रूसा रहे या जाए

हिमाचल में शिक्षा का स्तर बेहतर करने के उद्देश्य से रूसा अपनाया गया,पर छात्रों ने इसका विरोध किया। इसी के मद्देनजर युवाओं का समर्थन हासिल करने के लिए भाजपा ने इस प्रणाली को बंद करने का वादा किया है, तो कांग्रेस दोबारा से समीक्षा को तैयार है। रूसा की खामियों-उद्देश्यों व संभावित सुधारों को बता रही हैं,   भावना शर्मा…

प्रदेश में वर्ष 2013 में उच्च शिक्षा के स्तर को और बेहतर करने के लिए राष्ट्रीय उच्चतर शिक्षा प्रणाली को लाया गया। इस योजना के तहत छात्रों को यूजी डिग्री के लिए सीबीसीएस सिस्टम लागू कर दिया गया। इसमें पहले से चल रहे वार्षिक सिस्टम को बंद कर प्रदेश में सेमेस्टर सिस्टम लागू किया गया। इस प्रणाली के लागू होने के बाद शिक्षा में आई खामियों को लेकर प्रदेश भर के छात्र विरोध जताने के लिए सड़कों पर उतर आए। गौरतलब है कि रूसा केंद्रीय प्रायोजित योजना है, जिसे पात्र राज्य उच्चतर शैक्षिक संस्थाओं को वित्त पोषित करने के उद्देश्य से वर्ष 2013 में प्रारंभ किया गया था। केंद्रीय वित्त पोषण के तहत सामान्य वर्ग के राज्यों के लिए 65:35  और विशेष वर्ग के राज्यों के लिए 90:10 के  मापदंड हैं।   संस्थानों में पहुंचने से पहले ग्रांट केंद्रीय मंत्रालय से राज्य सरकार और फिर उच्चतर शिक्षा परिषदों को भेजी जाती है।  शिक्षण संस्थानों में समग्र गुणवत्ता में सुधार   और राज्य स्तर पर योजना और मानिटरिंग के लिए सांस्थानिक ढांचे का निर्माण , विश्वविद्यालयों में स्वायत्तता प्रोत्साहित करके और संस्थाओं के इंफ्रास्ट्रक्चर में सुधार करके राज्य उच्चतर शिक्षा प्रणाली में परिवर्तनकारी सुधार इस प्रणाली का उद्देश्य है। वहीं, शैक्षिक और परीक्षा प्रणाली में सुधारों को सुनिश्चित करना भी इसके मुख्य उद्देश्यों में हैं।

ग्रेडिंग सिस्टम से परेशानी

प्रदेश में रूसा को शिक्षा की गुणवत्ता के लिए लाया गया था, लेकिन योजना से बेहतर होने के बजाय खामियों के चलते उच्च शिक्षा का स्तर नीचे गिरता गया। रूसा में गे्रडिंग सिस्टम होने की वजह से छात्रों की प्रतिशतता अंकों में कमी आई। छात्रों को मैरिट के आधार पर यूजी कोर्स में प्रवेश मिलने की वजह से हजारों छात्र कालेजों में प्रवेश लेने से वंचित रह रहे हैं।

रूसा बंद करने का नहीं कोई विकल्प

शुरू से ही छात्र रूसा का विरोध   करते आ रहे हैं। इसके तहत सेमेस्टर सिस्टम को छात्र प्रदेश की भौगोलिक परिस्थितियों के अनुकूल नहीं मान रहे हैं। छात्रों  ने इस प्रणाली को पहले बैक करने की मांग उठाई थी। वहीं, अब थोड़ा सुधार होने के बाद छात्र इसको रोल बैक कर इसमें सुधार करने की मांग ही कर रहे हैं। हालांकि भाजपा की ओर से अपने दृष्टि पत्र में रूसा वापसी का वादा किया है, लेकिन अब इस प्रणाली के तहत चार बैच पास आउट होने के बाद इसे बंद करने के कोई मायने नहीं रह जाते हैं। एक ओर जहां यह केंद्र की योजना है और इसे सभी राज्यों द्वारा अपनाया जा रहा है,तो अब अगर प्रदेश में इसे बंद किया जाता है तो इसके तहत मिले बजट और पास आउट हुए चार बैच के छात्रों की डिग्रियों पर भी सवाल खड़ा होगा। छात्र अपने पसंदीदा विषय में डिग्री भी हासिल कर पा रहे हों तो ऐसे में रूसा को बंद करने के मायने नहीं रह जाते हैं।

