पंक्चर परिवहन

* 6960 कुल बसें
* 3700 प्राइवेट
* 3260 सरकारी
* 3137 ऑर्डिनरी
* 52 वोल्वो 
* 63 डीलक्स नॉन एसी
* 03 सुपर डीलक्स
* 05 एसी डीलक्स
* 50 इलेक्ट्रिक टैक्सी
* 1100 रूट घाटे में

सूत्रधार : टेकचंद वर्मा

भुगतान को तरसते पेंशनर और 150 निजी रूट ठप। छुट्टी न मिलने से थके कर्मी उस पर केंद्र से मिली 791 बसों में से 250 रूट ऑफ। 3260 बसों के बेडे़ वाली एचआरटीसी कहने को तो  बिजली की गाड़ी भी दौड़ा रही है, लेकिन सच यह है कि पहाड़ पर परिवहन व्यवस्था बुरी तरह पंक्चर हो चुकी है…

पहाड़ों में सर्पीली सड़कें जहां भाग्य रेखाएं मानी जाती हैं वहीं इन सड़कों पर सुरक्षित यातायात का भरोसा जताकर लोगों को गंतव्य तक पहुंचाने वाली एचआरटीसी भी पहाड़ के लोगों की जरूरत बन चुकी है। कभी वह समय था जब गांव तो दूर शहरों में भी सड़क नहीं थी। मगर आज घर-द्वार तक जहां सड़कें पहुंच चुकी हैं, वहीं उन पर घर तक छोड़ने वाली बसें भी उपलब्ध हैं। हिमाचल के लोगों को सुरक्षित व बेहतर यातायात सुविधा एचआरटीसी देने की कोशिश कर रहा है। आज एचआरटीसी का बेड़ा 3260 बसों तक पहुंच गया है, जो 4364 रूटों पर जनता को सुरक्षित यात्रा सुविधा उपलब्ध करवा रहा है।  वर्ष 1958 में एचआरटीसी की स्थापना की गई थी, लेकिन  उस समय इसे मंडी-कुल्लू  रोड ट्रांसपोर्ट के नाम से जाना जाता था। इसके बाद 2 नवंबर 1974 में इसका नाम बदलकर हिमाचल रोड ट्रांसपोर्ट कारपोरेशन रखा गया। उस दौरान निगम का बस फ्लीट 733, जबकि 379 बस रूटों पर सेवाएं दी जा रही थी, जिसमें समय के साथ-साथ भारी इजाफा हुआ है। आज प्रदेश के अधिकतर सभी रूटों पर एचआरटीसी बसें दौड़ा रहा है। भरोसेमंद सवारी के लिए पहाड़ के लोग एचआरटीसी पर ही भरोसा करते हैं। हिमाचल में एचआरटीसी जनता को शहरी क्षेत्रों के साथ-साथ ग्रामीण क्षेत्रों में भी परिवहन सेवा उपलब्ध करवा रहा है। मगर ग्रामीण क्षेत्रों में अभी भी स्तर उतना नहीं उठ पाया है, जितनी जनता को जरूरत है। प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों में अभी भी कई स्थानों पर पुरानी बसें दौड़ रही हैं,जिसमें न तो सफाई व्यवस्था और न ही बसों की स्थिति ठीक है। पुरानी बसें होने के चलते लोगों में दुर्घटना का खतरा बना रहता है। वहीं  कई बसें रास्ते में ही खराब होने से जनता को आए दिन दिक्कतें भी झेलनी पड़ती हैं। यही कारण है कि अभी भी एचआरटीसी आम जनता के दिल से जुड़ने में नाकाम रहा है। हालांकि निगम के बेड़े में नई बसें शामिल होने से उक्त समस्याओं में कमी आई है, मगर जनता की उम्मीदों पर खरा उतरने के लिए अभी और प्रयासों की आवश्यकता बाकी है।

इलेक्ट्रिक परिवहन सेवा देने वाला पहला राज्य

हिमाचल प्रदेश इलेक्ट्रिक परिवहन सेवा देने वाला  पहला राज्य बन गया है। एचआरटीसी ने जनता को ऑर्डिनरी बस सेवा से इलेक्ट्रिक बस सेवा के साथ इलेक्ट्रिक टैक्सी सेवा भी शुरू की है। प्रदेश में 50 इलेक्ट्रिक टैक्सियां पहुंच गई हैं।

