हां… मैं जाट हूं

शिव की जटाओं से खास रिश्ता है, तो पांडवों को महाभारत जिताकर ज्येष्ठ कहलाने वाले श्रीकृष्ण से गहरा नाता…। वीर हूं, दिलेर-दयावान हूं, मगर जिद्दी भी हूं…। हां मैं जाट हूं। जी हां, यही संकल्प लेकर हिमाचल का  सवा लाख आबादी वाला  जाट समुदाय अपने शौर्य से  दुनिया भर में देवभूमि को गौरवान्वित कर रहा है… समुदाय की उपलब्धियों को बता रहे हैं     वरिष्ठ

उपसंपादक जीवन ऋषि…

* प्रदेश की तरक्की में अहम रोल अदा कर रहे सवा लाख जाट

*  ऊना जिला में है समुदाय की सबसे ज्यादा 20 हजार आबादी

*  सेना में जाना जुनून, खेती के लिए जान छिड़क मिलता सुकून

* राजनीति से दूर, अब तक मनजीत डोगरा ही बन पाए एमएलए

हिमाचल में भले ही जाट समुदाय की आबादी डेढ़ लाख के करीब है, लेकिन अपनी दिलेरी और जुझारूपन के चलते यह देवभूमि की शान है। कहने को संख्या में ये प्रदेश का एक फीसदी हैं, लेकिन ‘जय जवान जय किसान’ के नारे को साकार करने में जाटों का अहम रोल है। सेना में शामिल होना समुदाय के युवाओं की पहली पसंद है,तो खेती से खास प्यार है। रियासतकाल हो या मुगलकाल, अंग्रेजी हुकूमत हो या उसके बाद देश की खातिर कुर्बानी देने में हमेशा जाट समुदाय अग्रणी रहा है। माना जाता है कि हिमाचल से रियालच परिवार के कई सूरमां महाराजा रणजीत के सुरक्षा कर्मी रहे। शेर-ए-पंजाब के राज्य की सीमाओं को अफगानिस्तान से लेकर बर्मा तक पहुंचाने में इस वर्ग का बड़ा योगदान रहा है। बाद में ब्रिटिश हुकूमत से टक्कर लेकर आजादी की लड़ाई में कई जाट सूरमाओं ने कीर्तिमान स्थापित किए। आजादी के बाद अब तक विभिन्न क्षेत्रों में मेहनतकश जाट हिमाचल का मान बढ़ा रहे हैं। दूसरी ओर राजनीति से जाट खुद को दूर रखते हैं,यही वजह है कि समुदाय से हिमाचल में मनजीत डोगरा एकमात्र नेता हैं,जो दो बार विधायक बने हैं।  ओबीसी  के तहत आने वाली जातियों में जाट सनातन और सिख,दोनों धर्माें को मानते हैं। मौजूदा समय में प्रदेश में जाट कल्याण परिषद भी है,जो दहेज-नशे के खिलाफ योजनाबद्ध तरीके से काम कर रही है। समुदाय से कई लोग डाक्टर,वकील और अन्य प्रशासनिक पदों पर रंहकर भी सेवाएं दे रहे हैं।