 उच्च शिक्षा का हुआ विस्तार

उच्च शिक्षा के विस्तार की बात की जाए तो इस योजना के तहत प्रदेश के कालेजों में छात्रों को च्वाइस बेस्ड कोर्स पढ़ने को मिले हैं। योजना से  मिली बड़ी ग्रांट से बेहतर इन्फ्रास्ट्रक्चर बनाने में कालेजों को मदद मिली है, कालेज वाई-फाई की सुविधा से लैस हुए और मॉडल कालेज के साथ ही हिमाचल प्रदेश विवि, कालेजों सहित प्रोफेशनल कालेजों को भी शिक्षा विस्तार के लिए बजट मिला है। मेडिकल और कॉमर्स संकाय के छात्रों को भी अपने पसंद के आर्ट्स विषय पढ़ने का मौका मिला है।

आचार संहिता समाप्त होने के बाद नया कुलपति

प्रदेश विश्वविद्यालय में प्रदेश में विधानसभा चुनावों के चलते लगाई गई आचार संहिता समाप्त होने के बाद ही नए कुलपति की नियुक्ति की जाएगी।  हालांकि सरकार की ओर से एचपीयू को नया कुलपति देने की प्रक्रिया तो चुनावों से पहले ही शुरू कर दी गई थी

करोड़ों के बजट की खातिर अपनाई प्रणाली

प्रदेश में रूसा प्रणाली को लागू करने के पीछे की एकमात्र भावना थी, इसके तहत मिलने वाला बजट।  लेकिन बिना तैयारियों के मात्र करोड़ों के बजट की लालसा के लिए प्रदेश ने सीबीसीएस सिस्टम को अपना लिया, जिसके बाद खामियां सामने आने पर इस प्रणाली के लागू करने पर सवाल उठने लगे और शिक्षा में समानता, गुणवत्ता जो इस योजना के अहम उद्देश्य थे, वे कहीं पीछे ही रह गए।

प्रदेश को मिले 158.21 करोड़ 

प्रदेश में यूजी स्तर पर रूसा लागू होने के बाद प्रदेश को अभी तक इस योजना के तहत 158.21 करोड़ की ग्रांट जारी हो चुकी है।  अब तक प्रदेश के 23 डिग्री कालेजों को 39.25 करोड़  और अन्य 23 कालेजों को 34.5 करोड़ की ग्रांट मिल चुकी है।  प्रदेश विश्वविद्यालय को  18 करोड़ की ग्रांट दो किस्तों में जारी की गई । इसके अलावा मॉडल कालेज सराहां को 6 करोड़ और एग्जिस्टिंग मॉडल कालेज रिकांगपिओ को  3.6 करोड़, इंजीनियरिंग कालेज नगरोटा बगवां को 23.4 करोड़ रुपए की ग्रांट प्राप्त हुई है।

रूसा ही बेहतर प्रणाली

प्रदेश में रूसा लागू होने के समय से ही मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह इस प्रणाली को बेहतरीन बता रहे हैं और इस प्रणाली को किसी भी कीमत पर न हटाने की बात कर रहे हैं। उनका कहना है कि आज के दौर में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सबसे स्वीकृत प्रणाली यही है। हालांकि मुख्यमंत्री ने यह भी माना है कि रूसा के लागू होने से दिक्कत तो रही है। क्योंकि छात्रों को अब पढ़ना पड़ रहा है, पूरा वक्त कालेज में ही रहना पड़ रहा है। टीचर्ज को पढ़ाने के लिए ज्यादा समय देना पड़ रहा है। उन्होंने कहा कि सरकार इस प्रणाली को हटाने पर कदापि विचार नहीं कर सकती है, लेकिन उन्होंने चुनावों में युवा वर्ग का समर्थन पाने के लिए रूसा प्रणाली की समीक्षा करने का वादा अपने चुनावी घोषणा पत्र में जरूर किया है।

