सियासत में फंसा स्वां तटीकरण

नई सरकार पर टिकी लोगों की उम्मीदें, चुनावों में अहम रहा था मुद्दा

गगरेट— विधानसभा चुनावों के लिए शांतिपूर्ण ढंग से मतदान संपन्न होने के बाद प्रत्याशी व उनके समर्थक जहां बेसब्री के साथ चुनाव नतीजों का इंतजार कर रहे हैं ,वहीं आम जनता में इस चुनाव के दौरान प्रत्याशियों द्वारा उठाए गए मुद्दे अभी तक गर्म हैं। विधानसभा चुनावों के दौरान विधानसभा क्षेत्र गगरेट में स्वां नदी तटीकरण योजना का मुद्दा भी छाया रहा और लोग अब इस इंतजार में हैं कि प्रदेश में नई सरकार के गठन के बाद क्या इस आधे-अधूरे तटीकरण को मूर्तरूप मिल पाएगा या नहीं? दरअसल निवर्त्तमान कांग्रेस सरकार के समय ही देश की सबसे बड़ी तटीकरण योजना को पूर्व यूपीए सरकार के समय मंजूरी मिली थी। इस योजना के तहत स्वां नदी के तटीकरण के बगैर रह गए हिस्से को तटबांधों में बांधने के साथ इसकी सहायक खड्डों के तटीकरण की योजना थी। अहम बात यह थी कि इस योजना के तहत सबसे अधिक बजट विधानसभा क्षेत्र गगरेट में ही खर्च किया जाना था। हालांकि इस योजना के तहत बणे दी हट्टी पुल से लेकर चलेट तक स्वां नदी का तटीकरण तो हो गया,लेकिन केंद्र में एनडीए सरकार के सत्तासीन होने के बाद स्वां नदी तटीकरण योजना के बजट पर कैंची चला दी। कांग्रेस ने इस मुद्दे को खूब उठाया और इसे  लेकर लगातार भाजपा नेताओं से जवाब भी मांगते रहे। प्रदेश सरकार ने भी स्वां नदी तटीकरण के रुके हुए बजट को जारी करने के लिए केंद्र सरकार से कई बार गुहार लगाई, लेकिन चुनावों से ठीक पहले केंद्र सरकार ने स्वां नदी तटीकरण योजना के लिए 54 करोड़ रुपए का बजट जारी कर यह दर्शाने का प्रयास किया कि इस योजना को लेकर केंद्र सरकार बेहद गंभीर है। विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने इस मुद्दे को खूब भुनाने का प्रयास किया। अब देखना यह होगा कि इस मुद्दे ने लोगों के दिल-दिमाग कर कितना असर किया।

राजनीति की भेंट चढ़ी तटीकरण योजना

सेवानिवृत्त प्रिंसीपल राजेंद्र जसवाल का कहना है कि स्वां नदी तटीकरण योजना जिला ऊना के लिए वरदान साबित होनी थी, लेकिन  यह राजनीति की भेंट चढ़ गई। दरअसल इस योजना का श्रेय प्रदेश कांग्रेस सरकार न ले जाए, इसलिए ही सोची-समझी चाल के तहत इस योजना का बजट रोका गया। इससे जनता व क्षेत्र को क्या लाभ होगा,इसे दरकिनार कर दिया गया।

 रिक्लेम होनी थी हजारों हेक्टेयर भूमि

 अजेश जसवाल का कहना है कि तटीकरण के प्रथम, द्वितीय व तृतीय चरण से सैकड़ों हेक्टेयर भूमि रिक्लेम हुई है और चौथे चरण का कार्य पूरा होने से बंजर हो चुकी भूमि फिर से सोना उगलने लगती। शायद कुछ लोगों को किसानों का भला रास नहीं आया इसलिए ही इस योजना का बजट रुकवाने में कई लोग जुटे रहे। अगर  यूं ही राजनीति होनी है तो फिर आम जनमानस की चिंता कौन करेगा?

 केंद्रीय आयोग को नहीं कर पाए संतुष्ट

नगर पंचायत गगरेट के पूर्व उपाध्यक्ष नरेश जसवाल का कहना है कि प्रदेश सरकार केंद्रीय जल आयोग के अधिकारियों को संतुष्ट नहीं कर पाई। शायद यही कारण रहा कि इस योजना के लिए समय पर बजट नहीं मिल सका। यह आरोप अनर्गल है कि राजनीति के लिए बजट रोका गया। अगर केंद्र सरकार की ऐसी मंशा होती तो बहुत पहले बजट पर रोक लगा देती।

चंद ठेकेदारों को ही मिल रहा था लाभ

युवा नेत्री मीनू चौधरी का कहना है कि तटीकरण योजना का लाभ चंद ठेकेदारों को ही मिल रहा था,जबकि छोटे ठेकेदार इतनी बड़ी योजना के बाद भी बेरोजगार थे। इसका कार्य निष्पक्ष व पारदर्शी तरीके से होना चाहिए और प्रदेश में आने वाली नई सरकार इसकी समीक्षा करे ,ताकि इस योजना का लाभ जनता को भी हो और बजट का भी सही उपयोग हो सके।

900 करोड़ की है योजना

स्वां नदी व इसकी सहायक खड्डों के तटीकरण पर नौ सौ करोड़ रुपए खर्च किया जाना था।  गगरेट की पच्चीस खड्डें ऐसी हैं, जिनका तटीकरण होना बाकी है। अभी भी इस योजना के तहत साढ़े चार सौ करोड़ रुपए का बजट खर्च किया जाना है और इसमें से साढ़े तीन सौ करोड़ रुपए विधानसभा क्षेत्र गगरेट में ही खर्च होना है। इस योजना पर नब्बे प्रतिशत बजट केंद्र सरकार व दस प्रतिशत बजट प्रदेश सरकार द्वारा खर्च किया जाना था। प्रदेश सरकार ने अपने हिस्से का पैसा दे दिया है। हालांकि इस योजना को पूरा करने की डेडलाइन मार्च 2017 थी,  बजट के अभाव में यह योजना समय पर पूरी नहीं हो पाई।  अब इस योजना का खर्च भी बढ़ गया है।

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