हिमाचली संगीत की संजीवनी संजीव दीक्षित

स्कूल के कार्यक्रम में देशभक्ति पूर्ण एक गाना ‘पाक ने हमला कीता हो, मैं भर्ती होई जाणा’ गाया। उसी गाने के बाद लोगों की सराहना पाकर संजीव ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। उसके बाद अनेकों बार विभिन्न स्कूलों की संगीतमयी  गोष्ठियों में भाग लेकर नाम कमाया…

शिव नगरी बैजनाथ के साथ लगते गांव पंडतेहड़ के संजीव दीक्षित स्वरों के जरिए हिमाचली संस्कृति को हिमाचल ही नहीं, बल्कि देश-विदेश में पहुंचाकर अपने प्रदेश का नाम रोशन कर रहे हैं। 25 साल पूर्व जब बसों में टैक्सियों में, हर दुकान में, ‘बस खड़ी ओ मेरी कमलो- बस खड़ी ओ’ गीत गूंजने लगा हर कोई उसे गाने वाले संजीव दीक्षित को देखने, तलाशने लगा। उसी गीत ने गायन के क्षेत्र में के क्षेत्र में संजीव दीक्षित को पहचान दिलाई। यही नहीं, कांगड़ा  घाटी में भी उन्हें महान ख्याति दिला दी। वर्ष 1971 में पंडतेहड़ गांव के सत्या दीक्षित व चंद्रभान दीक्षित के घर जन्मे संजीव दीक्षित ने प्रारंभिक शिक्षा प्राइमरी स्कूल उस्तेहड़ व उसके बाद हाई स्कूल बैजनाथ व बीएससी सनातन धर्म महाविद्यालय बैजनाथ में पाई।

गाने की ललक बचपन से पाले संजीव ने पांचवीं कक्षा में पढ़ते स्कूल के कार्यक्रम में देशभक्ति पूर्ण एक गाना ‘पाक ने हमला कीता हो, मैं भर्ती होई जाणा’ गाया। उसी गाने के बाद लोगों की सराहना पाकर संजीव ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। उसके बाद अनेकों बार विभिन्न स्कूलों की संगीतमयी  गोष्ठियों में भाग लेकर नाम कमाया। यही नहीं, कालेज में पदापर्ण करतेही उन्हें कालेज का स्टार परफार्मर माना जाने लगा। संगीत की कोई पारिवारिक पृष्ठभूमि न होते हुए भी संजीव की सुपरहिट एलबम ‘नठ कराहणियां’ के गीत बस खड़ी ओ मेरी कमलो से ख्याति मिलने के बाद संजीव की संगीत यात्रा में अब तक 250 ऑडियो-वीडियो जिनमें इंद्रो, पैंडल लसके ओ संसारों ‘कदूं औणा छुट्टियां, उठ मेरी गुजरिए फौजिए दी नार’, निलिमा नॉन स्टाप नाटियां तेरी-मेरी लगियां प्रीतां व बाबा बालक नाथ जी को समर्पित चार एलबमों एवं धार्मिक भजनों के एलबम उनके संग्रह में हैं। संजीव दीक्षित ने हिमाचल की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को और समृद्ध करने के लिए दीक्षित म्यूजिकल ग्रुप की स्थापना की, जो पूरे हिमाचल के प्रसिद्ध मेलों में अपनी धाक जमा चुका है। संजीव ने प्रयागराज विश्वविद्यालय में अंद्रेटा शाखा की सरस्वती विद्यापीठ में शास्त्रीय संगीत में महारत हासिल की। उन्होंने दो बार प्रतिष्ठित संगीतकार वीरेंद्र बच्चन, मदन शौंकी, ज्योति बिष्ट, बुल्लेशाह और गायक सुरिंद्र पनियारी व बलवंत, बबलू के साथ भी संगत की। संजीव बताते हैं कि प्रमुख टी-सीरीज, एमसीसीआई, नगमा, जेएम सील, बीएमसी शाम जैसी कंपनियों के साथ सहभागिता निभाई। यही नहीं, प्रसिद्ध गायिका अलका याग्निक के साथ ‘तू मेरी जिंदगी, तू मेरी हर खुशी’ गाना गाया, वहीं शीघ्र ही श्रेया घोशाल के साथ भी गाना गाने जा रहे हैं। संजीव दीक्षित मस्कट जाकर वहां रह रहे हिमाचली-पंजाबियों को भी अपनी मधुर आवाज सुनाकर मदहोश कर चुके हैं। अब शीघ्र ही कनाडा में जा रहे हैं। संजीव ने हिमाचल, पंजाब, दिल्ली, मुंबई में कई बार स्टेज शो कर हिमाचल का नाम बुलंदियों पर पहुंचाया। उनके अमूल्य योगदान के लिए संजीव को सिद्ध बाबा बालक नाथ समिति, नोएडा तथा दि ट्रिब्यून इंप्लायज, एचपी हेल्पलाइन को-आपरेटिव आदि संस्थाएं सम्मानित कर चुकी हैं।