कांग्रेस ने समीक्षा का दिलाया भरोसा

कांग्रेस ने भी अपने चुनावी घोषणा पत्र में छात्राओं और युवाओं को लुभाने के लिए रूसा को शामिल किया है। कांग्रेस ने इस प्रणाली के विरोध में उतरे छात्रों के लिए रूसा की समीक्षा करने का वादा अपने चुनावी घोषणा पत्र में किया है। हालांकि रूसा के चार साल बीतने  तक कांग्रेस सरकार और प्रदेश के मुखिया मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह ने छात्रों के विरोध के बाद भी इस प्रणाली को बेहतर ही करार दिया, लेकिन चुनावों के समय में युवाओं का समर्थन पाने के लिए दोनों ही प्रमुख राजनीतिक दलों ने रूसा को चुनावी मुद्दा बनाया है।

भाजपा ने रूसा बंद करने का किया वादा

प्रदेश में जिस समय रूसा लागू हुआ तो उस समय सत्ता में कांगे्रस की सरकार थी। इसमें छात्रों के विरोध को देखते हुए  पूर्व मुख्यमंत्री प्रो.धूमल ने छात्रों को यह आश्वासन दिया कि सत्ता में आने के बाद भाजपा इसे बंद कर देगी।   इसी वादे को पूरा करते हुए और विधानसभा चुनावों में  युवाओं का समर्थन पाने के लिए भाजपा ने अपने दृष्टि पत्र में रूसा प्रणाली के तहत सीबीसीएस प्रणाली और सेमेस्टर परीक्षा प्रणाली को समाप्त कर वार्षिक प्रणाली शुरू किए जाने के वादे को शामिल किया है।

महज 60 दिन ही क्लासें

रूसा क्वालिटी एजुकेशन के लिए तैयार की गई योजना है, लेकिन  प्रदेश में इस योजना के तहत लागू सीबीसीएस और सेमेस्टर सिस्टम योजना के उद्देश्य को हासिल न कर पाने के चलते पिछड़ रहे हैं। बजट तो मिल रहा है, लेकिन कई कालेज ऐसे हैं, जहां शिक्षक न होने के चलते छात्र क्रेडिट बेस्ड च्वाइस सिस्टम के तहत पसंदीदा विषय पढ़ने से वंचित रह रहे हैं। भौगोलिक परिस्थितियों में छात्रों की कक्षाएं मात्र 60 दिन  तक सिमट कर रह गई हैं। खेलकूद गतिविधियों के लिए छात्रों के पास समय नहीं रह गया है। योजना के तहत मात्र दो मॉडल कालेज पांच वर्ष में बन पाए हैं,जबकि क्लस्टर यूनिवर्सिटी की स्थापना अभी तक नहीं हो पाई है।   योजना भले ही क्लालिटी एजुकेशन के लिए बेहतर कदम है, लेकिन यह प्रदेश में पांच सालों तक इस योजना के लक्ष्य को हासिल करने में बजट तक ही सीमित रह गया है।

ऐसे आएगा सुधार

1.कालेजों में पर्याप्त शिक्षकों की नियुक्ति की जानी चाहिए। शिक्षकों कमी से छात्रों को गिने- चुने विषय ही पढ़ने को मिल रहे हैं।

2.सेमेस्टर सिस्टम को बदल कर वार्षिक आधार पर किया जाना चाहिए। प्रदेश की भौगोलिक परिस्थितियों को देखते हुए हर छह माह बाद परीक्षाएं करवाना संभव नहीं है।

3.सीबीसीएस सिस्टम के तहत कालेजों में टीचिंग  डे कम हो गए है। इन्हें बढ़ाने की आवश्यकता है। पहले जहां वार्षिक सिस्टम के तहत 120 से 130 दिन की कक्षाएं लगती थी अब वे मात्र एक सेमेस्टर में 90 दिन सिमट कर रह  गई है और वास्तव में मात्र 60 दिनों तक के करीब ही कक्षाएं इस नई प्रणाली के तहत लग पा रही है।

4.परीक्षाओं के दिन कम करने के लिए समाधान तलाशने की आवश्यकता है। इस प्रणाली में हर छह माह के बाद परीक्षाएं होती है और इनकी अवधि 30 से 40 दिन की रहती है।

5.सीबीसीएस प्रणाली के लिए तय किए गए नियमों का एक दस्तावेज बनाना बेहद जरूरी है।

6.परीक्षाओं परिणाम को समय पर घोषित करना चाहिए

7.समस्याओं के समाधान के लिए एक कमेटी का गठन किया जाना जरूरी है। इसमें प्राचार्यों के  साथ  कालेज के शिक्षकों और छात्रों को शामिल किया जाना चाहिए।