हिमाचल के ऊना जिला में जाटों की आबादी 20 हजार से ज्यादा है। प्रदेश के किसी जिला से यह प्रदेश में सबसे ज्यादा आंकड़ा है। इसी तरह कांगड़ा जिला में जाटों की संख्या 12 हजार से ज्यादा है। इसके अलावा चंबा,हमीरपुर,सोलन,सिरमौर,कुल्लू और शिमला आदि के कई हिस्सों में जाट समुदाय के लोग हैं। जाट समुदाय में आने वाली कई जातियां हैं। इनमें गिल,माहल,मान, बराड़, कौंडल, कोंडल, सयाल, रियार, कंग, रंधावा, संधू, संधु, सिद्दू, सहोता, भाटी, खैरे, बादल, चावला, कांगरी, नेरा, भक्कल, दयाल, काहलों, नंदा, बैंस, डढवाल, रियालच व बग्गा आदि हैं। जहां तक जाटों के इतिहास का सवाल है,तो यह क्षत्रिय वर्ण के हैं। महाभारत काल में हिमाचल के जनपदों का जिक्र मिलता है। उस   समय कुलूत मौजूदाकुल्लू, और त्रिगर्त  (अब कांगड़ा))  का जिक्र है। इसी तरह कुलिंडा का भी वर्णन है,यह क्षेत्र अब शिमला के पहाड़ी इलाके और सिरमौर के नाम से विख्यात हैं। चंबा-पठानकोट तक क्रमशः गब्दिका और औडुंबरा के नाम से जाने जाते थे। उक्त समुदाय के लोग मूल रूप से क्षत्रिय हैं। बाद में इन्हीं में से एक वर्ग अलग होकर जाट कहलाया। कद-काठी में बेहद आकर्षक-मजबूती इन्हें औरों से अलग बनाती है।  महाराजा रणजीत सिंह की सुरक्षा गार्द का खास हिस्सा रहे जाट वीर हरि सिंह नलवा ने उनके राज्य की सीमा को अफगानिस्तान से लेकर बर्मा तक पहुंचाने में अहम रोल अदा किया। ब्रिटिश काल में इस वर्ग के लोगों ने दहेज और सती प्रथा का हर मंच से विरोध किया। बहरहाल  हिमाचली जाट विभिन्न क्षेत्रों में देश- दुनिया में देवभूमि का नाम रोशन कर रहे हैं।

सबसे बड़ी बराड़ की दहाड़

कांगड़ा विधानसभा हलके की पलेरा पंचायत के टल्ला गांव निवासी रमेश बराड़ जाट समुदाय की शान हैं। अमूमन मीडिया से दूर रहने वाले सदर भाजपा मंडलाध्यक्ष बराड़ शांत रहकर अपने काम से पार्टी को आगे ले जा रहे हैं। यह बराड़ का ही दबदबा था कि पिछले चुनावों में उनके बूथ पर कुल पड़े 182 वोट में विरोधी पार्टी कांग्रेस को महज सात वोट मिले थे,जबकि 175 भाजपा को। यही नहीं, लोकसभा चुनावों में ही हलके से भाजपा को 19395 मतों की बढ़त मिली थी,जो बराड़ की ताकत को दिखाती है। पांच जुलाई 1962 को जन्में बराड़ समाजसेवा में हमेशा आगे रहते हैं। ओबीसी समेत पूरे समाज की तरक्की में विश्वास रखने वाले बराड़ कहते हैं कि अगर हाइकमान टिकट दे,तो वह एमएलए बनकर कांगड़ा हलके को आगे ले जाएंगे। खास बात यह है कि इन्हें 600 फोन नंबर टिप्स पर याद हैं।

सर्बजीत पिंका ः बड़े काम का यह नाम

स्मार्ट सिटी धर्मशाला के रहने वाले सर्बजीत मलूहिया उर्फ पिंका समाजसेवा में बड़ा नाम हैं। निर्धन-जरूरतमंदों की मदद में हरदम आगे रहने वाले पिंका की गिनती शहर के नामी कारोबारियों में होती है। शहर से सटे निचले सकोह में नौ मई 1964 को जन्मे पिंका युवाओं को स्वरोजगार के लिए प्रेरित करते हैं। गगल-धर्मशाला एनएच पर निचले सकोह में नए खुले होटल चांदनी के मालिक बेरोजगार युवाओं को स्वरोजगार की राह दिखा रहे हैं।

इन वीरों पर नाज

1914 से 1918 तक चले पहले विश्व युद्ध में लक्ष्मण सिंह ने शहादत पाई थी। लांस नायक हरनाम सिंह ने 1934 में शहादत पाई थी। इस जवान ने ब्रिटिश सरकार में जनरल करयापा के साथ कमीशन प्राप्त किया था।  इसके बाद करयापा रायल अकादमी ऑफ डिफेंस गए और चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ बने। इसी लड़ाई में हरनाम सिंह के दूसरे भाई बावन सिंह ने अदम्य साहस का परिचय दिया था। इन दोनों के चचेरे भाई सूबेदार मान सिंह ने 1965 की लड़ाई में पाक के सियालकोट में शहादत पाई। इनका कद छह फीट 10 इंच था।   सन् 1962 में चीन से लड़ाई हुई, तो हरनाम सिंह के बेटे रामेश्वर सिंह नायक ने शहादत का जाम पिया। सन् 1999 में जब कारगिल युद्ध हुआ,तो कैप्टन शैलेष रियालच ने अदम्य साहस का परिचय दिया, कैप्टन शैलेष इस युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए थे। इन्हें सेना शौर्य पदक मिला। सन् 1971 की लड़ाई में हमीरपुर से कर्म सिंह और पालमपुर से महिमा सिंह देश पर कुर्बान हुए। इसी युद्ध में सराह के बुद्धि सिंह ने शहादत पाई। ज्ञान सिंह और सोहन सिंह भी दूसरे महायुद्ध के बड़े नाम हैं। इनके छोटे भाई ब्लैक कैट कमांडो परस राम ने आपरेशन ब्लू स्टार लीड किया था। वहीं, कर्नल वीएस अटवाल पर भी जाट समुदाय को बड़ा नाज है।

