयां खड़ी कर रखी हैं, जिनमें इनसे जुड़े कर्मचारी कार्यरत हैं। माकपा का भी अपना अलग विंग है।  इसी तरह से निजी क्षेत्र में भी ये तीनों संगठन मजदूरों को खुद से जोड़े हुए हैं। किसी भी बिजली परियोजना में कोई आंदोलन होता है तो उसमें इन तीनों संगठनों की अलग-अलग भूमिका रहती है। ऐसे कई आंदोलन इनके जरिए यहां पर हो चुके हैं और ये सभी दबाव की राजनीति को अपनाते हैं। कोई भी संगठन हड़ताल कर देता है, ताकि उनकी मांगों को माना जाए । उसका समकक्ष मजदूर संघ तब प्रबंधकों के साथ में रहता है। ऐसे हर एक संगठन अपनी-अपनी रणनीति पर काम करता है। सरकार विभागों में भी इस तरह की कई यूनियनें गुटों में बंटी हुई हैं। सबसे अधिक यूनियनें शिक्षा विभाग में हैं, जहां पर हर अध्यापक वर्ग का अपना संगठन है। गाहे-बगाहे इनके आंदोलन चलते ही रहते हैं और ये लोग लगातार सरकारों पर दबाव बनाने की कोशिशें करते हैं।  प्रदेश में इस तरह से सरकारी क्षेत्र में करीब 50 से ज्यादा कर्मचारी संगठन व यूनियनें हैं, जो कि अपनी मांगों को मनवाने के लिए सरकार व विभाग पर दबाव बनाने का काम करती हैं। इसी तरह से निजी क्षेत्र में भी हर वर्ग की अपनी यूनियन है, जिसका भी यही काम रहता है। एचआरटीसी की बात करें तो यहां पर भी भारतीय मजदूर संघ, इंटक व एटक की यूनियनें चल रही हैं।

‘नो वर्क-नो पे’ से हल्की हुई कर्मचारी राजनीति

हिमाचल प्रदेश में कर्मचारी आंदोलन, जो कि वर्ष 1978 के बाद काफी बड़ी मात्रा में होते थे और उनका बड़ा दबाव सरकार पर रहता था बाद में शांता कुमार की सरकार में कुछ ठंडे पड़े। तत्कालीन मुख्यमंत्री शांता कुमार ने हिमाचल प्रदेश में कर्मचारी राजनीति को क्षीण करने के लिए नो वर्क, नो पे का फार्मूला लागू किया, जिसे आज सभी को मानना पड़ रहा है। आज इसी फार्मूले को पूरे देश में माना जा रहा है, जिसकी शुरुआत हिमाचल से की गई। यहां के कर्मचारी अब इस तरह का आंदोलन नहीं कर पाते, जैसा पहले किया करते थे। तब हड़ताल में कर्मचारियों की जान तक चली गई, लेकिन अब सांकेतिक हड़तालें होती हैं और कोई इतना बड़ा आंदोलन यहां पर नहीं होता। ऐसे में सरकार को थोड़ा आराम जरूर है, लेकिन फिर भी सरकार दवाब में रहती जरूर है। यहां कभी न कभी किसी न किसी विभागीय कार्यालय के बाहर खासकर शिमला में सरकार के खिलाफ नारेबाजी होती रहती है। इसके साथ ये कर्मचारी सांकेतिक हड़ताल के रूप में सचिवालय के घेराव के लिए पहुंचते हैं।

सियासत के मारे कर्मी बेचारे

पूर्व में कर्मचारियों के संघर्ष के आगे तत्कालीन राम लाल ठाकुर की सरकार को घुटने टेकने पड़े थे। बताया जाता है कि हिमाचल प्रदेश का वह कर्मचारी आंदोलन इतना बड़ा था कि राष्ट्रीय स्तर पर उसका रिकार्ड बना। तब 99.7 फीसदी कर्मचारी संघर्ष पर उतर आए थे और इक्का-दुक्का ही उनके साथ नहीं थे। तभी से कर्मचारियों का दबदबा बना, लेकिन धीरे-धीरे ये लोग राजनीति का शिकार हो गए।

ये रहे महासंघ के नेता

कर्मचारी महासंघ जो कभी एक था, तब संघ के नेताओं की तूती बोलती थी। इसके नेताओं में रमेश चंद्रा, रणजीत सिंह, मधुकर, रणजीत सिंह कंवर, गोपाल दास वर्मा, गंगा सिंह, लक्ष्मी सिंह मच्छान, प्रेम सिंह भरमौरिया, सुरेंद्र ठाकुर और अब एसएस जोगटा हैं। महासंघ को बाकायदा प्रदेश सरकार से मान्यता दी जाती है।