छात्रों के हित में है रूसा

परीक्षा नियंत्रक बोले, सुधार के बाद सही चल रही प्रणाली

हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय के परीक्षा नियंत्रक डा. जेएस नेगी का कहना है कि रूसा प्रणाली बेहद ही कारगार सिद्ध हुई है। इस प्रणाली के तहत छात्रों को पढ़ने के लिए समय दिया है। वार्षिक सिस्टम के तहत   छात्र पूरा वर्ष न पढ़कर  मात्र परीक्षाओं से तीन या चार माह पहले ही तैयारी करते थे। वहीं, अब इंटर्नल असेस्मेंट प्राप्त करने के लिए और थ्योरी में बेहतर अंक पाने के लिए छात्रों को  90 दिनों तक पढ़ाई करनी पड़ती है। सभी कक्षाएं लगाने के साथ ही असाइनमेंट भी छात्र अपने संबंधित कोर्स के लिए तैयार करते हैं, जिससे  शैक्षणिक स्तर में सुधार हुआ है। इसके अलावा रूसा के तहत मिल रही ग्रांट से भी प्रदेश के कालेजों सहित विवि का इन्फ्रांस्ट्रक्चर भी बढ़ा है। छात्रों को मूलभूत सुविधाएं ,जिनका अभाव था उन्हें पूरा करने में शिक्षण संस्थानों को आर्थिक मदद मिल रही है। रूसा के तहत देशभर में छात्र एक समान सिलेबस पढ़ रहे हैं। इससे शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ने के साथ ही छात्रों को बेहतर रोजगार के अवसर भी देश भर में मिलेंगे। परीक्षा नियंत्रक ने हालांकि यह भी माना कि रूसा प्रणाली को लागू करने में थोड़ी जल्दबाजी जरूर हुई। इसी जल्दबाजी की वजह से प्रणाली में खामियां पहले कुछ बैच तक आईं, लेकिन अब  रूसा पूरी तरह से सफल रूप से कालेजों में चल रहा है।

चार साल बाद भी दिक्कतें बरकरार

रूसा में किसी तरह की कोई खामी नहीं है, लेकिन इसके तहत लागू सीबीसीएस (क्रेडिट बेस्ड च्वाइस सिस्टम)में कई तरह की दिक्कतें  चार साल बीतने के बाद भी आ रही हैं। एचपीयू की ओर से इस प्रणाली के लिए अभी तक नियमों पर आधारित कोई डाक्यूमेंट ही तैयार नहीं हो पाया है। ऐसे में इस प्रणाली के तहत किसकी क्या जिम्मेदारियां हैं अभी तक यही स्पष्ट नहीं हो पाया है। इसके अलावा परीक्षाओं के परिणाम समय पर घोषित न होना, सेमेस्टर सिस्टम के तहत हर छह माह बाद परीक्षाएं होना, ग्रेडिंग सिस्टम, छात्रों को डिग्री किस आधार पर मिलेगी चौथे बैच तक यही निर्धारित न कर पाना जैसी दिक्कतें इस प्रणाली के तहत हैं।

विवि प्रशासन ने की बड़ी पहल

विवि प्रशासन ने रूसा का डाक्यूमेंट तैयार कर ऐसे ऑर्डिनेंस का हिस्सा बनाने के लिए भी कमेटी का गठन कर तैयारियां शुरू कर दी हैं।  2016 में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के नियमों और सिलेबस पर रूसा प्रणाली लागू होने के बाद से रूसा पटरी पर आ गया है। अब मेजर माइनर कोर्सेस को खत्म कर पास प्रतिशतता का अनुपात 50:50 से 70:30 करने और छात्रों को डिग्री किस आधार पर दी जानी है,यह सब भी निर्धारित कर दिया गया है।

बाहरी राज्यों में रिजेक्ट हुई प्रदेश की डिग्रियां

वर्ष 2013 में जब प्रदेश में रूसा लागू किया गया तो रूसा के पहले बैच के छठे सेमेस्टर का परीक्षा परिणाम विवि समय पर घोषित नहीं कर पाया।   परीक्षा परिणाम घोषित होने के बाद छात्रों को ग्रेडिंग पर दी गई डिग्रियां ही बाहरी विश्वविद्यालयों में मान्य नहीं हुईं। हालांकि बाद में तत्कालीन कुलपति ने बाहरी राज्यों के विवि के कुलपतियों से बात कर और यूजीसी के समक्ष इस मुद्दे को उठा कर छात्रों को प्रवेश दिलवाया था।