जब इस सूरमा ने भगाया फिरंगी कर्नल

देश स्वतंत्रता की 70वीं वर्षगांठ मना रहा है। आजादी के परवानों को नमन करने का वक्त है। कई सूरमाओं के नाम सुनहरे अक्षरों में दर्ज हैं, तो कई गुमनामी में खो गए। कुछ ऐसी ही वीरगाथा है कांगड़ा जिला मुख्यालय धर्मशाला से सटे गांव सराह के जांबाज हवलदार हरनाम सिंह की, जिन्होंने फिरंगी अफसर द्वारा भारतीय सैनिकों को गाली देने पर बगावत कर दी थी। एक ऐसी बगावत, जिसके परिणाम में उन्हें कोर्ट मार्शल के बाद जेल जाना पड़ा, मेडलों के साथ नौकरी गंवानी पड़ी, लेकिन यह हिमाचली हौसला ही था, जिसने घर आने के बाद भी नौजवानों के दिलों में आजादी की मशाल अंग्रेजों की विदाई तक जलाए रखी। वर्ष 1912 में सराह गांव में जन्मे हरनाम 1932 में अंग्रेजी सेना की पंजाब रेजिमेंट में बतौर सैनिक भर्ती हुए तो महज चार साल में ही अपनी योग्यता के दम पर उन्होंने हवलदार का रैंक हासिल कर लिया। समय बीता और 1939 से 1945 तक चले दूसरे विश्व युद्ध में हरनाम ने बैल्जियम, सिंगापुर, बर्मा व मलाया जैसे देशों में लड़ाई लड़कर बहादुरी के लिए अनगिनत मेडल हासिल किए। सन् 1945 में वह अपनी बटालियन में मेरठ आए। यहां उनका रुतबा अस्थायी रूप से बटालियन हवलदार मेजर का था, जिन्हें 850 सैनिकों पर कमांड का अधिकार था। चूंकि  पंजाब रेजिमेंट के बहुत सारे जवान नेताजी की आजाद हिंद फौज से जुड़ रहे थे, ऐसे में फिरंगी उनसे नफरत करते थे। इसी कड़ी में एक दिन परेड के दौरान कर्नल रैंक के फिरंगी अफसर ने दो भारतीय सैनिकों को गालियां निकालना शुरू कर दीं, इस पर हरनाम ने विरोध जताया, तो वह उन पर ही झपट पड़ा। बस फिर क्या था, भारत माता के जयकारे लगाकर उन्होंने रायफल उठा ली। जांबाज को गुस्से में देख फिरंगी ऐसा भागा कि उसने कर्नल बैरक में जाकर शरण ली। बाद में हरनाम को अरेस्ट कर 15 दिन जेल में रखा। कोर्ट मार्शल के बाद मौत की सजा (गोली मारने) दी। खैर, बड़ी बगावत के डर से अंग्रेजों ने उन्हें माफी मंगवानी चाही, लेकिन उन्होंने साफ इनकार कर दिया। इस पर उन्हें एक्सट्रीम कंपनसेट ग्राउंड पर बिना मेडल-पेंशन घर भेजा गया, जब वह घर आए तो मां-बाप और पत्नी की मौत हो चुकी थी। घर आने पर भी आजादी तक वह अंग्रेज पुलिस-सेना के राडार पर रहे, लेकिन इस गुमनाम हीरो ने अंग्रेजों को भगाने तक युवाओं में आजादी की मशाल जलाए रखी। वर्ष 2005 में उनका निधन हो गया, लेकिन इस जांबाज ने कभी सरकार से पेंशन-भत्ते और फ्रीडम फाइटर का दर्जा नहीं मांगा।