मंत्री भी बने कई कर्मचारी नेता

कर्मचारियों की बड़े ओहदों तक पहुंचने की बात करें तो स्वर्गीय रणजीत सिंह मंत्री पद तक पहुंचे। वहीं, कांगड़ा जिला से चौधरी विद्यासागर प्रदेश में स्वास्थ्य और कृषि मंत्री भी रहे। स्वर्गीय मधुकर को सरकार ने पर्यटन निगम का उपाध्यक्ष बनाया, जिन्होंने पंडित सुखराम के खिलाफ चुनाव भी लड़ा। इनके अलावा घनश्याम शर्मा को पेंशनर कल्याण बोर्ड का उपाध्यक्ष बनाया गया, जिसके बाद सुरेंद्र मनकोटिया ने भी इस बोर्ड का नेतृत्व किया। वर्तमान में वह कांग्रेस टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं। गोबिंद राम शर्मा अर्की से दो दफा विधायक रहे, वहीं सांसद रामस्वरूप शर्मा भी एक बिजली प्रोजेक्ट में तैनात थे।

धावक जीत राम, क्रिकेटर सुषमा वर्मा भी दे रहे सेवाएं

राज्य सचिवालय में कार्यरत जीत राम अंतरराष्ट्रीय स्तर के धावक हैं। उन्होंने कई ऐसी अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धाओं में मुकाम हासिल किया है, जहां तक हिमाचल से कोई नहीं पहुंच पाया। जीत राम के नाम कई बड़ी उपलब्धियां हैं, जिन्होंने एशियन गेम्स में भी नाम कमाया है। हाल ही में सरकार ने सुषमा वर्मा, जोकि महिला क्रिकेट वर्ल्ड कप खेल चुकी हैं, को प्रदेश पुलिस में डीएसपी के पद पर लगाया है। इनसे पहले यहां सुमन रावत ऐसी महिला एथलीट रही हैं, जिन्होंने अर्जुन अवार्ड जीता था। सुमन रावत को हिमाचल की उड़नपरी के नाम से भी जाना जाता है। वर्तमान में वह खेल विभाग की संयुक्त निदेशक भी हैं। ऐसे कई नाम खेल जगत से हैं, जो कि हिमाचल सरकार में सेवाएं दे रहे हैं।

भाजपा पर भारी पड़ सकती है अनदेखी

मौजूदा विधानसभा चुनावों में टिकट आबंटन में भाजपा पर कर्मचारियों की अनदेखी भारी पड़ सकती है। क्योंकि पार्टी में कई पूर्व कर्मचारियों ने टिकट के लिए आवेदन किया था, पर कुछ एक को ही तरजीह दी गई है।

कर्मचारी प्रदेश की रीढ़ हैं, जिनको साथ लेकर चलना किसी भी राजनीतिक दल के लिए जरूरी है। मौजूदा सरकार कर्मचारियों को उनको सम्मान देने में असफल रही है। न तो नियमित कर्मचारियों को लाभ दिए गए और न ही पेंशनरों को ही लाभ मिले घनश्याम शर्मा, कर्मचारी-पेंशनर कल्याण बोर्ड के पूर्व उपाध्यक्ष

कर्मचारियों के बिना कोई भी सरकार आगे नहीं बढ़ सकती। महासंघ को मान्यता देकर सरकार ने उसका सम्मान बढ़ाया है। कर्मचारियों ने जो मांगा, उन्हें मिला है। कुछ मामले हैं, जिन पर बात नहीं बन सकी, जिसके लिए अफसरशाही दोषी है। 4-9-14 और रिटायरमेंट आयु बढ़ाने की दो प्रमुख मांगें थीं, जो पूरी नहीं हुईं। इसके अलावा जो मांगा, वह मिला है

एसएस जोगटा; अध्यक्ष, महासंघ

मौजूदा दौर में कर्मचारियों का उत्पीड़न इस सरकार की सबसे बड़ी नाकामी रही है। कर्मचारी अपनी मांगों को उठाते रहे, लेकिन उनको प्रताडि़त किया जाता रहा। एक्सटेंशन देकर सरकार चलती रही। कर्मचारियों के साथ गलत व्यवहार किया गया

विनोद कुमार; अध्यक्ष, कर्मचारी परिसंघ

 

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