92 फीसदी छात्र फेल होने पर देश भर में हुई किरकिरी

2014-15 में पहले सेमेस्टर के परीक्षा परिणाम में 92 फीसदी छात्रों के फेल होने की वजह से यह प्रणाली देश भर में बदनाम हुई। इसका असर केंद्रीय मानव संसाधन विकास, मंत्रालय तक दिखा, जिसके बाद मंत्रालय की ओर से प्रदेश शिक्षा विभाग से इसके बारे जवाब भी मांगा गया। मंत्रालय ने  प्रदेश में बिगड़ती रूसा की छवि को देखते हुए इस योजना का नाम बदलने तक का फैसला ले लिया था।

* पूर्व प्राचार्य प्रो. राजा राम चौहान का मानना है कि सीबीसीएस प्रणाली बेहद हितकारी है।  इसके तहत छात्रों को पसंदीदा कोर्स पढ़ने का मौका मिल रहा है । लेकिन प्रदेश में इस प्रणाली को सही तरीके से लागू नहीं किया जा सका। कई स्तरों पर इसमें खामियां रही, जिसकी वजह से प्रक्रिया विफल रही। अब रूसा वापसी के कोई मायने नहीं रह जाते हैं। अब तो बस इस प्रणाली को सही तरीके से लागू करने के लिए प्रयास करना जरूरी है।

* आनी कालेज के वर्तमान प्राचार्य प्रो.  आरपी कायस्था  का मानना है कि रूसा प्रणाली  गलत नहीं है। बिना तैयारी के इसे लागू  विफलता का कारण बना ।  2013 अक्तूबर में केंद्र सरकार की ओर से योजना शुरू की गई,जबकि प्रदेश में इसे जून  2013 से ही लागू कर दिया। बिना शिक्षकों की संख्या बढ़ाए, भौगोलिक परिस्थितियों को जानते इसे  लागू कर दिया गया । अब इसे बंद न कर इसके सुधार के लिए कार्य होना चाहिए।

* शिक्षाविद प्रो. राम लाल शर्मा का कहना है कि राष्ट्रीय उच्चतर शिक्षा अभियान एक सेंटर फंडिंग योजना है।  पहले न तो सिलेबस तय किया न ही शिक्षकों की नियुक्ति की गई।   छात्रों को जहां विषयों में च्वाइस मिलनी थी, वहां यह च्वाइस शिक्षकों के न होने से छात्रों को नहीं मिल रही है।  सीबीसीएस को लागू करने के बाद अमरीकन  एजुकेशन पैटर्न तो प्रदेश में लाया गया, लेकिन इसके लिए तैयारी नहीं हुई।  अगर अब सिस्टम में बदलाव किया जाता है तो  शिक्षा प्रणाली मजाक बनकर रह जाएगी और यह शिक्षा नहीं एक लैबोटरी होगी, जिसमें प्रयोग ही होंगे। ऐसे में बेहतर यह है कि सीबीसीएस सिस्टम को ही सुदृढ़ किया जाए।

* रूसा विशेषज्ञ गोपाल कृष्ण का मानना है कि रूसा मात्र एक स्कीम है जो उच्च शिक्षा के सुधार,विस्तार और महाविद्यालयों में बेहतर सुविधाएं देने के लिए लागू की गई है।  स्कीम के तहत   के्रडिट बेस्ड च्वाइस सिस्टम और सेमेस्टर सिस्टम इसके पहलू हैं। सिस्टम में खामी मात्र अकादमिक स्तर पर है ,जबकि योजना के तहत लाभ प्रदेश को मिल रहा है। अगर सेमेस्टर सिस्टम को बंद कर वार्षिक किया जाता है तो इसका रूसा स्कीम पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।  किसी भी राजनीतिक दल ने रूसा वापसी की बात नहीं की है बल्कि इसके तहत लागू सीबीसीएस और सेमेस्टर सिस्टम की समीक्षा की बात की है। इस सुधार के तहत रूसा में शैक्षणिक सुधार करना भी जरूरी है जिसमें परीक्षा के दिनों को घटाकर शैक्षणिक दिनों को बढ़ाने की आवश्यकता है।

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