-चमन डोहरू, बैजनाथ

जब रू-ब-रू हुए…

हिमाचली कलाकारों को हर स्टेज पर पीछे धकेला जाता है…

गायक बनने की ओर आपने पहला कदम कब लिया?

जब मैं पांचवीं कक्षा में पढ़ाई कर रहा था, तो उसी समय मैंने पाक ने हमला कीता, ‘भर्ती होई जाणा’ गाना गाया था। बस वहीं से गायन क्षेत्र में पदापर्ण कर लिया। वहां जब लोगों का प्रोत्साहन मिला, तो स्कूल कालेजों में भाग लेने लगा और बाद में बड़े स्टेजों तक पहुंच गया। आज आपके सामने हूं।

दर्शकों-श्रोताओं को जुटाने के लिए सोशल मीडिया का कितना प्रयोग करते हैं?

गायकी में मेरी लगन है और मैंने कभी सोशल मीडिया का सहारा नहीं लिया।

आपकी गायन शैली में हिमाचली संगीत की कितनी विरासत है?

हिमाचली संगीत लोक गीतों से ही मेरी पहचान हुई। हिमाचल मेरा अपना घर है। हिमाचली संगीत मुझे विरासत में मिला।

गीत-संगीत में कितने परिवर्तन, कितनी परंपरा की जरूरत होती है?

हिमाचल में हिमाचली गीत पारंपारिक होने चाहिए। हिमाचल में अलग-अलग जिलों में अलग-अलग भाषाओं में गीत गाए जाते हैं। कुछ एक गीत सच्ची घटनाओं पर आधारित होते हैं जैसे  कुंजूं चैंचलों, राझूं फुलनू इत्यादि।

क्या कारण हैं कि हिमाचली कलाकारों को हिमाचल में ही सम्मान नहीं मिल पाता?

पब्लिक से हर कार्यक्रम में सम्मान मिलता है। पब्लिक के कारण ही हमें शोहरत हासिल हुई,पर प्रशासन की अनदेखी के चलते हिमाचली कलाकारों को हर स्टेज में पीछे धकेला जाता व बाहरी कलाकारों को आगे करने की होड़ सी लगी रहती है।

पंजाबी संगीत में हर दिन कोई न कोई नई एलबम श्रोताओं से मुखातिब होती है, क्या कारण है कि पहाड़ी संगीत में नई एलबम के लिए लंबा इंतजार करना पड़ता है?

एक तो हिमाचल में भाषाओं की दिक्कत होती है। हर 50-60 किलोमीटर के उपरांत भाषा बदल जाती है। पंजाब में सिर्फ पंजाबी ही चलती है। भाषा ही मुख्य कारण है कि हिमाचली एलबमों के लिए श्रोताओं को इंतजार करना पड़ता है।

आपकी संगीत यात्रा का अब तक का बड़ा मंच?

मैंने अंतरराष्ट्रीय व राष्ट्रीय स्तर पर हर स्टेज में भागीदारी निभाई है और मुझे शोहरत मिली है। पिछले 25 सालों से मैं लगभग हर स्टेज पर गा चुका हूं।

वह लोकगीत, जिसे आप फुरसत के लम्हों में अकसर गुनगुनाते हैं?

‘ पारलीयां बणीयां मोर जे बोले ओ, ओ …’

संगीत के क्षेत्र में आपका ऐसा कोई ख्वाब जिसे अभी जीना बाकी है?

हर कलाकार का यही ख्वाब होता है कि वह बालीवुड में पहुंचे, जिसकी शुरुआत मैं कर चुका हूं। मैं अलका याग्निक के साथ गाना गा चुका हूं। जल्द ही श्रेया घोशाल के साथ भी गाने जा रहा हूं।

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