साढ़े आठ हजार कर्मचारी दे रहे हैं सेवाएं

एचआरटीसी में मौजूदा समय में साढ़े आठ हजार के करीब कर्मचारी सेवाएं दे रहे हैं। इसमें 6 हजार के करीब ड्राइवर-कंडक्टर हैं ,जबकि शेष आफिशियल स्टाफ व मेकेनिक का है। इसके अलावा दो हजार के करीब पीस मील वर्कर्ज हैं,जो अभी तक नीति के तहत नहीं आ पाए हैं।

एचआरटीसी के बेड़े में 3260 बसें

* 100 के करीब बसें आउटसोर्सिंग पर

* हर साल खरीदी व रिप्लेस की जाती हैं 100 गाडि़यां

आज एचआरटीसी का बेड़ा 3260 तक पहुंच गया है, जिनके माध्यम से प्रदेश के शहरी व ग्रामीण क्षेत्रों में जनता को परिवहन सेवा उपलब्ध करवाई जा रही है। इसमें से 3160  बसें एचआरटीसी की अपनी, जबकि 100  बसें आउटसोर्स पर हैं। एचआरटीसी द्वारा इस वर्ष 500 के करीब बसों की खरीद की गई, जबकि पूर्व में एचआरटीसी की ओर से एक साल में 100 बसों की खरीद की जाती थी और 100 बसों को रिप्लेस किया जाता था। इस वर्ष निगम ने साधारण बसों के साथ-साथ वोल्वो और इलेक्ट्रिक बसों की भी खरीद की है। हाल ही में निगम ने 50 इलेक्ट्रिक टैक्सियां खरीदी हैं, जो प्रदेश के सभी जिलों में चलाना प्रस्तावित हैं। इसके अलावा निगम के बेड़े में छह इलेक्ट्रिक बसें भी शामिल हुई हैं।

हर साल 100 करोड़ का घाटा

एचआरटीसी का सालाना घाटा 100 करोड़ के करीब रहता है। हालांकि निगम की बसों में आक्यूपेंसी की दर में इजाफा हुआ है। मगर निगम का घाटा कम होने का नाम नहीं ले  रहा है, जिसका मुख्य कारण राज्य में घाटे वाले रूट हैं। निगम के 1100 के करीब रूट घाटे वाले बताए जा रहे हैं, जिनमें सवारियां कम होने के बावजूद निगम की बसें दौड़ रही हैं। जानकारी के तहत प्रदेश के कई ऐसे भी रूट हैं जहां पर रूट में एक और 2 से 5 सवारियां ही बस में होती हैं। घाटे के रूटों के साथ-साथ कई मार्गों पर खटारा बसें भी चलाई जा रही हैं, जो अपनी उम्र के साथ-साथ अपना खर्च भी पूरा कर चुकी होती हैं। इन बसों के रूट पर दौड़ने से निगम को तेल की भी चपत लग रही है, जो घाटे को और बढ़ा रहा है।

धूल फांक रही 250 बसें

केंद्र से जेएनएनयूआरएम के तहत मिली 791 में से 250 बसें ऑफ रूट हो चुकी हैं, जो इन दिनों सड़कों के किनारों पर धूल फांक रही हैं। बताते चलें कि पथ परिवहन निगम ने इस प्रोजेक्ट के केंद्र से मंजूर वास्तविक स्वरूप से हटकर अंतरराज्यीय रूटों पर भी बसें दौड़ानी शुरू कर दीं। यहीं से विवाद खड़ा हुआ और अब स्थिति यह हो चुकी है कि कुल 791 में से 250 बसें ऑफ रूट हो चुकी हैं। प्रदेश उच्च न्यायालय ने निगम को आदेश दिए हैं कि ये बसें वास्तविक प्रोजेक्ट के ही अनुरूप चलें, जिसे केंद्र ने भी मंजूरी दी थी।  निगम अभी तक भी ऑफ रूट हो चुकी 250 बसों को एडजस्ट करने के लिए कोई योजना नहीं बना सका है। केंद्र द्वारा ये बसें शहरी क्षेत्रों में ही आवाजाही के लिए दी गई थीं। हालांकि जानकारों का कहना है कि इसमें कुछ गांव भी कवर किए जा सकते थे, मगर निगम ने इसे मुनाफे का सौदा समझते हुए इसे अंतरराज्यीय व अंतर जिला रूटों  पर चला दिया। निगम को सबसे ज्यादा झटका तब लगा, जब केंद्रीय मंत्रालय ने उस द्वारा भेजा गया नया प्रस्ताव भी नामंजूर कर दिया।