कोई आईपीएस, कोई एचएएस

समुदाय से कई नामी हस्तियां उच्च पदों पर रहकर देश-प्रदेश की सेवा कर रही हैं। राखिल काहलों आईएएस हैं, सतवंत अटवाल बीएसएफ में हिमाचल कैडर से आईपीएस हैं। इसी तरह बीएस भारद्वाज बीएंडआर से एसई रिटायर्ड हैं। समुदाय से ब्रिगेडियर सुरजीत सिंह (ऊना), ब्रिगेडियर लाल सिंह (भोटा)कर्नल विक्रम अटवाल (घुरकड़ी) कर्नल नरेश सिंह (भोटा), कर्नल कुलदीप अटवाल (जलाड़ी) जांबाज समुदाय की शान हैं। इसके अलावा नादौन से लीडिंग फार्मर तारा सिंह और पिं्रसीपल अनंत राम व केसी रंधावा शिक्षा के क्षेत्र में प्रेरणास्रोत हैं। एसएस गिल ने कालेज कैडर से पिं्रसीपल पद पर रहकर मिसाल कायम की है। न्यायपालिका में ऊना निवासी स्व अर्जुन सिंह बड़ा नाम हैं। इसके अलावा मोनिका सोमल भी न्यायपालिका में हैं। वहीं सोमल आईएफएस आफसर रहे हैं।

जब वालीबाल में चमके

बीएसएफ से रिटायर्ड कमांडेंट जागीर सिंह नादौन से हैं। बर्ष 1982 में एशियाड में इन्होंने भारतीय टीम को लीड किया था। अभी वह संगठन के राष्ट्रीय सचिव हैं। इतना ही नहीं, वह 18 बार नेशनल खेल कर कई गोल्ड मेडल जीत चुके हैं। एशियन खेलों में जाने के अलावा नामी कोच भी हैं।

तब होनहार फायर आफिसर, अब नदी बचा रहे

वर्ष 2010 में शिमला में हुए भीषण अग्निकांड में करीब 60 कश्मीरी युवाओं की जान बचाने वाले होनहार फायर आफिसर बीएस माहल को कौन नहीं जानता। चुनौती बने उस अग्निकांड में श्री माहल ने बड़ी बहादुरी से कीमती जानें बचाई थीं। मूल रूप से सराह के रहने वाले हैं,लेकिन अब भटेड़ (दोनों गांव धर्मशाला से सटे) में शिफ्ट हो गए हैं। पूर्व डिवीजनल फायर अफसर श्री माहल ने बैजनाथ से लेकर इंदौरा तक करीब 350 पीपल के ऐसे पेड़ सहेजे हैं,जो पूरी तरह से सुरक्षित हैं। श्री माहल ने कई लोगों को पेड़ गोद लेने में मदद भी की है। अब बाणगंगा की सहायक नदी मांझी के सबसे बड़े संरक्षक बनकर उभरे हैं। धर्मशाला शहर से निकाले गए प्रवासियों द्वारा भटेड़ में खड्ड किनारे ठिकाने बनाने से पानी दूषित हो रहा है। श्री माहल चाहते हैं कि हजारों लोगों को पालने वाली खड्ड दूषित नहीं होनी चाहिए। वह इसे लेकर कई बार सरकार से मांग उठा चुके  हैं।

यूके में मकान, देवभूमि में दिल

सतवंत जोहल बना रहे  हिमाचल में 17 होटल

यूके (इंग्लैंड)में रहने वाले सतवंत सिंह जोहल का हिमाचल से खास लगाव है। धर्मशाला के खनियारा और पंजाब के होशियारपुर में रहने वाले श्री जोहल हिमाचल में 17 होटल की चेन बना रहे हैं। इनमें तीन होटल ज्वालामुखी,घाघस और शाहपुर में शुरू भी हो गए हैं,जबकि अन्यों पर काम जारी है। श्री जोहल का सपना है कि हिमाचल में सैकड़ों युवाओं के लिए रोजगार के अवसर प्रदान किए जाएं।  समुदाय को इन पर नाज है।  शहीद-ए-आजम भगत सिंह के परिवार के करीबी श्री जोहल की होटल चेन का नाम स्पॉट हाई-वे सर्विस है।

