तेंदुओं पर 90 लाख के प्रोजेक्ट का मकसद समझ से बाहर

Nov 16th, 2017 12:15 am

शिमला— हिमाचल में बंदरों के बाद सबसे ज्यादा उत्पात लैपर्ड यानी तेंदुओं द्वारा ग्रामीण व शहरी क्षेत्रों में मचाया जा रहा है। शिमला व किन्नौर वर्तमान में दहशत के साए में जी रहे हैं। कई इलाकों में लोग शाम आठ बजे के बाद बाहर निकलना बंद कर देते हैं। बावजूद इसके कोई ठोस समाधान नहीं मिल पा रहा। इसकी रोकथाम के लिए वाइल्ड लाइफ विंग ने 90 लाख का एक बड़ा प्रोजेक्ट महाराष्ट्र की एक एनजीओ को सौंपा है। इससे बाकायदा वर्ष 2019 तक एमओयू हस्ताक्षरित किया गया है। विंग अभी तक इस एनजीओ को 25 लाख रुपए की राशि जारी कर चुका है। हैरानी की बात है कि प्रदेश के जिन हिस्सों में तेंदुओं का आतंक बढ़ रहा था, वहां अभी भी कोई रोकथाम नहीं हो सकी है। ऐसे में इस प्रोजेक्ट को लेकर अब सवाल उठ रहे हैं। हालांकि वन विभाग के तहत वाइल्ड लाइफ विंग के अधिकारियों का कहना है कि यह स्टडी प्रोजेक्ट है, जिसके तहत तेंदुओं के व्यवहार का अध्ययन करने के बाद आवश्यक कदम उठाए जाएंगे। हैरानी की बात है कि न तो प्रदेश में वर्ष 2005 के बाद कभी लैपर्ड्स की गणना हुई, न ही उनके हमलों से रोकथाम के लिए पिंजरों को छोड़कर कोई बड़े कदम उठाए गए। आखिर बिना सेंसस के करीब एक करोड़ रूपए का यह प्रोजेक्ट किस मकसद से महाराष्ट्र की एनजीओ को सौंपा गया, यह समझ से बाहर है। प्रदेश के वाइल्ड लाइफ विंग के पास लैपर्ड अटैक पर अंकुश लगाने के लिए ट्रैंक्यूलाइजर गनों का भी अभाव है। इन्हीं बंदूकों के सहारे हमलावर तेंदुओं पर काबू पाने का प्रयास होता है। जानकारों का कहना है कि लाखों की इस राशि से यदि वाइल्ड लाइफ विंग के रेंज अफसरों, डिप्टी रेंजरों व वन रक्षकों को प्रशिक्षित किया जाता तो हिमाचल के लिए यह एक बड़ी उपलब्धि हो सकती थी, मगर ऐसा प्रयास कभी भी नहीं किया गया।

हर वर्ष 100 से ज्यादा हमले

प्रदेश के जिला शिमला, बिलासपुर, मंडी, हमीरपुर और सोलन में लैपर्ड अटैक के हर साल औसतन 100 से भी ज्यादा हमलों की सूचनाएं मिलती हैं। ग्रामीण इनकी रिपोर्ट मीडिया को छोड़कर वाइल्ड लाइफ विंग व पुलिस तक में नहीं करते। ऐसे बड़े मामले ही प्रकाश में आते हैं, जहां लोग तेंदुओं के हमले का शिकार बन जाते हैं।

अब तक गिनती ही नहीं हुई

जानकारों की राय में करीब एक करोड़ रुपए की रकम लैपर्ड बिहेवियर स्टडी पर खर्च की जा रही है, जबकि पिछले 10-12 वर्षों से हिमाचल में तेंदुओं की गिनती ही नहीं हो सकी है।

अध्ययन पर फिजूलखर्च

वन विभाग के तहत लाखों के आबंटित किए जाते रहे प्रोजेक्ट्स पर इसलिए भी सवाल उठते हैं, क्योंकि पहले भी कभी गुच्छी के अध्ययन तो कभी चिलगोजे के अध्ययन के लिए लाखों की रकम खर्च की गई, मगर प्रदेश को इसका क्या लाभ मिला, इसका जवाब किसी भी अधिकारी के पास नहीं।

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