जल्द दौड़ेंगी इलेक्ट्रिक टैक्सियां

एचआरटीसी ने प्रदेश के शहरी क्षेत्रों में जनता की सुविधा के लिए 50 इलेक्ट्रिक टैक्सियां खरीदी हैं। टैक्सियां प्रदेश में पहुंच चुकी हैं। चुनाव आचार संहिता के चलते इन टैक्सियों को चलाने के लिए चुनाव आयोग की अनुमति मांगी गई है। पहाड़ी प्रदेश में यह एचआरटीसी का बड़ा प्रयोग है। यह सिरे चढ़ता है या यह प्रयोग भी असफल रहता है, इसके परिणाम इन टैक्सियों के चलने के बाद सामने आएंगे, जबकि प्रदेश में इलेक्ट्रिक बस चलाने का प्रयास अभी भी पूरी तरह से सफल नहीं हो पाया है।

टैक्स की मार से दबे निजी आपरेटर

150 रूट हुए बंद

प्रदेश में निजी आपरेटर करीब चार हजार से 4500 रूटों पर सेवाएं दे रहे हैं। मगर प्रतिस्पर्धा व भारी भरकम टैक्स थोपने से  दिक्कतें आई हैं। निजी आपरेटर यूनियन का दावा है कि प्रदेश में 150 के करीब रूट बंद हो गए है ..

हिमाचल प्रदेश के परिवहन में निजी क्षेत्र की अहम भूमिका है।  मौजूदा दौर में प्रतिस्पर्धा व भारी भरकम टैक्स ने निजी आपरेटरों को आर्थिक तंगी की मार झेलने पर मजबूर कर दिया है। निजी बस आपरेटर यूनियन के प्रदेशाध्यक्ष जय श्रीराम शर्मा का आरोप है कि प्रदेश में 3700 के करीब बसें विभिन्न रूटों पर चल रही हैं। एक समय ऐसा था, जब निजी फ्लीट ने प्रदेश को चलाया हुआ था। मगर आज निजी आपरेटर फिर से बेरोजगारी की राह पर खड़े हैं, जिसका कारण प्रदेश की परिवहन नीति है। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रदेश में रूट परमिट 60-40 की पालिसी के तहत आबंटित किए जा रहे हैं, जो मनमाने तरीके से आबंटित किए गए हैं। ऐसे में निजी व सरकारी आपरेटरों में प्रतिस्पर्धा बढ़ गई है। एचआरटीसी की नई बसें आने के बाद इसमें और इजाफा हुआ है।  परिवहन नीति प्रावइेट आपरेटरों के हित में नहीं है। जब जरूरत थी तो निजी आपरेटरों की सेवाएं ली गईं ,अब जब जरूरत नहीं है तो  गला घोंटा जा रहा है। मनमाने रूट के साथ-साथ निजी आपरेटरों पर भारी भरकम टैक्स थोपे जा रहे हैं। पहाड़ी राज्य होने के बावजूद निजी आपरेटर से पड़ोसी राज्यों की तर्ज पर अधिक टैक्स वसूले जा रहे हैं। भारी भरकम एसआरटीसी व टोकन टैक्स लिया जा रहा है। इसके ऊपर अब  ग्रीन टैक्स भी वसूला जा रहा है, जो न्याय संगत नहीं है।