जाट की शान में कुछ ऐसे कसीदे (किंवदंतियां)

मुगल शासक अकबर कहते थे कि जाट को सिर्फ दोस्ती कर हराया जा सकता है,लड़कर कतई नहीं।

मुहम्मद गौरी कहता था कि जाट से अगर कोई चीज चाहिए,तो मांग लो। धोखा करने वाले का जाट नामोनिशान मिटा देते हैं।

सिकंदर महान का कहना था कि जंग में उतरने के बाद जाट को रोकना शेर के मुंह में हाथ डालने जैसा है।

अंग्र्रेजों का मानना था कि जाट एकजुट नहीं होने चाहिएं। वे कहते थे कि जाट सिर्फ आपस में लड़कर पराजित हो सकते हैं। इनसे सीधी लड़ाई सुसाइड करने जैसा है।

हरनाम सिंह गिल और ओबीसी दर्जा

हिमाचल में जाट समुदाय को ओबीसी में शामिल करवाने में हरनाम सिंह गिल का बड़ा योगदान रहा है। कांगड़ा शहर से सटे बैदी गांव के रहने वाले हरनाम गिल हैडमास्टर के पद पर तैनात थे। दयाल बाग आगरा से एमएबीटी करने वाले गिल समुदाय की समस्याओं से भलीभांति परिचित थे। उन्होंने  जाट कल्याण परिषद के फाउंडर सूबेदार विचित्र सिंह द्वारा छेड़ी गई मुहिम को आगे बढ़ाया। ओबीसी कमीशन के पास समुदाय का पक्ष रखा कि कैसे मुजारा एक्ट में जमीनें छिनने के बाद खेती पहले जैसी नहीं रही। उस समय प्रदेश में प्रो. पे्रम कुमार धूमल मुख्यमंत्री थे और साहिब सिंह बर्मा जाट संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष। श्री गिल द्वारा पुख्ता तरीके से पक्ष रखने का ही नतीजा था कि सन् 2002 में जाट समुदाय को ओबीसी में शामिल कर लिया गया। जाट समुदाय के ओबीसी में आने से अन्य पिछड़ा वर्ग जैसे संगठन को संभवतः मजबूती मिली है।

शिक्षा में अव्वल

कांगड़ा जिला के बैदी गांव निवासी पुरुषोत्तम पड्डा सेवानिवृत्त शिक्षक हैं। इनकी गिनती समुदाय के गणमान्यों में होती है।

मलां निवासी प्रताप रियाड़ नामी शिक्षाविद हैं। यह स्टेट अवार्डी हैं। शिक्षा के क्षेत्र में इन्होंने कई मील पत्थर स्थापित किए हैं।

फौज में चमके

मलाया, सिंगापुर की जेलों में युद्ध बंदी रहे नानक सिंह आजाद हिंद फौज से संबंधित रहे हैं। बताते हैं कि वह कैप्टन के पद पर थे। बैदी में जन्मे नानक चंद बेहतरीन सेवाओं के लिए जाने जाते हैं।

गुरुबचन सिंह फौज में उच्च पद पर रहे हैं। इन्हें कई मेडल भी मिले हैं। इनकी गिनती जाटों की बड़ी हस्तियों में होती है।

नामी कारोबारी

केसी ब्रमला म्यांमार से आए हैं। इंदौरा में रहते हैं। अब इनकी गिनती नामी कारोबारियों में होती है। समुदाय के लिए यह बड़ा नाम है।

पंडितों के गढ़ में लीडर

हमीरपुर जिला में नादौनता (अब बड़सर) विधानसभा हलके से मनजीत सिंह डोगरा दो बार एमएलए रहे हैं। डोगरा संभवतः जाट समुदाय से एकमात्र नेता हैं,जो विधायक जैसे पद तक पहुंचे हैं। खास बात यह कि यह इलाका ब्राह्मण बहुल है। यहां से उनका विधायक बनना बड़ी बात है।

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