कौशल विकास योजना बेमानी

ट्रेनिंग के बाद बेरोजगार

हिमाचल परिवहन निगम में बेरोजगारों के लिए स्वरोजगार की योजनाएं बनी थी, जिसमें मुख्यतः कौशल विकास योजना है। हालांकि उक्त योजना के तहत प्रदेश के बेरोजगारों को स्वरोजगार के लिए प्रशिक्षण दिया गया। मगर यह योजना रोजगार प्राप्त करवाने में पूरी तरह से खरी नहीं उतर पाई। हिमाचल परिवहन निगम में कौशल विकास योजना के तहत करीब 2500 से तीन हजार बेरोजगारों को प्रशिक्षण दिया गया। इनमें से करीब 1400-1500 आज निगम में अपनी सेवाएं दे रहे हैं, जबकि शेष प्रशिक्षण के बावजूद  स्वरोजगार प्राप्त नहीं कर पाए हैं। निगम में जो प्रशिक्षण के बाद अपनी सेवाएं दे रहे हैं,वे भी स्थायी नीति के लिए तरस रहे हैं। इनसे निगम स्थायी कर्मचारियों के तहत काम ले रहा है, मगर इनको स्थायी नीति के तहत लाने की दिशा में अभी तक कुछ नहीं हो पाया है। ऐसे में वे अपने भविष्य के लिए चिंतित हैं।  इसके अलावा बेरोजगारों को स्वरोजगार की कई योजनाएं बनाई गई थीं लेकिन उक्त योजनाएं सिरे नहीं चढ़ पाईं।  इसमें अधिकतर योजनाएं फाइलों में दफन होकर रह गई हैं।

कर्मचारी आहत, पेंशनर मुश्किल में

हिमाचल पथ परिवहन निगम के पेंशनर्ज समय पर पेंशन न मिलने से परेशान हैं। आलम यह है कि उन्हें कई-कई माह पेंशन का इंतजार करना पड़ रहा है।  एचआरटीसी के पेंशनर्ज की इस समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो पाया है, जिसके चलते आज भी पेंशनरों को उम्र के आखिरी पड़ाव पर आर्थिक तंगी की मार झेलनी पड़ रही है।  एचआरटीसी पेंशनरों को सितंबर व अक्तूबर महीने की पेंशन नहीं मिल पाई है, जबकि नवंबर माह बीतने को है। ऐसे में पेंशनरों के पास इंतजार के अलावा कोई और विकल्प नहीं रह गया है। गौर हो कि इन्हें पेंशन की अदायगी पेंशन ट्रस्ट से होती है,जिसका गठन वर्ष 1995 में किया गया था। मगर  ट्रस्ट में पैसा जमा न होने के चलते  पेंशनरों को तरसना पड़ रहा है। हिमाचल पथ परिवहन सेवानिवृत्त कल्याण मंच के प्रदेश अध्यक्ष बलराम पुरी का कहना है कि ट्रस्ट तो बनाया गया,मगर इससे निकासी ही होती रही। इसमें पैसा जमा नहीं हो पाया, जिसके चलते आज साढ़े पांच हजार पेंशनरों को हर माह पेंशन के लिए तरसना पड़ रहा है। सरकार ने हर मंच पर पेंशनरों की समस्या के स्थायी हल का आश्वासन दिया। मगर सरकार इस समस्या का स्थायी समाधान नहीं कर पाई,जिसके चलते आज भी पेंशनर प्रताडि़त हो रहे हैं।

नहीं मिले वित्तीय लाभ

एचआरटीसी से वर्ष 2015-16 के दौरान सेवानिवृत्त हुए पेंशनरों को अभी तक पेंशन नहीं लग पाई है। वहीं इस अवधि के दौरान सेवानिवृत्त हुए कर्मचारियों को कोई वित्तीय लाभ नहीं मिल पाए हैं। इसके अलावा पेंशनरों के मेडिकल भत्ते पैंडिंग हैं। वहीं  5, 10, 15 फीसदी पेंशन बढ़ोतरी का लाभ नहीं मिल पाया है। एचआरटीसी में पेंशनरों की संख्या 5500 के करीब है, जबकि 4500 के करीब कर्मचारी ऐसे हैं, जो पेंशन स्कीम के तहत आते हैं और सेवानिवृत्ति के बाद पेंशन के हकदार होंगे।

समय पर नहीं मिलती छुट्टी

एचआरटीसी के कर्मचारियों के लिए कार्य की सुदृढ़ नीति नहीं है, जिसके चलते परिवहन कर्मचारी आहत हैं।  कर्मचारियों की मानें तो कर्मचारी निगम में 24 घंटे सेवाएं दे रहे हैं। ये कर्मचारी पूरी तरह से समाज से कट गया है,जिसका मुख्य कारण कर्मचारियों को छुट्टियां न मिल पाना है। बिना छुट्टियों के चलते  कर्मचारी कोई भी त्योहार परिवार के साथ नहीं मना सकता है। जो और भी आहत कर रहा है।

छह महीने का ओवर टाइम पेंडिंग

कर्मचारियों का आरोप है कि उन्हें निगम में केवल मात्र वेतन ही समय पर मिल रहा है। इसके अलावा कर्मचारियों को अन्य लाभ समय पर नहीं मिल पा रहे हैं। मौजूदा समय में एचआरटीसी के कर्मचारियों को नाइट ओवर टाइम 5-6 माह से पेंडिंग हैं।

बुढ़ापे की चिंता

एचआरटीसी के कर्मचारियों को बुढ़ापे की चिंता भी आहत कर रही है। कर्मचारियों का कहना है कि 58 वर्ष तक सेवा देने के बाद निगम से सेवानिवृत्त हुए कर्मचारियों को पेंशन के लिए तरसना पड़ रहा है। ऐसे में उम्र के आखिरी पड़ाव में घर का खर्च चलाना मुश्किल हो गया है।

ठहरने की व्यवस्था उचित नहीं

एचआरटीसी के कर्मचारियों का आरोप है कि ड्राइवर-कंडक्टर को विभिन्न रूटों पर ठहरने की व्यवस्था ठीक नहीं है। इसके अलावा प्रदेश में कई स्थानों पर कर्मचारियों के रेस्ट रूम भी दयनीय स्थिति में है।

4364 रूटों पर दौड़ रही एचआरटीसी

निगम के अधिकतर प्रयोग औंधे मुंह 

हिमाचल प्रदेश में एचआरटीसी 4364 रूटों पर जनता को बस सेवा उपलब्ध करवा रहा है। आर्डिनरी बस सेवा के साथ-साथ 123 वोल्वो व डीलक्स बसें भी जनता की सेवा में हैं। एचआरटीसी के बड़े में 3260 बसें हैं, जिसमें 3137 बसें आर्डिनरी हैं। इसके अलावा 63 बसें डीलक्स नॉन एसी, 3 बसें सुपर डीलक्स, 5 बसें एसी डीलक्स और 52 बसें वोल्वो हैं। एचआरटीसी ने जनता को बेहतरीन सुविधा उपलब्ध करवाने के लिए कई प्रयोग किए थे। मगर अधिकतर प्रयोग असफल रहने से जनता को उसका लाभ नहीं मिल पाया। एचआरटीसी ने यात्रियों की सुविधा के लिए प्रदेश में शार्ट डिस्टेंट बस सेवा आरंभ करने का प्रयोग किया था। मगर यह प्रयोग सिरे नहीं चढ़ पाया। इसके अलावा निगम की कूरियर सेवा का प्रयोग भी पूरा नहीं हो पाया। इसमें निजी कूरियर एजेंसियों की सहायता नहीं ली जा सकी। वहीं,एचआरटीसी की स्मार्ट कार्ड योजना यलो कार्ड, डीलक्स बसों में टीवी, बसों में पंखे और पर्यटकों व यात्रियों के मनोरंजन के लिए बस अड्डों में स्क्रीन का प्रयोग भी पूरी तरह सिरे नहीं चढ़ पाया।  एचआरटीसी ने शहरी क्षेत्रों में टैक्सी सेवा आरंभ की थी। यह प्रयोग एचआरटीसी का सफल रहा है। यह प्रयोग जनता के लिए लाभदायक साबित हुआ।  हालांकि टैक्सियों को कुछ समय चलने के बाद बंद कर दिया गया था। मगर लोगों की मांग को देखते हुए फिर से इन्हें चलाया गया है।

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